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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
बाजीगर की पूतली, ज्यौं मर्कट मोह्या।
दादू माया राम की, सब जगत बिगोया ॥ 113 ॥
शिश्न स्वाद
मोरा मोरी देखकर, नाचै पंख पसार।
यों दादू घर आंगणै, हम नाचे कै बार ॥ 114 ॥
पुरुष प्रकाशक
दादू जिस घट दीपक राम का, तिस घट तिमिर न होइ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 115 ॥
माया
दादू जेहि घट ब्रह्म न प्रकटै, तहँ माया मंगल गाइ।
दादू जागै ज्योति जब, तब माया भ्रम विलाइ ॥ 116 ॥
पति पहचान
दादू जोति चमकै तिरवरे, दीपक देखै लोइ।
चन्द सूर का चान्दणा, पगार छलावा होइ ॥ 117 ॥
माया
दादू दीपक देह का, माया प्रगट होइ।
चौरासी लख पंखिया, तहाँ परै सब कोइ ॥ 118 ॥
पुरुष प्रकाशक
दादू यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश।
दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 119 ॥
विषय विरक्तता
दादू मन मृतक भया, इंद्री अपणै हाथ।
तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 120 ॥
जानै बूझै जीव सब, त्रिया पुरुष का अंग।
आपा पर भूला नहीं, दादू कैसा संग ॥ 121 ॥
माया के घट साजि द्वै, त्रिया पुरुष धरि नांव।
दोन्यूं सुन्दर खेलैं दादू, राखि लेहु बलि जांव ॥ 122 ॥

  • 156 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
बहिन बीर सब देखिये, नारी अरु भरतार ।
परमेश्वर के पेट का, दादू सब परिवार ॥ 123 ॥
पर घर परिहर आपणी, सब एकै उणहार ।
पसु प्राणी समझै नहीं, दादू मुग्ध गँवार ॥ 124 ॥
पुरुष पलट बेटा भया, नारी माता होहि ।
दादू को समझै नहीं, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 125 ॥
माता नारी पुरुष की, पुरुष नारी का पूत ।
दादू ज्ञान विचार कर, छाड़ गये अवधूत ॥ 126 ॥
अध्यात्म
दादू माया का जल पीवतां, व्याधि होइ विकार ।
सेझे का जल निर्मला, प्राण सुखी सुध सार ॥ 127 ॥
जीव गहिला जीव बावला, जीव दीवाना होइ ।
दादू अमृत छाड़ कर, विष पीवै सब कोइ ॥ 128 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, सुर नर उरझाया ।
विष का अमृत नाम धर, सब किनहूँ खाया ॥ 129 ॥
माया
माया मैली गुणमयी, धर धर उज्ज्वल नांम ।
दादू मोहे सबनि को, सुर नर सब ही ठांम ॥ 130 ॥
विषय अतृप्ति
विष का अमृत नांव धर, सब कोई खावै ।
दादू खारा ना कहै, यहु अचरज आवै ॥ 131 ॥
दादू जे विष जारे खाइ कर, जनि मुख में मेलै ।
आदि अन्त परलै गये, जे विष सौं खेलै ॥ 132 ॥
जिन विष खाया ते मुये, क्या मेरा तेरा ।
आग पराई आपणी, सब करै निबेरा ॥ 133 ॥

  • 157 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
अपना पराया खाइ विष, देखत ही मर जाय।
दादू को जीवै नहीं, इहि भोरे जनि खाय ॥ 134 ॥
दादू कहै, जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग।
देखत ही मर जाइगा, तजि विषिया रस भोग ॥ 135 ॥
माया
ब्रह्म सरीखा होइ कर, माया सौं खेलै।
दादू दिन दिन देखतां, अपने गुण मेलै ॥ 136 ॥
माया मारै लात सौ, हरि को घालै हाथ।
संग तजै सब झूठ का, गहै सच का साथ ॥ 137 ॥
घर के मारे वन के मारे, मारे स्वर्ग पयाल।
सूक्ष्म मोटा गूंथकर, माँड्या माया जाल ॥ 138 ॥
दादू ऊभा सारं, बैठा विचारं, संभारं जागत सूता।
तीन लोक तत जाल विडारण, तहाँ जाइगा पूता ॥139॥
मूये सरीखे है रहे, जीवन की क्या आस।
दादू राम विसार कर, बांछे भोग विलास ॥ 140 ॥
कृत्रिम कर्ता
माया रूपी राम को, सब कोई ध्यावै।
अलख आदि अनादि है, सो दादू गावै ॥ 141 ॥
ब्रह्मा का वेद, विष्णु की मूर्ति, पूजे सब संसारा।
महादेव की सेवा लागे, कहाँ है सिरजनहारा ॥ 142 ॥
माया का ठाकुर किया, माया की महामाइ।
ऐसे देव अनंत कर, सब जग पूजन जाइ ॥ 143 ॥
माया बैठी राम है, कहै मैं ही मोहन राइ।
ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, जोनी आवै जाइ ॥ 144 ॥
माया बैठी राम है, ताको लखै न कोइ।
सब जग मानै सत्य कर, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 145 ॥

