सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ प्रीतम बैठे पास ।
आगम गुरु थैं गम भया, पाया नूर निवास ॥ 67 ॥
दादू मन माला तह फेरिये जहाँ आपै एक अनन्त ।
सहजैं सो सतगुरु मिल्या, जुग-जुग फाग बसन्त ॥ 68 ॥
दादू सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइ ।
बिन हाथों निश दिन जपै, परम जाप यूँ होय ॥ 69 ॥
दादू मन फकीर मांही हुवा, भीतर लिया भेख ।
शब्द गहै गुरुदेव का, मांगै भीख अलेख ॥ 70 ॥
दादू मन फकीर सतगुरु किया, कहि समझाया ज्ञान ।
निश्चल आसन बैस कर, अकल पुरुष का ध्यान ॥ 71 ॥
दादू मन फकीर जग तैं रह्या, सतगुरु लीया लाइ ।
अहर्निश लागा एक सौं, सहज शून्य रस खाइ ॥ 72 ॥
दादू मन फकीर ऐसैं, भया, सतगुरु के प्रसाद ।
जहाँ का था लागा तहाँ, छूटे वाद विवाद ॥ 73 ॥
ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया कलेश ।
दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥ 74 ॥
भ्रम विध्वंस
दादू यहु मसीति यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाइ ।
भीतर सेवा बंदगी, बाहर काहे जाइ ॥ 75 ॥
कस्तूरिया मृग
दादू मंझे चेला मंझि गुरु, मंझे ही उपदेश ।
बाहर ढूँढें बावरे, जटा बधाये केश ॥ 76 ॥
मन का दमन
मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश ।
दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 77 ॥
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