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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू काढै काल मुखि, अंधे लोचन देइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, जीव ब्रह्म कर लेइ ॥ 13 ॥
दादू काढै काल मुखि, श्रवणहुँ सबद सुनाइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, मृतक लिये जिलाइ ॥ 14 ॥
दादू काढै काल मुखि, गूंगे लिये बुलाइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, सुख में रहे समाइ ॥ 15 ॥
दादू काढै काल मुख, मिहर दया करि आइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, महिमा कही न जाइ ॥ 16 ॥
सतगुरु काढै केस गहि, डूबत इहि संसार।
दादू नाव चढ़ाइ करि, कीये पैली पार ॥ 17 ॥
भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढै आय।
दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढ़ाइ ॥ 18 ॥
दादू उस गुरुदेव की, मैं बलिहारी जाऊँ।
जहाँ आसण अमर अलेख था, ले राखे उस ठाऊँ ॥ 19 ॥
ज्ञानोत्पत्ति
आत्म मांहै ऊपजै, दादू पंगुल ज्ञान।
कृतम् जाइ उलंधि करि, जहां निरंजन थान ॥ 20 ॥
आत्म बोध बँझ का बेटा, गुरु मुखि उपजै आइ।
दादू पंगुल पंच बिन, जहाँ राम तहँ जाइ ॥ 21 ॥
गुरु शब्द
साचा सहजैं ले मिलै, शब्द गुरु का ज्ञान।
दादू हमको ले चल्या, जहाँ प्रीतम का स्थान ॥ 22 ॥
दादू शब्द विचार करि, लागि रहे मन लाइ।
ज्ञान गहै गुरुदेव का, दादू सहज समाइ ॥ 23 ॥

  • 27 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दया विनती
दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि, भावै जीव जगाइ।
भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥ 24 ॥
सतगुरु शब्द बाण
दादू बाहरि सारा देखिये, भीतरि किया चूर।
सतगुरु शब्दों मारिया, जाण न पावै दूर ॥ 25 ॥
दादू सतगुरु मारे शब्द सौं, निरखि निरखि निज ठौर।
राम अकेला रह गया, चित्त न आवै और ॥ 26 ॥
दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान।
सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥ 27 ॥
सतगुरु शब्द बाण
दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ।
जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥ 28 ॥
सतगुरु शब्द मुख सौं कह्या, क्या नेड़े क्या दूर।
दादू सिष श्रवणहुँ सुण्या, सुमिरण लागा सूर ॥ 29 ॥
करनी बिना कथनी
शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढै कोइ।
दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥ 30 ॥
शब्द दूध घृत राम रस, कोई साध बिलोवणहार।
दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥ 31 ॥
घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर।
दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥ 32 ॥
कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ।
गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥ 33 ॥

  • 28 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
साचा समर्थ गुरु मिल्या, तिन तत्त दिया बताइ ।
दादू मोटा महाबली, घट घृत मथि कर खाइ ॥ 34 ॥
मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकाश ।
दादू दीवा हाथि करि, गया निरंजन पास ॥ 35 ॥
परमार्था
दीवै दीवा कीजिये, गुरुमुख मार्ग जाइ ।
दादू अपने पीव का, दर्शन देखै आइ ॥ 36 ॥
दादू दीया है भला, दीया करौ सब कोइ ।
घर में धन्धा न पाइये, जे कर दीया न होइ ॥ 37 ॥
दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात ।
दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥ 38 ॥
सत्य गुरु
निर्मल गुरु का ज्ञान गहि, निर्मल भक्ति विचार ।
निर्मल पाया प्रेम रस, छूटे सकल विकार ॥ 39 ॥
निर्मल तन मन आत्मा, निर्मल मनसा सार ।
निर्मल प्राणी पंच कर, दादू लंघे पार ॥ 40 ॥
परापरी पासै रहै, कोइ न जाणै ताहि ।
सतगुरु दिया दिखाइ करि, दादू रह्या ल्यौ लाइ ॥ 41 ॥
शिष्य जिज्ञासा
जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ ।
दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥ 42 ॥
मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ ।
आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥ 43 ॥
भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ ।
सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलिबलि जाइ ॥ 44 ॥

