सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12
अंजन किया निरंजना, गुण निर्गुण जानें।
धरा दिखावैं अधर कर, कैसे मन मानैं ॥ 146 ॥
निरंजन की बात कहै, आवै अंजन माँहि।
दादू मन मानै नहीं, स्वर्ग रसातल जांहि ॥ 147 ॥
कामधेनु कै पटंतरे, करै काठ की गाइ।
दादू दूध दूझै नहीं, मूरख देइ बहाइ ॥ 148 ॥
चिंतामणि कंकर किया, माँगे कुछ न देइ।
दादू कंकर डारदे, चिंतामणि कर लेइ ॥ 149 ॥
पारस किया पाषाण का, कंचन कदे न होइ।
दादू आत्माराम बिन, भूल पड़या सब कोइ ॥ 150 ॥
सूरज फटिक पाषाण का, तासौं तिमिर न जाइ।
साचा सूरज परगटै, दादू तिमिर नशाइ ॥ 151 ॥
मूर्ति घड़ी पाषाण की, किया सिरजनहार।
दादू साच सूझै नहीं, यों डूबा संसार ॥ 152 ॥
पुरुष विदेश कामिनी किया, उसही के उणिहार।
कारज को सीझै नहीं, दादू माथे मार ॥ 153 ॥
कागद का मानुष किया, छत्रपति सिरमौर।
राजपाट साधै नहीं, दादू परिहर और ॥ 154 ॥
सकल भुवन भानै घड़ै, चतुर चलावनहार।
दादू सो सूझै नहीं, जिसका वार न पार ॥ 155 ॥
कर्ता साक्षीभूत
दादू पहली आप उपाइ कर, न्यारा पद निर्वाण।
ब्रह्मा विष्णु महेश मिल, बाँध्या सकल बंधाण ॥ 156 ॥
कृत्रिम कर्ता
नाम नीति अनीति सब, पहली बाँधे बंध।
पशु न जाणै पारधी, दादू रोपे फंध ॥ 157 ॥
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