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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 504 में से

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पृष्ठ 36

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
कठोरता
दादू कहि कहि मेरी जीभ रही, सुनि सुनि तेरे कान ।
सतगुरु बपुरा क्या करै, जो चेला मूढ़ अजान ॥ 111 ॥
गुरु शिष्य प्रबोध
एक शब्द सब कुछ कह्या, सतगुरु सिष समझाइ ।
जहाँ लाया तहँ लागै नहीं, फिर फिर बूझै आइ ॥ 112 ॥
अज्ञ स्वभाव अपलट
ज्ञान लिया सब सीख सुणि, मन का मैल न जाइ ।
गुरु बिचारा क्या करै, सिष विषै हलाहल खाइ ॥ 113 ॥
सतगुरु की समझै नहीं, आपणै उपजै नांहि ।
तो दादू क्या कीजिए, बुरी बिथा मन मांहि ॥ 114 ॥
सत्यासत्य गुरु पारख
गरु अपंग पग पंष बिन, शिष शाखा का भार ।
दादू खेवट नाव बिन, क्यूं उतरेंगे पार ॥ 115 ॥
दादू शंसा जीव का, शिष शाखा का साल ।
दोनों को भारी पड़ी, होगा कौण हवाल ॥ 116 ॥
झूठे गुरु और झूठे शिष्यों की गति
अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार ।
कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥ 117 ॥
सोधी नहीं शरीर की, औरों को उपदेश ।
दादू अचरज देखिया, ये जाहिंगे किस देस ॥ 118 ॥
दादू सोधी नहीं शरीर की, कहैं अगम की बात ।
जान कहावैं बापुड़े, आवध लिए हाथ ॥ 119 ॥
सत्यासत्य गुरु पारख लक्षण
दादू माया माहै काढि करि, फिर माया में दीन्ह ।
दोऊ जन समझैं नहीं, एको काज न कीन्ह ॥ 120 ॥

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