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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 504 में से

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पृष्ठ 454

श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21
३४९. समता ज्ञान । त्रिताल
इन बातनि मेरा मन मानै ।
दुतिया दोइ नहीं उर अंतर, एक एक कर पीव कौं जानै ॥ टेक ॥
पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में, भ्रम न जीव काहू तैं आनै ।
होइ दयालु दीनता सब सौं, अरि पाँचनि को करै किसानै ॥ 1 ॥
आपा पर सम सब तत चीन्हैं, हरि भजै केवल जस गानै ।
दादू सोई सहज घर आनै, संकट सबै जीव के भानै ॥ 2 ॥
३५०. परिचय । एक ताल
ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं ।
पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥ टेक ॥
देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं ।
अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥ 1 ॥
तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं ।
अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥ 2 ॥
प्राणपति तहँ पाइया, जहाँ उलट समाई ।
दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥ 3 ॥
३५१. त्रिताल
आज प्रभात मिले हरि लाल ।
दिल की व्यथा पीड़ सब भागी, मिट्यो जीव को साल ॥ टेक ॥
देखत नैन संतोष भयो है, इहै तुम्हारो ख्याल ॥ 1 ॥
दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो, तुम हो दीन दयाल ॥ 2 ॥
३५२. (सिंधी) निज स्थान निर्णय । उपदेश एकताल
अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।

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