बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
शाकुनोत्तराध्यायः ५१३
तृतीयमक्षरं दकारमापतति। अत एवोक्तम्-
वृषे थकारो हिबुके टकारः कीटे डकारो नृघटे दकारः। इति।।२१।।
अन्येष्वपि-
वृषे घकारो हिबुके शकारः कीटे झकारो नृघटे भकारः ।
लग्ने जकारो हिबुके उकारः कीटे ङकारो नृघटे मकारः ।।२२।।
वृष लग्न में चतुर्थ नवांश हो तो वृष में चतुर्थ नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर घकार, चतुर्थ राशि ( सिंह ) में चतुर्थ नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का
पञ्चम अक्षर शकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में चतुर्थ नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर झकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में पञ्चम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर भकार आता है। वृष लग्न में पञ्चम नवांश हो तो वृष में पञ्चम नवांशाधिपति
शुक्र के वर्ग का पञ्चम अक्षर जकार, चतुर्थ राशि ( सिंह ) में पञ्चम नवांशाधिपति सूर्य
के वर्ग का पञ्चम अक्षर उकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में पञ्चम नवांशाधिपति मङ्गल
के वर्ग का पञ्चम अक्षर ङकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में पञ्चम नवांशाधिपति शनि
के वर्ग का पञ्चम अक्षर मकार आता है।।२२।।
वृषस्य चतुर्थनवांशकाधिपो भौमस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं घकारमापतति। सिंहस्य
चतुर्थनवांशकाधिपतिश्चन्द्रस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं शकारमापतति। वृश्चिकस्य चतुर्थ-
नवांशकाधिपतिः शुक्रस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं झकारमापतति। कुम्भस्य चतुर्थनवांशकाधिपतिः
सौरस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं भकारमापतति। अत एवोक्तम्-
वृषे घकारो हिबुके शकारः कीटे झकारो नृघटे भकारः।
वृषस्य पञ्चमनवांशकाधिपतिः शुक्रस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं जकारमापतति। सिंहस्य
पञ्चमनवांशकाधिपतिः सूर्यस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरमुकारमापतति। वृश्चिकस्य पञ्चम-
नवांशकाधिपतिर्भौमस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं ङकारमापतति। कुम्भस्य पञ्चमनवांशकाधिपतिः
सौरस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं मकारमापतति। अत एवोक्तम्-
लग्ने जकारो हिबुके उकारः कीटे ङकारो नृघटे मकारः।। इति।।२२।।
अन्येष्वप्याह-
लग्ने ढकारोऽथ जले णकारश्चास्ते धकारोऽम्बरगे नकारः ।
वृषे षकारो हिबुके चकारः कीटे पकारो नृघटे ककारः ।।२३।।
वृष लग्न में षष्ठ नवांश हो तो वृष में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का चतुर्थ
अक्षर ढकार, चतुर्थ राशि ( सिंह ) में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का पञ्चम अक्षर
णकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में षष्ठ नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का चतुर्थ अक्षर
धकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में षष्ठ नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का पञ्चम
बृ० भ० द्वि०-३३
५१४ बृहत्संहिता
अक्षर नकार आता है। वृष लग्न में सप्तम नवांश हो तो वृष में सप्तम नवांशाधिपति
चन्द्र के वर्ग का षष्ठ अक्षर षकार, चतुर्थ राशि ( सिंह ) में सप्तम नवांशाधिपति शुक्र
के वर्ग का प्रथम अक्षर चकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में सप्तम नवांशाधिपति शनि