  • 158 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
अंजन किया निरंजना, गुण निर्गुण जानें।
धरा दिखावैं अधर कर, कैसे मन मानैं ॥ 146 ॥
निरंजन की बात कहै, आवै अंजन माँहि।
दादू मन मानै नहीं, स्वर्ग रसातल जांहि ॥ 147 ॥
कामधेनु कै पटंतरे, करै काठ की गाइ।
दादू दूध दूझै नहीं, मूरख देइ बहाइ ॥ 148 ॥
चिंतामणि कंकर किया, माँगे कुछ न देइ।
दादू कंकर डारदे, चिंतामणि कर लेइ ॥ 149 ॥
पारस किया पाषाण का, कंचन कदे न होइ।
दादू आत्माराम बिन, भूल पड़या सब कोइ ॥ 150 ॥
सूरज फटिक पाषाण का, तासौं तिमिर न जाइ।
साचा सूरज परगटै, दादू तिमिर नशाइ ॥ 151 ॥
मूर्ति घड़ी पाषाण की, किया सिरजनहार।
दादू साच सूझै नहीं, यों डूबा संसार ॥ 152 ॥
पुरुष विदेश कामिनी किया, उसही के उणिहार।
कारज को सीझै नहीं, दादू माथे मार ॥ 153 ॥
कागद का मानुष किया, छत्रपति सिरमौर।
राजपाट साधै नहीं, दादू परिहर और ॥ 154 ॥
सकल भुवन भानै घड़ै, चतुर चलावनहार।
दादू सो सूझै नहीं, जिसका वार न पार ॥ 155 ॥
कर्ता साक्षीभूत
दादू पहली आप उपाइ कर, न्यारा पद निर्वाण।
ब्रह्मा विष्णु महेश मिल, बाँध्या सकल बंधाण ॥ 156 ॥
कृत्रिम कर्ता
नाम नीति अनीति सब, पहली बाँधे बंध।
पशु न जाणै पारधी, दादू रोपे फंध ॥ 157 ॥

  • 159 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू बाँधे वेद विधि, भरम करम उरझाइ ।
मर्यादा माँही रहै, सुमिरण किया न जाइ ॥ 158 ॥
माया नगरी दोष निरूपण
दादू माया मीठी बोलणी, नइ नइ लागै पाइ ।
दादू पैसि पेट में, काढ कलेजा खाइ ॥ 159 ॥
नारी नागिन जे डसे, ते नर मुये निदान ।
दादू को जीवै नहीं, पूछो सबै सयान ॥ 160 ॥
नारी नागिन एक सी, बाघिन बड़ी बलाइ ।
दादू जे नर रत भये, तिनका सर्वस खाइ ॥ 161 ॥
नारी नैन न देखिये, मुख सौं नाम न लेइ ।
कानों कामिनि जनि सुणै, यहु मन जाण न देइ ॥ 162 ॥
सुन्दरी खाये साँपिनी, केते इहि कलि माँहि ।
आदि अन्त इन सब डसे, दादू चेते नांहि ॥ 163 ॥
दादू पैसै पेट में, नारी नागिन होइ ।
दादू प्राणी सब डसे, काढ सकै न कोइ ॥ 164 ॥
माया सांपिनी सब डसे, कनक कामिनी होइ ।
ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, दादू बचै न कोइ ॥ 165 ॥
माया मारै जीव सब, खंड खंड कर खाइ ।
दादू घट का नास कर, रोवै जग पतियाइ ॥ 166 ॥
बाबा बाबा कहि गिलै, भाई कहि कहि खाइ ।
पूत पूत कहि पी गई, पुरुषा जनि पतियाइ ॥ 167 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश की, नारी माता होइ ।
दादू खाये जीव सब, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 168 ॥
माया बहुरूपी नटणी नाचै, सुर नर मुनि को मोहै ।
ब्रह्मा विष्णु महादेव बाहे, दादू बपुरा को है ॥ 169 ॥

