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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 504 में से

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पृष्ठ 170

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
भक्ति निराली रह गई, हम भूल पड़े वन माहिं।
भक्ति निरंजन राम की, दादू पावै नांहिं ॥ 83 ॥
सो दशा कतहूँ रही, जिहि दिशि पहुंचै साध।
मैं तैं मूरख गह रहे, लोभ बड़ाई बाद ॥ 84 ॥
दादू राम विसार कर, कीये बहु अपराध।
लाजों मारे संत सब, नांव हमारा साध ॥ 85 ॥
करणी बिना कथनी
मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै।
ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥ 86 ॥
दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं।
मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥ 87 ॥
दादू बातों ही पहुंचै नहीं, घर दूर पयाना।
मारग पन्थी उठि चलै, दादू सोई सयाना ॥ 88 ॥
बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै।
मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥ 89 ॥
समझ सुजानता
दादू कासौँ कहि समझाइये, सब कोई चतुर सुजान।
कीड़ी कुंजर आदि दे, नाहिंन कोई अजान ॥ 90 ॥
करणी बिना कथनी
शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट माँहि।
कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणैं नाहिं ॥ 91 ॥
दादू सूना घट सोधी नहीं, पंडित ब्रह्मा पूत।
आगम निगम सब कथैं, घर में नाचै भूत ॥ 92 ॥
पढे न पावै परमगति, पढे न लंघै पार।
पढे न पहुंचै प्राणियां, दादू पीड़ पुकार ॥ 93 ॥

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