के वर्ग का प्रथम अक्षर पकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में सप्तम नवांशाधिपति
मंगल के वर्ग का प्रथम अक्षर ककार आता है।।२३।।
वृषस्य षष्ठनवांशकाधिपतिर्बुधस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं ढकारमापतति। सिंहस्य षष्ठ-
नवांशाधिपतिर्बुधस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं णकारमापतति। वृश्चिकस्य षष्ठनवांशकाधिपति-
र्जीवस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं धकारमापतति। कुम्भस्य षष्ठनवांशाधिपतिर्जीवस्तदीयवर्गात्
पञ्चममक्षरं नकारमापतति। अत एवोक्तम्—
लग्ने ढकारोऽथ जले णकारश्चास्ते धकारोऽम्बरगे नकारः।
वृषस्य सप्तमनवांशकाधिपतिश्चन्द्रस्तदीयवर्गात् षष्ठमक्षरं षकारमापतति। सिंहस्य
सप्तमनवांशकाधिपतिः शुक्रस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं चकारमापतति। वृश्चिकस्य सप्तम-
नवांशकाधिपतिः सौरस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं पकारमापतति। कुम्भस्य सप्तमनवांशका-
धिपतिर्भौमस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं ककारमापतति। अत एवोक्तम्—
वृषे षकारो हिबुके चकारः कीटे पकारो नृघटे ककारः।। इति।।२३।।
अन्येष्वप्याह—
ऊकारमाहुर्वृषभे जले खमस्ते फकारो नृघटे छकारः।
अन्त्ये वृषे टं तमुशन्ति सिंहे थं सप्तगे ठं प्रवदन्ति कुम्भे ।।२४।।
वृष लग्न में अष्टम नवांश हो तो वृष में अष्टम नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का षष्ठ
अक्षर ऊकार, चतुर्थ राशि ( सिंह ) में अष्टम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का द्वितीय
अक्षर खकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में अष्टम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का द्वितीय
अक्षर फकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में अष्टम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का द्वितीय
अक्षर छकार आता है। वृष लग्न में नवम नवांश हो तो वृष में नवम नवांशाधिपति बुध
के वर्ग का प्रथम अक्षर टकार, सप्तम राशि ( वृश्चिक ) में नवम नवांशाधिपति बृहस्पति
के वर्ग का द्वितीय अक्षर थकार और दशम राशि ( कुम्भ ) में नवम नवांशाधिपति बुध
के वर्ग का द्वितीय अक्षर ठकार आता है।।२४।।
वृषस्याष्टमनवांशकाधिपतिः सूर्यस्तदीयवर्गात् षष्ठमक्षरमूकारमापतति। सिंहस्याष्ट-
मनवांशकाधिपतिर्भौमस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं खकारमापतति। वृश्चिकस्याष्टमनवांशका-
धिपतिः शनिस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं फकारमापतति। कुम्भस्याष्टमनवांशकाधिपतिः
शुक्रस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं छकारमापतति। अत एवोक्तम्—
ऊकारमाहुर्वृषभे जले खमस्ते फकारो नृघटे छकारः।
वृषस्य नवमनवांशकाधिपतिर्बुधस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं टकारमापतति। सिंहस्य
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शाकुनोत्तराध्यायः ५१५
नवमनवांशकाधिपतिर्जीवस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं तकारमापतति। वृश्चिकस्य नवमनवांशका-
धिपतिर्जीवस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं थकारमापतति। कुम्भस्य नवमनवांशकाधिपतिर्बुध-
स्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं ठकारमापतति। अत एवोक्तम्—
अन्त्ये वृषे टं तमुशन्ति सिंहे थं सप्तगे ठं प्रवदन्ति कुम्भे।। इति।।२४।।
अथ द्विस्वभावेष्वाह—
द्विमूर्तिसंज्ञे मिथुने जकारः षष्ठे बकारः प्रथमांशके स्यात् ।
