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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 504 में से

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पृष्ठ 39

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दया निर्वैरता
दादू के दूजा नहीं, एकै आत्मराम।
सतगुर सिर पर साध सब, प्रेम भक्ति विश्राम ॥141॥
दादू सुध बुध आत्मा, सतगुरु परसे आइ।
दादू भृंगी कीट ज्यों, देखत ही ह्वै जाइ ॥142॥
दादू भृंगी कीट ज्यूं, सतगुरु सेती होइ।
आप सरीखे कर लिये, दूजा नाहीं कोइ ॥143॥
दादू कच्छब राखै दृष्टि में, कुँजों के मन माहिं।
सतगुरु राखै आपणां, दूजा कोई नाहिं ॥144॥
बच्चों के माता पिता, दूजा नाहीं कोइ ।
दादू निपजै भाव सूं, सतगुरु के घट होइ ॥145॥
सतगुरु बेपरवाही
एकै शब्द अनन्त शिष, जब सतगुरु बोले।
दादू जड़े कपाट सब, दे कूँची खोले ॥146॥
बिन ही किया होइ सब, सन्मुख सिरजनहार।
दादू करि करि को मरै, शिष शाखां शिर भार ॥147॥
सूरज सन्मुख आरसी, पावक किया प्रकास।
दादू सांई साधु बिच, सहजैं निपजै दास ॥148॥
मन इन्द्रिय निग्रह
दादू पंचों ये परमोधि ले, इन्हीं को उपदेश।
यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥149॥
अमर भये गुरु ज्ञान सौं, केते इहि कलि माहिं।
दादू गुरू के ज्ञान बिन, केते मरि मरि जाहिं ॥150॥
औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ ।
दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥151॥

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