  • 29 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ ।
दादू गुरु प्रसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ ॥ 45 ॥
सतगुरु बेपरवाही
मान सरोवर मांहिं जल, प्यासा पीवै आइ ।
दादू दोष न दीजिये, घर घर कहण न जाइ ॥ 46 ॥
गुरु लक्षण
दादू गुरु गरवा मिल्या, ताथैं सब गमि होइ ।
लोहा पारस परसतां, सहज समाना सोइ ॥ 47 ॥
दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गम्भीर ।
सूक्ष्म शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धीर ॥ 48 ॥
सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग ।
दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥ 49 ॥
दादू सतगुरु ऐसा कीजिये, राम रस माता ।
पार उतारे पलक में, दर्शन का दाता ॥ 50 ॥
देवै किरका दरद का, टूटा जोड़ै तार ।
दादू सांधै सुरति को, सो गुरु पीर हमार ॥ 51 ॥
दादू घाइल ह्वै रहे, सतगुरु के मारे ।
दादू अंग लगाय कर, भौसागर तारे ॥ 52 ।
दादू साचा गुरु मिल्या, साचा दिया दिखाइ ।
साचे को साचा मिल्या, साचा रह्या समाइ ॥ 53 ॥
साचा सतगुरु सोधि ले, साचे लीजे साध ।
साचा साहिब सोधि करि, दादू भक्ति अगाध ॥ 54 ॥
सन्मुख सतगुरु साधु सौं, साईं सौं राता ।
दादू प्याला प्रेम का, महारस माता ॥ 55 ॥

  • 30 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
सांई सौं साचा रहै, सतगुरु सौं सूरा ।
साधू सौं सनमुख रहै, सो दादू पूरा ॥ 56 ॥
सतगुरु मिलै तो पाइये, भक्ति मुक्ति भंडार ।
दादू सहजैं देखिए, साहिब का दीदार ॥ 57 ॥
दादू सांई सतगुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होइ ।
अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोइ ॥ 58 ॥
सतगुरु विमुख ज्ञान
इक लख चन्दा आण घर, सूरज कोटि मिलाय ।
दादू गुरु गोविन्द बिन, तो भी तिमिर न जाय ॥ 59 ॥
अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास ।
एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥ 60 ॥
दादू कद यहु आपा जाइगा, कद यहु बिसरै और ।
कद यह सूक्ष्म होइगा, कद यहु पावै ठौर ॥ 61 ॥
दादू विषम दुहेला जीव को, सतगुरु तैं आसान ।
जब दरवै तब पाइए, नेड़ा ही अस्थान ॥ 62 ॥
गुरु ज्ञान
दादू नैन न देखे नैन को, अन्तर भी कुछ नाहिं ।
सतगुरु दर्पण कर दिया, अरस परस मिलि माहिं ॥ 63 ॥
घट घट रात रतन है, दादू लखै न कोइ ।
सतगुरु सब्दौं पाइये, सहजैं ही गम होइ ॥ 64 ॥
जब ही कर दीपक दिया, तब सब सूझन लाग ।
यों दादू गुरु ज्ञान थैं, राम कहत जन जाग ॥ 65 ॥
आत्मार्थी भेष
दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ दिवस न परसै रात ।
तहाँ गुरु बाना दिया, सहजैं जपिये तात ॥ 66 ॥

