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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 504 में से

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पृष्ठ 164

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
कुफ्र जे के मन में, मीयां मुसलमान ।
दादू पेया झंग में, बिसारे रहमान ॥ 16 ॥
आपस को मारै नहीं, पर को मारन जाइ ।
दादू आपा मारे बिना, कैसे मिले खुदाइ ॥ 17 ॥
दादू भीतर द्वन्दर भर रहे, तिनको मारैं नांहि ।
साहिब की अरवाह को, ताको मारन जांहि ॥ 18 ॥
दादू मूये को क्या मारिये, मीयां मूई मार ।
आपस को मारै नहीं, औरों को हुसियार ॥ 19 ॥
सांच
जिसका था तिसका हुआ, तो काहे का दोष ।
दादू बंदा बंदगी, मीयां ना कर रोष ॥ 20 ॥
सेवक सिरजनहार का, साहिब का बंदा ।
दादू सेवा बंदगी, दूजा क्या धंधा ॥ 21 ॥
सो काफिर जे बोलै काफ, दिल अपना नहीं राखै साफ।
सांई को पहचानै नांहीं, कूड़ कपट सब उन्हींमांहीं ॥ 22 ॥
साँई का फरमान न मानैं, कहाँ पीव ऐसै कर जानैं ।
मन अपणे में समझत नांहीं, निरखत चलैं अपनी छांहीं ॥ 23 ॥
जोर करै मसकीन सतावै, दिल उसके में दर्द न आवै ।
सांई सेती नांही नेह, गर्व करै अति अपनी देह ॥ 24 ॥
इन बातन क्यों पावै पीव, पर धन ऊपर राखै जीव ।
जोर जुल्म कर कुटुम्ब सौं खाइ, सो काफिर दोजख में जाइ ॥ 25 ॥
अदया-हिंसा
दादू जाको मारन जाइये, सोई फिर मारै ।
जाको तारन जाइये, सोई फिर तारै ॥ 26 ॥

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