सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब तैं अंग और नहीं आवै, देखत हूँ सुखदाई ॥ टेक ॥
ता दिन तैं तन ताप न व्यापै, सुख दुख संग न जाऊँ ।
पावन पीव परस पद लीन्हा, आनंद भर गुन गाऊँ ॥ 1 ॥
सब सौं संग नहीं पुनि मेरे, अरस परस कुछ नाँहीं ।
एक अनंत सोई संग मेरे, निरखत हूँ निज मांहीं ॥ 2 ॥
तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा ।
सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥ 3 ॥
345. सच निदान । राज मृगांक ताल
हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे ।
जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥ टेक ॥
धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं रे ।
रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥ 1 ॥
पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे ।
कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥ 2 ॥
सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे ।
नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥ 3 ॥
अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे ।
दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥ 4 ॥
346. पतिव्रत । राज विद्याधर ताल
मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥ टेक ॥
देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै ।
सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥ 1 ॥
केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखें खबर न पावैं ।
तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥ 2 ॥