सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू कच्छब अपने करि लिये, मन इन्द्रिय निज ठौर ।
नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परिहर और ॥ 89 ॥
अधिकारी अनधिकारी के लक्षण
मन के मतै सब कोई खेलै, गुरु मुख बिरला कोई ।
दादू मन की मानैं नहीं, सतगुरु का सिष सोइ ॥ 90 ॥
सब जीवों को मन ठगै, मन को बिरला कोइ ।
दादू गुरु के ज्ञान सौं, सांई सन्मुख होइ ॥ 91 ॥
दादू एक सौं लैलीन होना, सबै सयानप येह ।
सतगुरु साधु कहत हैं, परम तत्त जपि लेह ॥ 92 ॥
सतगुरु शब्द विवेक बिन, संयम रह्या न जाइ ।
दादू ज्ञान विचार बिन, विषय हलाहल खाइ ॥ 93 ॥
घर घर घट कोल्हू चलै, अमी महारस जाइ ।
दादू गुरु के ज्ञान बिन, विषै हलाहल खाइ ॥ 94 ॥
गुरु शिष्य परमोध
सतगुरु शब्द उलंधि करि, जनि कोई सिष जाइ ।
दादू पग पग काल है, जहाँ जाइ तहँ खाइ ॥ 95 ॥
सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंधै काल ।
दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥ 96 ॥
दादू सतगुरु कहै सो सिष करै, सब सिधि कारज होइ ।
अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोई ॥ 97 ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो हम थें जनि होइ ।
सतगुरु लाजै आपना, साध न मानै कोइ ॥ 98 ॥
दादू हूं की ठाहर है कहो, तन की ठाहर तूं ।
री की ठाहर जी कहो, ज्ञान गुरु का यूं ॥ 99 ॥
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