सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 450

श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
ऐसे निकस जाइ या तन तैं, जैसे जीव न जानै रे ॥ 1 ॥
कोटिक जतन करत या मन को, निश्चल निमष न होई रे ।
चंचल चपल चहुँ दिशि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥ 2 ॥
सदा सोच रहत घट भीतर, मन थिर कैसे कीजे रे ।
सहजैं सहज साधु की संगति, दादू हरि भजि लीजे रे ॥ 3 ॥
३४०. माया । उत्सव ताल
इन कामिनी घर घाले रे ।
प्रीति लगाइ प्राण सब सोषै, बिन पावक जिय जाले रे ॥ टेक ॥
अंग लगाइ सार सब लेवै, इनतैं कोई न बाचै रे ।
यहु संसार जीत सब लीया, मिलन न देई साचै रे ॥ 1 ॥
हेत लगाइ सबै धन लेवै, बाकी कछु न राखै रे ।
माखन मांहि सोध सब लेवै, छाछ छिया कर नाखै रे ॥ 2 ॥
जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं, तिन को निज पद परसै रे ।
काल न खाइ, मरै नहिं कबहुँ, दादू तिनको दरशै रे ॥ 3 ॥
३४१. विश्वास । उत्सव ताल
जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा ।
सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥ टेक ॥
गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा ।
युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥ 1 ॥
कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा ।
हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥ 2 ॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै ।
संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥ 3 ॥
जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।

  • 450 -