  • 31 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ प्रीतम बैठे पास ।
आगम गुरु थैं गम भया, पाया नूर निवास ॥ 67 ॥
दादू मन माला तह फेरिये जहाँ आपै एक अनन्त ।
सहजैं सो सतगुरु मिल्या, जुग-जुग फाग बसन्त ॥ 68 ॥
दादू सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइ ।
बिन हाथों निश दिन जपै, परम जाप यूँ होय ॥ 69 ॥
दादू मन फकीर मांही हुवा, भीतर लिया भेख ।
शब्द गहै गुरुदेव का, मांगै भीख अलेख ॥ 70 ॥
दादू मन फकीर सतगुरु किया, कहि समझाया ज्ञान ।
निश्चल आसन बैस कर, अकल पुरुष का ध्यान ॥ 71 ॥
दादू मन फकीर जग तैं रह्या, सतगुरु लीया लाइ ।
अहर्निश लागा एक सौं, सहज शून्य रस खाइ ॥ 72 ॥
दादू मन फकीर ऐसैं, भया, सतगुरु के प्रसाद ।
जहाँ का था लागा तहाँ, छूटे वाद विवाद ॥ 73 ॥
ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया कलेश ।
दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥ 74 ॥
भ्रम विध्वंस
दादू यहु मसीति यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाइ ।
भीतर सेवा बंदगी, बाहर काहे जाइ ॥ 75 ॥
कस्तूरिया मृग
दादू मंझे चेला मंझि गुरु, मंझे ही उपदेश ।
बाहर ढूँढें बावरे, जटा बधाये केश ॥ 76 ॥
मन का दमन
मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश ।
दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 77 ॥

  • 32 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
भ्रम विध्वंश
दादू पड़दा भ्रम का, रह्या सकल घट छाइ ।
गुरु गोविन्द कृपा करें, तो सहजैं ही मिट जाइ ॥ 78 ॥
सूक्ष्म मार्ग
दादू जिहिं मत साधू उद्धरैं, सो मत लिया सोध ।
मन लै मारग मूल गहि, यह सतगुरु का परमोध ॥ 79 ॥
विचार
दादू सोइ मार्ग मन गह्या, जिहिं मारग मिलिए जाइ ।
वेद कुरानों ना कह्या, सो गुरु दिया दिखाइ ॥ 80 ॥
दादू मन भुजंग यहु विष भऱ्या, निर्विष क्योंही न होइ ।
दादू मिल्या गुरु गारड़ी, निर्विष कीया सोइ ॥ 81 ॥
एता कीजे, आप थैं, तन मन उनमन लाइ ।
पंच समाधी राखिये, दूजा सहज सुभाइ ॥ 82 ॥
दादू जीव जंजालों पड़ गया, उलझया नौ मण सूत ।
कोई इक सुलझे सावधान, गुरु बाइक अवधूत ॥ 83 ॥
मन का निग्रह करना
चंचल चहुँ दिसि जात है, गुरु बाइक सूँ बंधि ।
दादू संगति साध की, पारब्रह्म सौं संधि ॥ 84 ॥
गुरु अंकुश मानैं नहीं, उदमद माता अंध ।
दादू मन चेतै नहीं, काल न देखे फंध ॥ 85 ॥
दादू मान्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन ।
ज्ञान खड़ग गुरुदेव का, ता संगि सदा सुजान ॥ 86 ॥
जहाँ मन उठि चलै, फेरि तहां ही राखि ।
तहाँ दादू लैलीन करि, साध कहैं गुरु साखि ॥ 87 ॥
दादू मनहीं सौं मल उपजै, मन हीं सौं मल धोइ ।
सीख चली गुरु साध की, तौ तूं निर्मल होइ ॥ 88 ॥

  • 33 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू कच्छब अपने करि लिये, मन इन्द्रिय निज ठौर ।
नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परिहर और ॥ 89 ॥
अधिकारी अनधिकारी के लक्षण
मन के मतै सब कोई खेलै, गुरु मुख बिरला कोई ।
दादू मन की मानैं नहीं, सतगुरु का सिष सोइ ॥ 90 ॥
सब जीवों को मन ठगै, मन को बिरला कोइ ।
दादू गुरु के ज्ञान सौं, सांई सन्मुख होइ ॥ 91 ॥
दादू एक सौं लैलीन होना, सबै सयानप येह ।
सतगुरु साधु कहत हैं, परम तत्त जपि लेह ॥ 92 ॥
सतगुरु शब्द विवेक बिन, संयम रह्या न जाइ ।
दादू ज्ञान विचार बिन, विषय हलाहल खाइ ॥ 93 ॥
घर घर घट कोल्हू चलै, अमी महारस जाइ ।
दादू गुरु के ज्ञान बिन, विषै हलाहल खाइ ॥ 94 ॥
गुरु शिष्य परमोध
सतगुरु शब्द उलंधि करि, जनि कोई सिष जाइ ।
दादू पग पग काल है, जहाँ जाइ तहँ खाइ ॥ 95 ॥
सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंधै काल ।
दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥ 96 ॥
दादू सतगुरु कहै सो सिष करै, सब सिधि कारज होइ ।
अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोई ॥ 97 ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो हम थें जनि होइ ।
सतगुरु लाजै आपना, साध न मानै कोइ ॥ 98 ॥
दादू हूं की ठाहर है कहो, तन की ठाहर तूं ।
री की ठाहर जी कहो, ज्ञान गुरु का यूं ॥ 99 ॥