  • 160 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
माया फाँसी हाथ ले, बैठी गोप छिपाहि ।
जे कोई धीजे प्राणियां, ताही के गल बाहि ॥ 170 ॥
पुरुषा फाँसी हाथ कर, कामिनि के गल बाहि ।
कामिनि कटारी कर गहै, मार पुरुष को खाहि ॥ 171 ॥
नारी बैरिन पुरुष की, पुरुषा बैरी नार।
अंत काल दोन्यूं मुये, दादू देख विचार ॥ 172 ॥
नारी पुरुष को ले मुई, पुरुषा नारी साथ।
दादू दोनों पच मुये, कछू न आया हाथ ॥ 173 ॥
नारी पीवै पुरुष को, पुरुष नारी को खाइ ।
दादू गुरु के ज्ञान बिन, दोनों गये विलाइ ॥ 174 ॥
भँवरा लुब्धी बास का, कमल बँधाना आइ ।
दिन दश माँहैं देखतां, दोनों गये विलाइ ॥ 175 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
बारहवां माया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 12 ॥ साखी 175 ॥

  • 161 -

सांच
का
अंग
www.dadooram.org
अथ सांच का अंग १३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
अदया हिंसा
दादू दया जिन्हों के दिल नहिं, बहुरि कहावें साध ।
जे मुख उनका देखिये, तो लागै बहु अपराध ॥ 2 ॥
दादू महर मोहब्बत मन नहीं, दिल के वज्र कठोर ।
काले काफिर ते कहिये, मोमिन मालिक और ॥ 3 ॥

  • 162 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
दादू कोई काहू जीव की, करै आत्माघात ।
साच कहूँ संशय नहीं, सो प्राणी दोज़ख जात ॥ 4 ॥
दादू नाहर सिंह सियाल सब, केते मुसलमान ।
माँस खाइ मोमिन भये, बड़े मियां का ज्ञान ॥ 5 ॥
दादू माँस अहारी जे नरा, ते नर सिंह सियाल ।
बक1 मंजार2 सुनहाँ3 सही, एता प्रत्यक्ष काल ॥ 6 ॥
दादू मुई मार मानुष घणे, ते प्रत्यक्ष जम काल ।
महर दया नहीं सिंह दिल, कूकर काग सियाल ॥ 7 ॥
माँस अहारी मद पीवै, विषय विकारी सोइ ।
दादू आत्मराम बिन, दया कहाँ थी होइ ॥ 8 ॥
लंगर लोग लोभ सौं लागैं, बोलैं सदा उन्हों की भीर ।
जोर जुल्म बीच बटपारे, आदि अंत उन्हीं सौं सीर ॥ 9 ॥
तन मन मार रहे सांई सौं, तिनकौं देख करैं ताजीर ।
ये बड़ि-बूझ कहाँ थैं पाई, ऐसी कजा अवलिया पीर ॥ 10 ॥
बे महर गुमराह गाफिल, गोश्त खुरदनी ।
बेदिल बदकार आलम, हयात मुरदनी ॥ 11 ॥
छल कर बल कर घाइ कर, मारै जिंहि तिंहि फेरि ।
दादू ताहि न धीजिये, परणै सगी पतेरि ॥ 12 ॥
दादू दुनियां सौं दिल बांध करि, बैठे दीन गँवाइ ।
नेकी नाम बिसार करि, करद कमाया खाइ ॥ 13 ॥
दादू गल काटैं कलमा भरैं, अया विचारा दीन ।
पंचों वक्त नमाज गुजारैं, साबित नहीं यकीन ॥ 14 ॥
दुनियां के पीछे पड़ा, दौड़ा दौड़ा जाइ ।
दादू जिन पैदा किया, ता साहिब को छिटकाइ ॥ 15 ॥

