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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21

दादू छिन न बिसारिये, तातैं जीवन होई ॥ 4 ॥
342. गजताल
सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे ।
अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ।। टेक ।।
चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे ।
इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ।। 1 ।।
धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे ।
जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ।। 2 ।।
प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे ।
अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ।। 3 ।।
पाँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे ।
निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ।। 4 ।।
343. परिचय । गज ताल
जब मैं रहते की रह जानी ।
क ाल काया के निकट न आवै, पावत है सुख प्राणी ।। टेक ।।
शोक संताप नैन नहिं देखूं, राग द्वेष नहिं आवै ।
जागत है जासों रुचि मेरी, स्वप्नै सोइ दिखावै ।। 1 ।।
भरम कर्म मोह नहिं ममता, वाद विवाद न जानूं ।
मोहन सौं मेरी बन आई, रसना सोई बखानूं ।। 2 ।।
निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै ।
निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ।। 3 ।।
344. राज मृगांक ताल
जब मैं साँचे की सुधि पाई ।

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