  • 34 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू पंच स्वादी पंच दिशि, पंचे पंचों बाट।
तब लग कह्या न कीजिये, गहि गुरु दिखाया घाट ॥ 100 ॥
दादू पंचों एक मत, पंचों पूज्या साथ।
पंचों मिल सन्मुख भये, तब पंचों गुरु की बाट ॥ 101 ॥
सतगुरु विमुख ज्ञान
दादू ताता लोहा तिणैं सौं, क्यूं कर पकड़या जाइ।
गहन गति सूझै नहीं, गुरु नहीं बूझै आइ ॥ 102 ॥
गुरुमुख कसौटी
दादू औगुण गुण कर माने गुरु के, सोई शिष्य सुजाण।
सतगुरु औगुण क्यों करै, समझै सोई सयाण ॥ 103 ॥
सोने सेती बैर क्या, मारे घण के घाइ।
दादू काटि कलंक सब, राखै कंठ लगाइ ॥ 104 ॥
पाणी माहैं राखिये, कनक कलंक न जाहि।
दादू गुरु के ज्ञान सौं, ताइ अगनि में बाहि ॥ 105 ॥
दादू माहैं मीठा हेत करि, ऊपर कड़वा राख।
सतगुरु सिष कौं सीख दे, सब साधों की साख ॥ 106 ॥
दादू कहै, सिष भरोसे आपणै, ह्वै बोली हुसियार।
कहेगा सो बहेगा, हम पहली करैं पुकार ॥ 107 ॥
दादू सतगुरु कहै सो कीजिये, जे तूं सिष सुजाण।
जहाँ लाया तहँ लागि रहु, बुझे कहा अजाण ॥ 108 ॥
गुरु पहली मन सौं कहै, पीछे नैन की सैन।
दादू सिष समझै नहीं, कहि समझावै बैन ॥ 109 ॥
कहै लखै सो मानवी, सैन लखै सो साध।
मन लखै सो देवता, दादू अगम अगाध ॥ 110 ॥

  • 35 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
कठोरता
दादू कहि कहि मेरी जीभ रही, सुनि सुनि तेरे कान ।
सतगुरु बपुरा क्या करै, जो चेला मूढ़ अजान ॥ 111 ॥
गुरु शिष्य प्रबोध
एक शब्द सब कुछ कह्या, सतगुरु सिष समझाइ ।
जहाँ लाया तहँ लागै नहीं, फिर फिर बूझै आइ ॥ 112 ॥
अज्ञ स्वभाव अपलट
ज्ञान लिया सब सीख सुणि, मन का मैल न जाइ ।
गुरु बिचारा क्या करै, सिष विषै हलाहल खाइ ॥ 113 ॥
सतगुरु की समझै नहीं, आपणै उपजै नांहि ।
तो दादू क्या कीजिए, बुरी बिथा मन मांहि ॥ 114 ॥
सत्यासत्य गुरु पारख
गरु अपंग पग पंष बिन, शिष शाखा का भार ।
दादू खेवट नाव बिन, क्यूं उतरेंगे पार ॥ 115 ॥
दादू शंसा जीव का, शिष शाखा का साल ।
दोनों को भारी पड़ी, होगा कौण हवाल ॥ 116 ॥
झूठे गुरु और झूठे शिष्यों की गति
अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार ।
कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥ 117 ॥
सोधी नहीं शरीर की, औरों को उपदेश ।
दादू अचरज देखिया, ये जाहिंगे किस देस ॥ 118 ॥
दादू सोधी नहीं शरीर की, कहैं अगम की बात ।
जान कहावैं बापुड़े, आवध लिए हाथ ॥ 119 ॥
सत्यासत्य गुरु पारख लक्षण
दादू माया माहै काढि करि, फिर माया में दीन्ह ।
दोऊ जन समझैं नहीं, एको काज न कीन्ह ॥ 120 ॥

