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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 504 में से

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पृष्ठ 175

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
कुछ नाहीं का नाम धर, भरम्या सब संसार।
सच झूठ समझै नहीं, ना कुछ किया विचार ॥ 138 ॥
कस्तूरिया मृग
दादू केई दौडे द्वारिका, केई काशी जांहि।
केई मथुरा को चले, साहिब घट ही माँहि ॥ 139 ॥
पूजनहारे पास हैं, देही माँही देव।
दादू ताको छाड़ कर, बाहर माँडी सेव ॥ 140 ॥
सांच
ऊपरि आलम सब करें, साधू जन घट माँहि।
दादू एता अन्तरा, ताथैं बनती नांहि ॥ 141 ॥
दादू सब थे एक के, सो एक न जाना।
जने जने का है गया, यहु जगत दिवाना ॥ 142 ॥
दादू झूठा साचा कर लिया, विष अमृत जाना।
दुख को सुख सब को कहै, ऐसा जगत दिवाना ॥ 143 ॥
सूधा मारग साच का, साचा हो सो जाइ।
झूठा कोई ना चलै, दादू दिया दिखाइ ॥ 144 ॥
साहिब सौं साचा नहीं, यहु मन झूठा होइ।
दादू झूठे बहुत हैं, साचा विरला कोइ ॥ 145 ॥
दादू साचा अंग न ठेलिये, साहिब माने नांहि।
साचा सिर पर राखिये, मिलि रहिये ता माँहि ॥ 146 ॥
जे कोई ठेले साच कौं, तो साचा रहै समाइ।
कौड़ी बर क्यों दीजिये, रत्न अमोलक जाइ ॥ 147 ॥
साचे साहिब को मिले, साचे मारग जाइ।
साचे सौं साचा भया, तब साचे लिये बुलाइ ॥ 148 ॥
दादू साचा साहिब सेविये, साची सेवा होइ।
साचा दर्शन पाइये, साचा सेवक सोइ ॥ 149 ॥

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