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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 504 में से

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पृष्ठ 156

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
बाजीगर की पूतली, ज्यौं मर्कट मोह्या।
दादू माया राम की, सब जगत बिगोया ॥ 113 ॥
शिश्न स्वाद
मोरा मोरी देखकर, नाचै पंख पसार।
यों दादू घर आंगणै, हम नाचे कै बार ॥ 114 ॥
पुरुष प्रकाशक
दादू जिस घट दीपक राम का, तिस घट तिमिर न होइ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 115 ॥
माया
दादू जेहि घट ब्रह्म न प्रकटै, तहँ माया मंगल गाइ।
दादू जागै ज्योति जब, तब माया भ्रम विलाइ ॥ 116 ॥
पति पहचान
दादू जोति चमकै तिरवरे, दीपक देखै लोइ।
चन्द सूर का चान्दणा, पगार छलावा होइ ॥ 117 ॥
माया
दादू दीपक देह का, माया प्रगट होइ।
चौरासी लख पंखिया, तहाँ परै सब कोइ ॥ 118 ॥
पुरुष प्रकाशक
दादू यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश।
दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 119 ॥
विषय विरक्तता
दादू मन मृतक भया, इंद्री अपणै हाथ।
तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 120 ॥
जानै बूझै जीव सब, त्रिया पुरुष का अंग।
आपा पर भूला नहीं, दादू कैसा संग ॥ 121 ॥
माया के घट साजि द्वै, त्रिया पुरुष धरि नांव।
दोन्यूं सुन्दर खेलैं दादू, राखि लेहु बलि जांव ॥ 122 ॥

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