सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू एक राम ही टेक गहि, दूजा सहज सुभाइ ।
राम नाम छाडै नहीं, दूजा आवै जाइ ॥ 16 ॥
दादू राम अगाध है, परिमित नाहीं पार ।
अवर्ण वर्ण न जाणिये, दादू नाम अधार ॥ 17 ॥
दादू राम अगाध है, अविगत लखै न कोइ ।
निर्गुण सगुण का कहै, नाम विलम्ब न होइ ॥ 18 ॥
दादू राम अगाध है, बेहद लख्या न जाइ ।
आदि अंत नहि जाणिये, नाम निरन्तर गाइ ॥ 19 ॥
अद्वैत ब्रह्म
दादू राम अगाध है, अकल अगोचर एक।
दादू राम विलम्बिए, साधू कहैं अनेक ॥ 20 ॥
दादू एकै अलह राम है, समर्थ सांई सोइ ।
मैदे के पकवान सब, खातां होइ सु होइ ॥ 21 ॥
निर्गुण सगुण विवाद की निवृत्ति
सगुण निर्गुण ह्वै रहै, जैसा है तैसा लीन ।
हरि सुमिरण ल्यौ लाइए, का जाणों का कीन ॥ 22 ॥
नाम चित्त आवै सो लेय
दादू सिरजनहार के, केते नाम अनन्त ।
चित आवै सो लीजिये, यों साधु सुमरैं संत ॥ 23 ॥
दादू जिन प्राण पिण्ड हमकौ दिया, अंतर सेवैं ताहि ।
जे आवै ओसण सिर, सोई नांव संवाहि ॥ 24 ॥
चितावणी
दादू ऐसा कौण अभागिया, कछु दिढावै और ।
नाम बिना पग धरन को, कहो कहाँ है ठौर ॥ 25 ॥
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