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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 504 में से

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पृष्ठ 31

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
सांई सौं साचा रहै, सतगुरु सौं सूरा ।
साधू सौं सनमुख रहै, सो दादू पूरा ॥ 56 ॥
सतगुरु मिलै तो पाइये, भक्ति मुक्ति भंडार ।
दादू सहजैं देखिए, साहिब का दीदार ॥ 57 ॥
दादू सांई सतगुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होइ ।
अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोइ ॥ 58 ॥
सतगुरु विमुख ज्ञान
इक लख चन्दा आण घर, सूरज कोटि मिलाय ।
दादू गुरु गोविन्द बिन, तो भी तिमिर न जाय ॥ 59 ॥
अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास ।
एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥ 60 ॥
दादू कद यहु आपा जाइगा, कद यहु बिसरै और ।
कद यह सूक्ष्म होइगा, कद यहु पावै ठौर ॥ 61 ॥
दादू विषम दुहेला जीव को, सतगुरु तैं आसान ।
जब दरवै तब पाइए, नेड़ा ही अस्थान ॥ 62 ॥
गुरु ज्ञान
दादू नैन न देखे नैन को, अन्तर भी कुछ नाहिं ।
सतगुरु दर्पण कर दिया, अरस परस मिलि माहिं ॥ 63 ॥
घट घट रात रतन है, दादू लखै न कोइ ।
सतगुरु सब्दौं पाइये, सहजैं ही गम होइ ॥ 64 ॥
जब ही कर दीपक दिया, तब सब सूझन लाग ।
यों दादू गुरु ज्ञान थैं, राम कहत जन जाग ॥ 65 ॥
आत्मार्थी भेष
दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ दिवस न परसै रात ।
तहाँ गुरु बाना दिया, सहजैं जपिये तात ॥ 66 ॥

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