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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 504 में से

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पृष्ठ 157

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
बहिन बीर सब देखिये, नारी अरु भरतार ।
परमेश्वर के पेट का, दादू सब परिवार ॥ 123 ॥
पर घर परिहर आपणी, सब एकै उणहार ।
पसु प्राणी समझै नहीं, दादू मुग्ध गँवार ॥ 124 ॥
पुरुष पलट बेटा भया, नारी माता होहि ।
दादू को समझै नहीं, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 125 ॥
माता नारी पुरुष की, पुरुष नारी का पूत ।
दादू ज्ञान विचार कर, छाड़ गये अवधूत ॥ 126 ॥
अध्यात्म
दादू माया का जल पीवतां, व्याधि होइ विकार ।
सेझे का जल निर्मला, प्राण सुखी सुध सार ॥ 127 ॥
जीव गहिला जीव बावला, जीव दीवाना होइ ।
दादू अमृत छाड़ कर, विष पीवै सब कोइ ॥ 128 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, सुर नर उरझाया ।
विष का अमृत नाम धर, सब किनहूँ खाया ॥ 129 ॥
माया
माया मैली गुणमयी, धर धर उज्ज्वल नांम ।
दादू मोहे सबनि को, सुर नर सब ही ठांम ॥ 130 ॥
विषय अतृप्ति
विष का अमृत नांव धर, सब कोई खावै ।
दादू खारा ना कहै, यहु अचरज आवै ॥ 131 ॥
दादू जे विष जारे खाइ कर, जनि मुख में मेलै ।
आदि अन्त परलै गये, जे विष सौं खेलै ॥ 132 ॥
जिन विष खाया ते मुये, क्या मेरा तेरा ।
आग पराई आपणी, सब करै निबेरा ॥ 133 ॥

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