धनुर्धरेऽस्तोपगते गकारो मीनद्वये चाम्बरगे सकारः ॥२५॥
द्विस्वभाव राशि मिथुन लग्न में प्रथम नवांश हो तो मिथुन में प्रथम नवांशाधिपति
शुक्र के वर्ग का तृतीय अक्षर जकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में प्रथम नवांशाधिपति
शनि के वर्ग का तृतीय अक्षर बकार, सप्तम राशि ( धनु ) में प्रथम नवांशाधिपति
मंगल के वर्ग का तृतीय अक्षर गकार और दशम राशि ( मीन ) में प्रथम नवांशाधिपति
चन्द्र के वर्ग का सप्तम अक्षर सकार आता है।।२५।।
द्विमूर्तिसंज्ञा मिथुनकन्याधन्वन्मीनाः। तुलमकरमेषकर्कटेभ्य उदयं यान्ति। मिथुनस्य
प्रथमनवांशकस्तुलस्तस्य स्वामी शुक्रस्तदीयाच्चवर्गात् तृतीयमक्षरं जकारमापतति।
कन्यायाः प्रथमनवांशको मकरस्तस्य स्वामी सौरस्तदीयात् पवर्गात् तृतीयमक्षरं बकार-
मापपतति। धनुषः प्रथमनवांशको मेषस्तस्य स्वामी भौमस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं गकार-
मापपतति। मीनस्य प्रथमनवांशकः कर्कटस्तस्य स्वामी चन्द्रस्तदीयवर्गात् सप्तममक्षरं
सकारमापतति। अत एवोक्तम्—
द्विमूर्तिसंज्ञे मिथुने जकारः षष्ठे बकारः प्रथमांशके स्यात्।
धनुर्धरेऽस्तोपगते गकारो मीनद्वये चाम्बरगे सकारः।। इति।।२५।।
अन्येष्वप्याह—
लग्ने घकारो हिबुके भकारश्चास्ते झकारोऽम्बरमध्यगे ई ।
लग्ने दकारो हिबुके धकारमस्ते डकारं विदुरम्बरे ढम् ।।२६।।
मिथुन लग्न में द्वितीय नवांश हो तो मिथुन में द्वितीय नवांशाधिपति मंगल के वर्ग
का चतुर्थ अक्षर घकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में द्वितीय नवांशाधिपति शनि के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर भकार, सप्तम राशि ( धनु ) में द्वितीय नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर झकार और दशम राशि ( मीन ) में द्वितीय नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का
चतुर्थ अक्षर ईकार आता है। मिथुन लग्न में तृतीय नवांश हो तो मिथुन में तृतीय
नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का तृतीय अक्षर दकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में तृतीय
नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का चतुर्थ अक्षर धकार, सप्तम राशि ( धनु ) में तृतीय
नवांशाधिपति बुध के वर्ग का तृतीय अक्षर डकार और दशम राशि ( मीन ) में तृतीय
नवांशाधिपति बुध के वर्ग का चतुर्थ अक्षर ढकार आता है।।२६।।
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५१६ बृहत्संहिता
मिथुनस्य द्वितीयनवांशस्वामी भौमस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं घकारमापतति। कन्याया
द्वितीयनवांशकस्वामी सौरस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं भकारमापतति। धन्विनो द्वितीयनवांशक-
स्वामी शुक्रस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं झकारमापतति। मीनस्य द्वितीयनवांशकस्वामी सूर्य-
स्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरमीकारमापतति। अत एवोक्तम्—
लग्ने घकारो हिबुके मकारश्चास्ते झकारोऽम्बरमध्यगे ई।
मिथुनतृतीयनवांशकाधिपतिर्जीवस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं दकारमापतति। कन्या-
तृतीयनवांशकपतिर्जीवस्तदीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं धकारमापतति। धन्विनस्तृतीयनवांशाका-
धिपतिर्बुधस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं डकारमापतति। मीनस्य तृतीयनवांशकाधिपतिर्बुधस्त-
दीयवर्गाच्चतुर्थमक्षरं ढकारमापतति। अत एवोक्तम्—
लग्ने दकारो हिबुके धकारमस्ते डकारं विदुरम्बरे ढम्। इति।।२६।।
अन्येष्वाह—