  • 163 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
कुफ्र जे के मन में, मीयां मुसलमान ।
दादू पेया झंग में, बिसारे रहमान ॥ 16 ॥
आपस को मारै नहीं, पर को मारन जाइ ।
दादू आपा मारे बिना, कैसे मिले खुदाइ ॥ 17 ॥
दादू भीतर द्वन्दर भर रहे, तिनको मारैं नांहि ।
साहिब की अरवाह को, ताको मारन जांहि ॥ 18 ॥
दादू मूये को क्या मारिये, मीयां मूई मार ।
आपस को मारै नहीं, औरों को हुसियार ॥ 19 ॥
सांच
जिसका था तिसका हुआ, तो काहे का दोष ।
दादू बंदा बंदगी, मीयां ना कर रोष ॥ 20 ॥
सेवक सिरजनहार का, साहिब का बंदा ।
दादू सेवा बंदगी, दूजा क्या धंधा ॥ 21 ॥
सो काफिर जे बोलै काफ, दिल अपना नहीं राखै साफ।
सांई को पहचानै नांहीं, कूड़ कपट सब उन्हींमांहीं ॥ 22 ॥
साँई का फरमान न मानैं, कहाँ पीव ऐसै कर जानैं ।
मन अपणे में समझत नांहीं, निरखत चलैं अपनी छांहीं ॥ 23 ॥
जोर करै मसकीन सतावै, दिल उसके में दर्द न आवै ।
सांई सेती नांही नेह, गर्व करै अति अपनी देह ॥ 24 ॥
इन बातन क्यों पावै पीव, पर धन ऊपर राखै जीव ।
जोर जुल्म कर कुटुम्ब सौं खाइ, सो काफिर दोजख में जाइ ॥ 25 ॥
अदया-हिंसा
दादू जाको मारन जाइये, सोई फिर मारै ।
जाको तारन जाइये, सोई फिर तारै ॥ 26 ॥

  • 164 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
दादू नफ्स नाम सौं मारिये, गोशमाल दे पंद।
दूई है सो दूरि कर, तब घर में आनन्द ॥ 27 ॥
सच्चे मुसलमान के लक्षण
मुसलमान जो राखे मान, सांई का माने फरमान।
सारों को सुखदाई होइ, मुसलमान कर जानूँ सोइ ॥ 28 ॥
दादू मुसलमान महर गह रहै, सबको सुख, किसही नहिं दहै।
मुवा न खाइ, जीवत नहिं मारै, करै बंदगी, राह संवारै ॥ 29 ॥
सो मोमिन मन मे कर जान, सत्य सबूरी बैसे आन।
चलै साच सँवारे बाट, तिनको खुले बहिश्त के पाट ॥ 30 ॥
सो मोमिन मोम दिल होइ, सांई को पहचानै सोइ।
जोर न करै हराम न खाइ, सो मोमिन बहिश्त में जाइ ॥ 31 ॥
जो हम नहीं गुजारते, तुम्ह को क्या भाई।
सीर नहीं कुछ बंदगी, कहु क्यों फरमाई ॥ 32 ॥
अपने अमलों छूटिये, काहू के नाहीं।
सोई पीड़ पुकार सी, जा दूखै माहीं ॥ 33 ॥
कोई खाइ अघाइ करि, भूखे क्यों भरिये।
खूटी पूगी आन की, आपण क्यों मरिये ॥ 34 ॥
फूटी नाव समंद में, सब डूबन लागे।
अपना अपना जीव ले, सब कोई भागे ॥ 35 ॥
दादू शिर शिर लागी आपने, कहु कौण बुझावै।
अपना अपना साच दे, सांई को भावै ॥ 36 ॥
सुमिरण नाम चितावनी
साचा नाम अल्लाह का, सोई सत्य कर जाण।
निश्चल कर ले बंदगी, दादू सो परमाण ॥ 37 ॥