  • 36 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू कहै, सो गुरु किस काम का, गहि भ्रमावै आन।
तत्त बतावै निर्मला, सो गुरु साध सुजान ॥ 121 ॥
तूं मेरा, हूं तेरा, गुरु सिष किया मंत।
दोनों भूले जात हैं, दादू बिसऱ्या कंत ॥ 122 ॥
दुहि दुहि पीवै ग्वाल गुरु, सिष है छेली गाइ।
यह औसर योंही गया, दादू कहि समझाइ ॥ 123 ॥
शिष गोरु, गुरु ग्वाल है, रक्षा कर कर लेइ ।
दादू राखै जतन कर, आनि धणी को देय ॥ 124 ॥
झूठे अंधे गुरु घणे, भरम दिढ़ावैं आइ।
दादू साचा गुरु मिलै, जीव ब्रह्म है जाइ ॥ 125 ॥
झूठे अंधे गुरु घणे, बँधे विषय विकार ।
दादू साचा गुरु मिल्या, सन्मुख सिरजनहार ॥ 126 ॥
झूठे अंधे गुरु घणे, भरम दिढ़ावैं काम।
बँधे माया मोह सौं, दादू मुख सौं राम ॥ 127 ॥
झूठे अँधे गुरु घणे, भटकैं घर घर बार।
कारज को सीझै नहीं, दादू माथै मार ॥ 128 ॥
बेखर्च व्यवसनी
दादू भक्त कहावैं आपको, भक्ति न जानैं भेव।
सुपनै ही समझैं नहीं, कहाँ बसै गुरुदेव ॥ 129 ॥
भ्रम विध्वंस
भ्रम कर्म जग बंधिया, पंडित दिया भुलाइ।
दादू सतगुरु ना मिले, मारग देइ दिखाइ ॥ 130 ॥
दादू पंथ बतावैं पाप का, भ्रम कर्म विश्वास।
निकट निरंजन जे रहै, क्यों न बतावैं तास ॥ 131 ॥

  • 37 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
विचार
दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार।
आपा सुरझे सुरझिया, यह गुरु ज्ञान विचार ॥ 132 ॥
गुरुमुख कसौटी
साधु अंग का निर्मला, तामें मल न समाइ।
परम गुरु प्रकट कहै, ताथैं दादू ताइ ॥ 133 ॥
सुमिरण नाम चितावणी
राम नाम गुरु सबद सौं, रे मन पेलि भरम।
निहकर्मी सौं मन मिल्या, दादू काटि करम ॥ 134 ॥
सूक्ष्म मार्ग
दादू बिन पाइन का पंथ, क्यों करि पहुँचे प्राण।
विकट घाट औघट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 135 ॥
मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम।
शब्द गुरु का ताजणां, कोइ पहुंचे साधु सुजाण ॥ 136 ॥
पारख लक्षण
साधौं सुमिरण सो कह्या, जिहि सुमिरण आपा भूल।
दादू गहि गंभीर गुरु, चेतन आनन्द मूल ॥ 137 ॥
स्वार्थी परमार्थी
दादू आप स्वारथ सब सगे, प्राण सनेही नांहि।
प्राण सनेही राम है, कै साधु कलि मांहि ॥ 138 ॥
सुख का साथी जगत सब, दुख का नाहीं कोइ।
दुख का साथी सांइयाँ, दादू सतगुरु होइ ॥ 139 ॥
सगे हमारे साध हैं, सिर पर सिरजनहार।
दादू सतगुरु सो सगा, दूजा धंध विकार ॥ 140 ॥

