सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग बसंत 24
मनसा वाचा शरण तोर, दादू को राखो गोविन्द मोर ॥ ३ ॥
३६८. उपदेश । एक ताल
बहुरि न कीजे कपट कांम, हिरदै जपिये राम नांम ॥ टेक॥
हरि पाखैं नहिं कहूँ ठांम, पीव बिन खड़भड़ गांम गांम ।
तुम राखो जियरा अपनी मांम, अनत जनि जाय रहो विश्रांम ॥ १ ॥
कपट कांम नहीं कीजे हाँम, रघु चरण कमल कहु राम नांम ।
जब अंतरयामी रहै जांम, तब अक्षय पद जन दादू प्रांम ॥ २ ॥
३६९. परिचय प्राप्ति । कड्डुक ताल
तहँ खेलूं पीव सूं नित ही फाग, देख सखी री मेरे भाग ॥ टेक ॥
तहँ दिन दिन अति आनन्द होइ, प्रेम पिलावै आप सोइ ।
संगियन सेती रमूं रास, तहँ पूजा अर्चा चरण पास ॥ १ ॥
तहँ वचन अमोलक सब ही सार, तहँ बरतै लीला अति अपार ।
उमंग देइ तब मेरे भाग, तिहि तरुवर फल अमर लाग ॥ २ ॥
अलख देव कोइ जाणैं भेव, तहँ अलख देव की कीजै सेव ।
दादू बलि बलि बारंबार, तहँ आप निरंजन निराधार ॥ ३ ॥
३७०. परिचय सुख वर्णन । षड़ताल
मोहन माली सहज समाना, कोई जाणैं साध सुजाना ॥ टेक ॥
काया बाड़ी मांही माली, तहाँ रास बनाया ।
सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥ १ ॥
बाहर भीतर सर्व निरंतर, सब में रह्या समाई ।
परगट गुप्त, गुप्त पुनि परगट, अविगत लख्या न जाई ॥ २ ॥
ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।
अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥ ३ ॥
- 465 -