  • 165 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
आवट कूटा होत है, अवसर बीता जाइ ।
दादू कर ले बंदगी, राखणहार खुदाइ ॥ 38 ॥
इस कलि केते ह्वै गये, हिंदू मुसलमान ।
दादू सांची बंदगी, झूठा सब अभिमान ॥ 39 ॥
कथनी बिना करणी
पोथी अपना पिंड कर, हरि यश माँहीं लेख ।
पंडित अपना प्राण कर, दादू कथहु अलेख ॥ 40 ॥
काया कतेब बोलिए, लिख राखूं रहमान ।
मनवा मुल्लां बोलिये, श्रोता है सुबहान ॥ 41 ॥
दादू काया महल में नमाज गुजारूं, तहँ और न आवन पावै ।
मन मणके कर तसबीह फेरूं, तब साहिब के मन भावै ॥ 42 ॥
दिल दरिया में गुसल हमारा, ऊजू कर चित लाऊँ ।
साहिब आगेकरूं बंदगी, बेर बेर बलि जाऊँ ॥ 43 ॥
दादू पंचों संग संभालूं सांई, तन मन तब सुख पाऊँ।
प्रेम पियाला पिवजी देवै, कलमा ये लै लाऊँ ॥ 44 ॥
शोभा कारण सब करै, रोजा बांग नमाज ।
मुवा न एकौ आह सौं, जे तुझ साहिब सेती काज ॥ 45 ॥
हर रोज हजूरी होइ रहु, काहे करै कलाप ।
मुल्ला तहाँ पुकारिये, जहाँ अर्श इलाही आप ॥ 46 ॥
हरदम हाजिर होना बाबा, जब लग जीवै बंदा ।
दायम दिल सांई सौं साबित, पंच वक्त क्या धंधा ॥ 47 ॥
हिंदू मुसलमानों का भ्रम
दादू हिंदू मारग कहैं हमारा, तुरक कहैं रह मेरी ।
कहाँ पंथ है कहो अलह का? तुम तो ऐसी हेरी ॥ 48 ॥
दादू दुई दरोग लोग को भावै, सांई को साँच पियारा ।
कौन पंथ हम चलैं कहो धू, साधो करो विचारा ॥ 49 ॥

  • 166 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
खंड खंड कर ब्रह्म को, पख पख लीया बाँट।
दादू पूरण ब्रह्म तज, बँधे भरम की गाँठ ॥ 50 ॥
मन विकार औषधि
जीवत दीसै रोगिया, कहैं मूवां पीछे जाइ।
दादू दुँह के पाठ में, ऐसी दारू लाइ ॥ 51 ॥
सो दारू किस काम की, जाथैं दर्द न जाइ।
दादू काटै रोग को, सो दारू ले लाइ ॥ 52 ॥
दादू अनुभव काटै रोग को, अनहद उपजै आइ।
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौ लाइ ॥ 53 ॥
सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तत सार।
सुनतां ही साहिब मिलै, मन के जाहिं विकार ॥ 54 ॥
चानक उपदेश
औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ।
दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥ 55 ॥
एक सेर का ठांवड़ा, क्योंही भऱ्या न जाइ।
भूख न भागी जीव की, दादू केता खाइ ॥ 56 ॥
पशुवां की नांई भर भर खाइ, व्याधि घणेरी बधती जाइ।
पशुवां नांई करै अहार, दादू बाढै रोग अपार ॥ 57 ॥
राम रसायन भर भर पीवै, दादू जोगी जुग जुग जीवै।
संयम सदा, न व्यापै व्याधी, रहै निरोगी लगै समाधी ॥ 58 ॥
शिश्न श्वास
दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल।
जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥ 59 ॥
भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ।
दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥ 60 ॥

  • 167 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
दादू खाटा मीठा खाइ करि, स्वादैं चित दीया ।
इन में जीव विलंबिया, हरि नाम न लीया ॥ 61 ॥
भक्ति न जाणै राम की, इन्द्री के आधीन ।
दादू बँध्या स्वाद सौं, ताथैं नाम न लीन ॥ 62 ॥
सांच
दादू अपना नीका राखिये, मैं मेरा दिया बहाइ ।
तुझ अपने सेती काज है, मैं मेरा भावै तीधर जाइ ॥ 63 ॥
जे हम जाण्या एक कर, तो काहे लोक रिसाइ ।
मेरा था सो मैं लिया, लोगों का क्या जाइ ॥ 64 ॥
करणी बिना कथनी
दादू द्वै द्वै पद किये, साखी भी द्वै चार ।
हमको अनुभव ऊपजी, हम ज्ञानी संसार ॥ 65 ॥
सुन सुन पर्चै ज्ञान के, साखी शब्द्दी होइ ।
तब ही आपा ऊपजै, हम-सा और न कोइ ॥ 66 ॥
सो उपज किस काम की, जे जण जण करै क्लेश ।
साखी सुन समझै साधु की, ज्यों रसना रस शेष ॥ 67 ॥
दादू पद जोड़ै साखी कहै, विषय न छाड़ै जीव ।
पानी घालि बिलोइये तो, क्यों करि निकसै घीव ॥ 68 ॥
दादू पद जोड़े का पाइये, साखी कहे का होइ ।
सत्य शिरोमणि सांइयां, तत्त न चीन्हा सोइ ॥ 69 ॥
कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल ।
बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥ 70 ॥
दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।
कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥ 71 ॥
कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम ।
कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥ 72 ॥