  • 38 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दया निर्वैरता
दादू के दूजा नहीं, एकै आत्मराम।
सतगुर सिर पर साध सब, प्रेम भक्ति विश्राम ॥141॥
दादू सुध बुध आत्मा, सतगुरु परसे आइ।
दादू भृंगी कीट ज्यों, देखत ही ह्वै जाइ ॥142॥
दादू भृंगी कीट ज्यूं, सतगुरु सेती होइ।
आप सरीखे कर लिये, दूजा नाहीं कोइ ॥143॥
दादू कच्छब राखै दृष्टि में, कुँजों के मन माहिं।
सतगुरु राखै आपणां, दूजा कोई नाहिं ॥144॥
बच्चों के माता पिता, दूजा नाहीं कोइ ।
दादू निपजै भाव सूं, सतगुरु के घट होइ ॥145॥
सतगुरु बेपरवाही
एकै शब्द अनन्त शिष, जब सतगुरु बोले।
दादू जड़े कपाट सब, दे कूँची खोले ॥146॥
बिन ही किया होइ सब, सन्मुख सिरजनहार।
दादू करि करि को मरै, शिष शाखां शिर भार ॥147॥
सूरज सन्मुख आरसी, पावक किया प्रकास।
दादू सांई साधु बिच, सहजैं निपजै दास ॥148॥
मन इन्द्रिय निग्रह
दादू पंचों ये परमोधि ले, इन्हीं को उपदेश।
यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥149॥
अमर भये गुरु ज्ञान सौं, केते इहि कलि माहिं।
दादू गुरू के ज्ञान बिन, केते मरि मरि जाहिं ॥150॥
औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ ।
दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥151॥

  • 39 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
बैद बिथा कहै देखि करि, रोगी रहै रिसाइ।
मन मांहै लीये रहै, दादू व्याधि न जाइ ॥ 152 ॥
दादू बैद बिचारा क्या करै, रोगी रहै न साच।
खाटा मीठा चरपरा, मांगै मेरा वाच ॥ 153 ॥
गुरु उपदेश
दुर्लभ दर्शन साध का, दुर्लभ गुरु उपदेश ।
दुर्लभ करबा कठिन है, दुर्लभ परस अलेख ॥ 154 ॥
गुरु मन्त्र (गायत्री मन्त्र)
दादू अविचल मंत्र, अमर मंत्र, अखै मंत्र,
अभै मंत्र, राम मंत्र, निजसार ।
संजीवन मंत्र, सवीरज मंत्र, सुन्दर मंत्र,
शिरोमणि मंत्र, निर्मल मंत्र, निराकार ॥
अलख मंत्र, अकल मंत्र, अगाध मंत्र, अपार मंत्र, अनन्त मंत्र राया।
नूर मंत्र, तेज मंत्र, ज्योति मंत्र, प्रकाश मंत्र, परम मंत्र, पाया ॥
उपदेश दीक्षा दादू गुरु राया ॥ 155 ॥
दादू सब ही गुरु किए, पशु पंखी बनराइ।
तीन लोक गुण पंच सौं, सबही मांहिं खुद आइ ॥ 156 ॥
जे पहली सतगुरु कह्या, सो नैनहुँ देख्या आइ।
अरस परस मिलि एक रस, दादू रहे समाइ ॥ 157 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
प्रथमो श्री गुरुदेव का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 1 ॥ साखी 157 ॥

  • 40 -

स्मरण का अंग
अथ स्मरण का अंग-२
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।।
एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण।
राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ।। 2 ।।
पहली श्रवण द्वितीय रसना, तृतीय हिरदै गाइ।
चतुर्दशी चेतन भया, तब रोम रोम ल्यौ लाइ ।। 3 ।।
मन प्रबोध
दादू नीका नांव है, तीन लोक तत सार।
रात दिवस रटबो करो, रे मन इहै विचार ।। 4 ।।

