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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 504 में से

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पृष्ठ 168

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
दादू खाटा मीठा खाइ करि, स्वादैं चित दीया ।
इन में जीव विलंबिया, हरि नाम न लीया ॥ 61 ॥
भक्ति न जाणै राम की, इन्द्री के आधीन ।
दादू बँध्या स्वाद सौं, ताथैं नाम न लीन ॥ 62 ॥
सांच
दादू अपना नीका राखिये, मैं मेरा दिया बहाइ ।
तुझ अपने सेती काज है, मैं मेरा भावै तीधर जाइ ॥ 63 ॥
जे हम जाण्या एक कर, तो काहे लोक रिसाइ ।
मेरा था सो मैं लिया, लोगों का क्या जाइ ॥ 64 ॥
करणी बिना कथनी
दादू द्वै द्वै पद किये, साखी भी द्वै चार ।
हमको अनुभव ऊपजी, हम ज्ञानी संसार ॥ 65 ॥
सुन सुन पर्चै ज्ञान के, साखी शब्द्दी होइ ।
तब ही आपा ऊपजै, हम-सा और न कोइ ॥ 66 ॥
सो उपज किस काम की, जे जण जण करै क्लेश ।
साखी सुन समझै साधु की, ज्यों रसना रस शेष ॥ 67 ॥
दादू पद जोड़ै साखी कहै, विषय न छाड़ै जीव ।
पानी घालि बिलोइये तो, क्यों करि निकसै घीव ॥ 68 ॥
दादू पद जोड़े का पाइये, साखी कहे का होइ ।
सत्य शिरोमणि सांइयां, तत्त न चीन्हा सोइ ॥ 69 ॥
कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल ।
बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥ 70 ॥
दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।
कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥ 71 ॥
कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम ।
कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥ 72 ॥

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