  • 168 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
चौंप चरचा
दादू श्रोता घर नहीं, वक्ता बकै सु बादि ।
वक्ता श्रोता एक रस, कथा कहावै आदि ॥ 73 ॥
वक्ता श्रोता घर नहीं, कहै सुनै को राम ।
दादू यहु मन थिर नहीं, बाद बकै बेकाम ॥ 74 ॥
विचार दृढ़ ज्ञान
अन्तर सुरझे समझ कर, फिर न अरूझे जाइ ।
बाहर सुरझे देखतां, बहुरि अरूझे आइ ॥ 75 ॥
झूठै गुरु
आतम लावै आप सौं, साहिब सेती नांहि ।
दादू को निपजै नहीं, दोन्यूं निष्फल जांहि ॥ 76 ॥
तू मुझ को मोटा कहै, हौं तुझ बड़ाई मान ।
सांई को समझै नहीं, दादू झूठा ज्ञान ॥ 77 ॥
कस्तूरिया मृग
सदा समीप रहै संग सन्मुख, दादू लखै न गूझ ।
सपने ही समझै नहीं, क्यों कर लहै अबूझ ॥ 78 ॥
बेखर्च व्यसनी
दादू सेवक नाम बुलाइये, सेवा सपनैं नांहिं ।
नाम धराये का भया, जे एक नहीं मन माहिं ॥ 79 ॥
नाम धरावै दास का, दासातन थैं दूर ।
दादू कारज क्यों सरै, हरि सौं नहीं हजूर ॥ 80 ॥
भक्त न होवै भक्ति बिन, दासातन बिन दास ।
बिन सेवा सेवक नहीं, दादू झूठी आस ॥ 81 ॥
राम भक्ति भावै नहीं, अपनी भक्ति का भाव ।
राम भक्ति मुख सौं कहै, खेलै अपना डाव ॥ 82 ॥

  • 169 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
भक्ति निराली रह गई, हम भूल पड़े वन माहिं।
भक्ति निरंजन राम की, दादू पावै नांहिं ॥ 83 ॥
सो दशा कतहूँ रही, जिहि दिशि पहुंचै साध।
मैं तैं मूरख गह रहे, लोभ बड़ाई बाद ॥ 84 ॥
दादू राम विसार कर, कीये बहु अपराध।
लाजों मारे संत सब, नांव हमारा साध ॥ 85 ॥
करणी बिना कथनी
मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै।
ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥ 86 ॥
दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं।
मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥ 87 ॥
दादू बातों ही पहुंचै नहीं, घर दूर पयाना।
मारग पन्थी उठि चलै, दादू सोई सयाना ॥ 88 ॥
बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै।
मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥ 89 ॥
समझ सुजानता
दादू कासौँ कहि समझाइये, सब कोई चतुर सुजान।
कीड़ी कुंजर आदि दे, नाहिंन कोई अजान ॥ 90 ॥
करणी बिना कथनी
शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट माँहि।
कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणैं नाहिं ॥ 91 ॥
दादू सूना घट सोधी नहीं, पंडित ब्रह्मा पूत।
आगम निगम सब कथैं, घर में नाचै भूत ॥ 92 ॥
पढे न पावै परमगति, पढे न लंघै पार।
पढे न पहुंचै प्राणियां, दादू पीड़ पुकार ॥ 93 ॥