  • 41 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू नीका नांव है, हरि हिरदै न बिसारि ।
मूरति मन मांहैं बसै, सांसैं सांस संभारि ॥ 5 ॥
सांसैं सांस संभालतां, इक दिन मिलि है आइ ।
सुमिरण पैंडा सहज का, सतगुरु दिया बताइ ॥ 6 ॥
दादू नीका नांव है, सौ तू हिरदय राखि ।
पाखंड प्रपंच दूर करि, सुन साधुजन की साखि ॥ 7 ॥
दादू नीका नांव है, आप कहै समझाइ ।
और आरम्भ सब छाड़ दे, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 8 ॥
राम भजन का सोच क्या, करता होइ सो होइ ।
दादू राम संभालिये, फिर बुझिये न कोइ ॥ 9 ॥
नाम चेतावनी
राम तुम्हारे नांव बिन, जे मुख निकसै और ।
तो इस अपराधी जीव को, तीन लोक कित ठौर ॥ 10 ॥
छिन-छिन राम संभालतां, जे जीव जाइ तो जाय ।
आतम के आधार को, नाहीं आन उपाय ॥ 11 ॥
स्मरण माहात्म्य
एक मुहूर्त्त मन रहै, नांव निरंजन पास ।
दादू तब ही देखतां, सकल कर्म का नास ॥ 12 ॥
सहजैं ही सब होइगा, गुण इन्द्रिय का नास ।
दादू राम संभालतां, कटैं कर्म के पास ॥ 13 ॥
स्मरण नाम चितावनी
राम नाम गुरु शब्द सों, रे मन पेलि भरम ।
निहकर्मी सौं मन मिल्या, दादू काट करम ॥ 14 ॥
एक राम के नाम बिन, जीव की जलन न जाइ ।
दादू केते पचि मुए, करि-करि बहुत उपाइ ॥ 15 ॥

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू एक राम ही टेक गहि, दूजा सहज सुभाइ ।
राम नाम छाडै नहीं, दूजा आवै जाइ ॥ 16 ॥
दादू राम अगाध है, परिमित नाहीं पार ।
अवर्ण वर्ण न जाणिये, दादू नाम अधार ॥ 17 ॥
दादू राम अगाध है, अविगत लखै न कोइ ।
निर्गुण सगुण का कहै, नाम विलम्ब न होइ ॥ 18 ॥
दादू राम अगाध है, बेहद लख्या न जाइ ।
आदि अंत नहि जाणिये, नाम निरन्तर गाइ ॥ 19 ॥
अद्वैत ब्रह्म
दादू राम अगाध है, अकल अगोचर एक।
दादू राम विलम्बिए, साधू कहैं अनेक ॥ 20 ॥
दादू एकै अलह राम है, समर्थ सांई सोइ ।
मैदे के पकवान सब, खातां होइ सु होइ ॥ 21 ॥
निर्गुण सगुण विवाद की निवृत्ति
सगुण निर्गुण ह्वै रहै, जैसा है तैसा लीन ।
हरि सुमिरण ल्यौ लाइए, का जाणों का कीन ॥ 22 ॥
नाम चित्त आवै सो लेय
दादू सिरजनहार के, केते नाम अनन्त ।
चित आवै सो लीजिये, यों साधु सुमरैं संत ॥ 23 ॥
दादू जिन प्राण पिण्ड हमकौ दिया, अंतर सेवैं ताहि ।
जे आवै ओसण सिर, सोई नांव संवाहि ॥ 24 ॥
चितावणी
दादू ऐसा कौण अभागिया, कछु दिढावै और ।
नाम बिना पग धरन को, कहो कहाँ है ठौर ॥ 25 ॥

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
सुमिरण नाम महिमा
दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम।
कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥ 26 ॥
मन प्रबोध
दादू जे तैं अब जाण्या नहीं, राम नाम निज सार।
फिर पीछै पछिताहिगा, रे मन मूढ गँवार ॥ 27 ॥
दादू राम संभाल ले, जब लग सुखी सरीर।
फिरि पीछै पछिताहिगा, जब तन मन धरै न धीर ॥ 28 ॥
दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम।
सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥ 29 ॥
दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव।
दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥ 30 ॥
स्मरण नाम निःसंशय
मेरा संसा को नहीं, जीवण मरण का राम।
सुपिनैं ही जनि बीसरै, मुख हिरदै हरि नाम ॥ 31 ॥
स्मरण नाम विरह
दादू दुखिया तब लगै, जब लग नाम न लेहि।
तब ही पावन परम सुख, मेरी जीवनि येहि ॥ 32 ॥
स्मरण नाम पारख लक्षण
कछु न कहावे आप को, सांई को सेवे।
दादू दूजा छाड़ि सब, नाम निज लेवे ॥ 33 ॥
नाम स्मरण से जीवों के संशय की निवृत्ति
जे चित्त चहुँटै राम सौं, सुमिरण मन लागै।
दादू आत्मा जीव का, संसा सब भागै ॥ 34 ॥
स्मरण नाम चितावणी
दादू पीव का नाम ले, तो मिटै सिर साल।
घड़ी मुहूरत चालनां, कैसी आवै काल ॥ 35 ॥

