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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 504 में से

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पृष्ठ 33

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
भ्रम विध्वंश
दादू पड़दा भ्रम का, रह्या सकल घट छाइ ।
गुरु गोविन्द कृपा करें, तो सहजैं ही मिट जाइ ॥ 78 ॥
सूक्ष्म मार्ग
दादू जिहिं मत साधू उद्धरैं, सो मत लिया सोध ।
मन लै मारग मूल गहि, यह सतगुरु का परमोध ॥ 79 ॥
विचार
दादू सोइ मार्ग मन गह्या, जिहिं मारग मिलिए जाइ ।
वेद कुरानों ना कह्या, सो गुरु दिया दिखाइ ॥ 80 ॥
दादू मन भुजंग यहु विष भऱ्या, निर्विष क्योंही न होइ ।
दादू मिल्या गुरु गारड़ी, निर्विष कीया सोइ ॥ 81 ॥
एता कीजे, आप थैं, तन मन उनमन लाइ ।
पंच समाधी राखिये, दूजा सहज सुभाइ ॥ 82 ॥
दादू जीव जंजालों पड़ गया, उलझया नौ मण सूत ।
कोई इक सुलझे सावधान, गुरु बाइक अवधूत ॥ 83 ॥
मन का निग्रह करना
चंचल चहुँ दिसि जात है, गुरु बाइक सूँ बंधि ।
दादू संगति साध की, पारब्रह्म सौं संधि ॥ 84 ॥
गुरु अंकुश मानैं नहीं, उदमद माता अंध ।
दादू मन चेतै नहीं, काल न देखे फंध ॥ 85 ॥
दादू मान्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन ।
ज्ञान खड़ग गुरुदेव का, ता संगि सदा सुजान ॥ 86 ॥
जहाँ मन उठि चलै, फेरि तहां ही राखि ।
तहाँ दादू लैलीन करि, साध कहैं गुरु साखि ॥ 87 ॥
दादू मनहीं सौं मल उपजै, मन हीं सौं मल धोइ ।
सीख चली गुरु साध की, तौ तूं निर्मल होइ ॥ 88 ॥

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