  • 170 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13

दादू निवरे नाम बिन, झूठा कथैं गियान ।
बैठे सिर खाली करें, पंडित वेद पुरान ॥ 94 ॥
दादू केते पुस्तक पढ़ मुये, पंडित वेद पुरान ।
केते ब्रह्मा कथ गये, नांहिन राम समान ॥ 95 ॥
सब हम देख्या सोध कर, वेद कुरानों माँहि ।
जहाँ निरंजन पाइये, सो देश दूर, इत नांहि ॥ 96 ॥
पढ पढ थाके पंडिता, किनहूँ न पाया पार ।
कथ कथ थाके मुनिजना, दादू नाम अधार ॥ 97 ॥
काजी कजा न जानहीं, कागद हाथ कतेब ।
पढतां पढतां दिन गये, भीतर नांहि भेद ॥ 98 ॥
मसि कागज के आसरे, क्यों छूटै संसार ?
राम बिना छूटै नहीं, दादू भ्रम विकार ॥ 99 ॥
कागद काले कर मुए, केते वेद पुराण ।
एकै अक्षर पीव का, दादू पढै सुजान ॥ 100 ॥
एकै अक्षर प्रेम का, कोई पढेगा एक।
दादू पुस्तक प्रेम बिन, केते पढ़ें अनेक ॥ 101 ॥
दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोइ ।
बेद पुरान पुस्तक पढै, प्रेम बिना क्या होइ ॥ 102 ॥
दादू कहतां कहतां दिन गये, सुनतां सुनतां जाइ ।
दादू ऐसा को नहीं, कहि सुनि राम समाइ ॥ 103 ॥
मध्य निरपक्ष
मौन गहैं ते बावरे, बोलैं खरे अयान ।
सहजैं राते राम सौं, दादू सोई सयान ॥ 104 ॥
करुणा
कहतां सुनतां दिन गये, है कछू न आवा ।
दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछतावा ॥ 105 ॥

  • 171 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
अनाधिकारी
दादू कथनी और कुछ, करणी करैं कछु और।
तिन थैं मेरा जीव डरै, जिनके ठीक न ठौर ॥ 106 ॥
अन्तरगत औरै कछु, मुख रसना कुछ और।
दादू करणी और कुछ, तिनको नांही ठौर ॥ 107 ॥
मन प्रबोध
दादू राम मिलन की कहत हैं, करते कुछ औरे।
ऐसे पीव क्यौं पाइये, समझि मन बौरे ॥ 108 ॥
बेखर्च व्यसनी
दादू बगनी भंगा खाइ कर, मतवाले माँझी।
पैका नांही गांठड़ी, पातशाह खांजी ॥ 109 ॥
दादू टोटा दालिदी, लाखों का व्यौपार।
पैका नांही गांठड़ी, सिरै साहूकार ॥ 110 ॥
मध्य निष्पक्ष-सब मतों का निशाना एक
दादू ये सब किसके पंथ में, धरती अरु आसमान।
पानी पवन दिन रात का, चंद सूर रहमान ॥ 111 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश का, कौन पंथ गुरुदेव।
सांई सिरजनहार तूं, कहिये अलख अभेव ॥ 112 ॥
मुहम्मद किसके दीन में, जिब्राईल किस राह?
इनके मुर्शिद पीर की, कहिये एक अल्लाह ॥ 113 ॥
दादू ये सब किसके ह्वै रहे, यहु मेरे मन माँहि।
अलख इलाही जगत-गुरु, दूजा कोई नांहि ॥ 114 ॥
पतिव्रत व्यभिचार
दादू औरैं ही औला तके, थीयां सदै बियंनि।
सो तू मीयां ना घुरै, जो मीयां मीयंनि ॥ 115 ॥

  • 172 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
सत्य असत्य गुरु पारख लक्षण
आई रोजी ज्यों गई, साहिब का दीदार।
गहला लोगों कारणैं, देखै नहीं गँवार ॥ 116 ॥
पतिव्रत निष्काम
दादू सोई सेवक राम का, जिसे न दूजी चिंत।
दूजा को भावै नहीं, एक पियारा मिंत ॥ 117 ॥
भ्रम विध्वंसण
अपनी अपनी जाति सौं, सब को बैसैं पांति।
दादू सेवग राम का, ताके नहीं भरांति ॥ 118 ॥
चोर अन्याई मसखरा, सब मिलि बैसैं पांति।
दादू सेवक राम का, तिन सौं करें भरांति ॥ 119 ॥
दादू सूप बजायां क्यों टलै, घर में बड़ी बलाइ।
काल झाल इस जीव का, बातन ही क्यों जाइ?120 ॥
साँप गया सहनाण को, सब मिलि मारैं लोक।
दादू ऐसा देखिए, कुल का डगरा फोक ॥ 121 ॥
दादू दोन्यूँ भरम हैं, हिन्दू तुरक गंवार।
जे दुहुवाँ थैं रहित है, सो गहि तत्त्व विचार ॥ 122 ॥
अपना अपना कर लिया, भंजन माँही बाहि।
दादू एकै कूप जल, मन का भ्रम उठाहि ॥ 123 ॥
दादू पानी के बहु नाम धर, नाना विधि की जात।
बोलणहारा कौन है, कहो धौं कहाँ समात ॥ 124 ॥
जब पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक।
काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥ 125 ॥
अमिट पाप प्रचण्ड
भाव भक्ति उपजै नहीं, साहिब का प्रसंग।
विषय विकार छूटै नहीं, सो कैसा सत्संग ॥ 126 ॥