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण बिना सांस न ले
दादू औसर जीव तैं, कह्या न केवल राम ।
अंत काल हम कहेंगे, जम बैरी सौं काम ॥ 36 ॥
दादू ऐसे महँगे मोल का, एक सांस जे जाइ ।
चौदह लोक समान सो, काहे रेत मिलाइ ॥ 37 ॥
अमूल्य श्वास
सोई सांस सुजाण नर, सांईं सेती लाइ ।
कर साटा सिरजनहार सौं, महँगे मोल बिकाइ ॥ 38 ॥
व्यर्थ जीवन
जतन करै नहीं जीव का, तन मन पवना फेर।
दादू महँगे मोल का, द्वै दोवटी इक सेर ॥ 39 ॥
सफल जीवन
दादू रावत राजा राम का, कदे न बिसारै नांव ।
आत्मराम संभालिये, तो सुबस काया गांव ॥ 40 ॥
स्मरण चितावणी
दादू अहर्निशि सदा शरीर में, हरि चिंतत दिन जाइ ।
प्रेम मगनलै लीन मन, अन्तरगति ल्यौ लाइ ॥ 41 ॥
निमिष एक न्यारा नहीं, तन मन मंझि समाइ ।
एक अंगि लागा रहै, ताको काल न खाइ ॥ 42 ॥
दादू पिंजर पिंड शरीर का, सुवटा सहज समाइ ।
रमता सेती रमि रहै, विमल विमल जस गाइ ॥ 43 ॥
अविनाशी सौं एक ह्रै, निमिष न इत उत जाइ ।
बहुत बिलाई क्या करै, जे हरि हरि शब्द सुणाइ ॥ 44 ॥
दादू जहाँ रहूँ तहँ राम सौं, भावै कंदलि जाइ ।
भावै गिरि परवत रहूँ, भावै गृह बसाइ ॥ 45 ॥

  • 45 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
मन परमोध
दादू राम कहे सब रहत है, नखसिख सकल सरीर।
राम कहे बिन जात है, समझि मनवां वीर ॥ 47 ॥
दादू राम कहै सब रहत है, लाहा मूल सहेत ।
राम कहे बिन जात है, मूरख मनवां चेत ॥ 48 ॥
दादू राम कहे सब रहत है, आदि अंति लौं सोइ।
राम कहे बिन जात है, यहु मन बहुरि न होइ ॥ 49 ॥
दादू राम कहे सब रहत है, जीव ब्रह्म की लार ।
राम कहे बिन जात है, रे मन हो होशियार ॥ 50 ॥
परमार्थी
हरि भज साफिल जीवना, पर उपकार समाइ।
दादू मरणा तहाँ भला, जहाँ पशु पंखी खाइ ॥ 51 ॥
स्मरण
दादू राम शब्द मुख ले रहै, पीछे लगा जाइ।
मनसा वाचा कर्मना, तिहि तत सहज समाइ ॥ 52 ॥
अब 'तिही तत्त' में समाने की विधि का वर्णन
दादू रचि मचि लागे नाम सौं, राते माते होइ।
देखेंगे दीदार को, सुख पावेंगे सोइ ॥ 53 ॥
चेतावनी
दादू सांई सेवैं सब भले, बुरा न कहिये कोइ ।
सारों मांही सो बुरा, जिस घटि नाम न होइ ॥ 54 ॥
ईश्वर विमुख प्राणी की दुर्गति
दादू जियरा राम बिन, दुखिया इहि संसार ।
उपजै विनसै खप मरै, सुख दुख बारम्बार ॥ 55 ॥
स्मरण नाम महिमा माहात्मय
राम नाम रुचि उपजै, लेवे हित चित लाइ।
दादू सोई जीयरा, काहे जमपुरि जाइ ॥ 56 ॥

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