सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
चौंप चरचा
दादू श्रोता घर नहीं, वक्ता बकै सु बादि ।
वक्ता श्रोता एक रस, कथा कहावै आदि ॥ 73 ॥
वक्ता श्रोता घर नहीं, कहै सुनै को राम ।
दादू यहु मन थिर नहीं, बाद बकै बेकाम ॥ 74 ॥
विचार दृढ़ ज्ञान
अन्तर सुरझे समझ कर, फिर न अरूझे जाइ ।
बाहर सुरझे देखतां, बहुरि अरूझे आइ ॥ 75 ॥
झूठै गुरु
आतम लावै आप सौं, साहिब सेती नांहि ।
दादू को निपजै नहीं, दोन्यूं निष्फल जांहि ॥ 76 ॥
तू मुझ को मोटा कहै, हौं तुझ बड़ाई मान ।
सांई को समझै नहीं, दादू झूठा ज्ञान ॥ 77 ॥
कस्तूरिया मृग
सदा समीप रहै संग सन्मुख, दादू लखै न गूझ ।
सपने ही समझै नहीं, क्यों कर लहै अबूझ ॥ 78 ॥
बेखर्च व्यसनी
दादू सेवक नाम बुलाइये, सेवा सपनैं नांहिं ।
नाम धराये का भया, जे एक नहीं मन माहिं ॥ 79 ॥
नाम धरावै दास का, दासातन थैं दूर ।
दादू कारज क्यों सरै, हरि सौं नहीं हजूर ॥ 80 ॥
भक्त न होवै भक्ति बिन, दासातन बिन दास ।
बिन सेवा सेवक नहीं, दादू झूठी आस ॥ 81 ॥
राम भक्ति भावै नहीं, अपनी भक्ति का भाव ।
राम भक्ति मुख सौं कहै, खेलै अपना डाव ॥ 82 ॥
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