  • 173 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
बासण विषय विकार के, तिनको आदर मान ।
संगी सिरजनहार के, तिन सौं गर्व गुमान ॥ 127 ॥
अंधे को दीपक दिया, तो भी तिमिर न जाय ।
सोधी नहीं शरीर की, तासन का समझाइ ॥ 128 ॥
सगुरा निगुरा
दादू कहिए कुछ उपकार को, मानै अवगुण दोष ।
अंधे कूप बताइया, सत्य न मानै लोक ॥ 129 ॥
कालर खेत न नीपजै, जे बाहे सौ बार ।
दादू हाना बीज का, क्या पचि मरै गँवार ॥ 130 ॥
कृत्रिम कर्ता
दादू जिन कंकर पत्थर सेविया, सो अपना मूल गँवाइ ।
अलख देव अंतर बसै, क्या दूजी जगह जाइ ॥ 131 ॥
पत्थर पीवे धोइ कर, पत्थर पूजे प्राण ।
अन्तकाल पत्थर भये, बहु बूडे इहि ज्ञान ॥ 132 ॥
कंकर बंध्या गांठड़ी, हीरे के विश्वास ।
अंतकाल हरि जौहरी, दादू सूत कपास ॥ 133 ॥
दादू पहली पूजे ढूंढसी, अब भी ढूंढस बाणि ।
आगे ढूंढस होइगा, दादू सत्य कर जाणि ॥ 134 ॥
भ्रम विध्वंसण
दादू पैंडे पाप के, कदे न दीजे पांव ।
जिहिं पैंडे मेरा पीव मिले, तिहिं पैंडे का चाव ॥ 135 ॥
दादू सुकृत मारग चालतां, बुरा न कबहुँ होइ ।
अमृत खातां प्राणिया, मुवा न सुनिया कोइ ॥ 136 ॥
कुछ नाहीं का नाम क्या, जे धरिये सो झूठ।
सुर नर मुनिजन बंधिया, लोका आवट कूट ॥ 137 ॥

  • 174 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
कुछ नाहीं का नाम धर, भरम्या सब संसार।
सच झूठ समझै नहीं, ना कुछ किया विचार ॥ 138 ॥
कस्तूरिया मृग
दादू केई दौडे द्वारिका, केई काशी जांहि।
केई मथुरा को चले, साहिब घट ही माँहि ॥ 139 ॥
पूजनहारे पास हैं, देही माँही देव।
दादू ताको छाड़ कर, बाहर माँडी सेव ॥ 140 ॥
सांच
ऊपरि आलम सब करें, साधू जन घट माँहि।
दादू एता अन्तरा, ताथैं बनती नांहि ॥ 141 ॥
दादू सब थे एक के, सो एक न जाना।
जने जने का है गया, यहु जगत दिवाना ॥ 142 ॥
दादू झूठा साचा कर लिया, विष अमृत जाना।
दुख को सुख सब को कहै, ऐसा जगत दिवाना ॥ 143 ॥
सूधा मारग साच का, साचा हो सो जाइ।
झूठा कोई ना चलै, दादू दिया दिखाइ ॥ 144 ॥
साहिब सौं साचा नहीं, यहु मन झूठा होइ।
दादू झूठे बहुत हैं, साचा विरला कोइ ॥ 145 ॥
दादू साचा अंग न ठेलिये, साहिब माने नांहि।
साचा सिर पर राखिये, मिलि रहिये ता माँहि ॥ 146 ॥
जे कोई ठेले साच कौं, तो साचा रहै समाइ।
कौड़ी बर क्यों दीजिये, रत्न अमोलक जाइ ॥ 147 ॥
साचे साहिब को मिले, साचे मारग जाइ।
साचे सौं साचा भया, तब साचे लिये बुलाइ ॥ 148 ॥
दादू साचा साहिब सेविये, साची सेवा होइ।
साचा दर्शन पाइये, साचा सेवक सोइ ॥ 149 ॥

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