लग्ने मकारो हिबुके ङकारश्चास्ते हकारोऽम्बरगे अकारः ।
लग्ने पकारो जलगे चकार ऐकारमस्तेऽम्बरगे ककारः ।।२७।।
मिथुन लग्न में चतुर्थ नवांश हो तो मिथुन में चतुर्थ नवांशाधिपति शनि के वर्ग का
पञ्चम अक्षर मकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में चतुर्थ नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का
पञ्चम अक्षर ङकार, सप्तम राशि ( धनु ) में चतुर्थ नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का
अष्टम अक्षर हकार और दशम राशि ( मीन ) में चतुर्थ नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का
पञ्चम अक्षर ञकार आता है। मिथुन लग्न में पञ्चम नवांश हो तो मिथुन में पञ्चम
नवांशाधिपति शनि के वर्ग का प्रथम अक्षर पकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में पञ्चम
नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का प्रथम अक्षर चकार, सप्तम राशि ( धनु ) में पञ्चम
नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का अष्टम अक्षर ऐकार और दशम राशि ( मीन ) में पञ्चम
नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का प्रथम अक्षर ककार आता है।।२७।।
मिथुनस्य चतुर्थनवांशकस्वामी सौरस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं मकारमापतति। कन्या-
याश्चतुर्थनवांशकस्वामी भौमस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं ङकारमापतति। धन्विनश्चतुर्थनवांशका-
धिपतिश्चन्द्रस्तदीयवर्गादष्टममक्षरं हकारमापतति। मीनस्य चतुर्थनवांशाकाधिपतिः शुक्रस्तदीय-
वर्गात् पञ्चममक्षरं ञकारमापतति। अत एवोक्तम्—
लग्ने मकारो हिबुके ङकारश्चास्ते हकारोऽम्बरगे अकारः।
मिथुनस्य पञ्चमनवांशाकाधिपतिः सौरस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं पकारमापतति। कन्यायाः
पञ्चमनवांशकाधिपतिः शुक्रस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं चकारमापतति। धनुषः पञ्चमनवांशाका-
धिपतिः सूर्यस्तदीयवर्गादष्टममक्षरमैकारमापतति। मीनस्य पञ्चमनवांशाकाधिपतिर्भौमस्तदीय-
वर्गात् प्रथममक्षरं ककारमापतति। अत एवोक्तम्—
लग्ने पकारो जलगे चकार ऐकारमस्तेऽम्बरगे ककारः। इति।।२७।।
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शाकुनोत्तराध्यायः ५१७
अन्येष्व्वाह—
प्राग्लग्नगे नं जलगे णमाहुरस्तं गते टं नभसि स्थिते तम्।
प्राग्लग्नगे खं जलगे यमाहुरस्तं गते छं नभसि स्थिते फम् ॥२८॥
मिथुन लग्न में षष्ठ नवांश हो तो मिथुन में षष्ठ नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का
पञ्चम अक्षर नकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का पञ्चम
अक्षर णकार, सप्तम राशि ( धनु ) में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर
टकार और दमश राशि ( मीन ) में षष्ठ नवांशाधिपति के वर्ग का प्रथम अक्षर तकार
आता है। मिथुन लग्न में सप्तम नवांश हो तो मिथुन में सप्तम नवांशाधिपति मंगल के
वर्ग का द्वितीय अक्षर खकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में सप्तम नवांशाधिपति शुक्र के
वर्ग का द्वितीय अक्षर छकार और दशम राशि ( मीन ) में सप्तम नवांशाधिपति शनि के
वर्ग का द्वितीय अक्षर फकार आता है॥२८॥
मिथुनस्य षष्ठनवांशकाधिपतिर्जीवस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं नकारमापतति। कन्यायाः
षष्ठनवांशकाधिपतिर्बुधस्तदीयवर्गात् पञ्चममक्षरं णकारमापतति। धन्विनः षष्ठनवांश-
काधिपतिर्बुधस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं टकारमापतति। मीनस्य षष्ठनवांशकाधिपतिर्जीवस्त-
दीयवर्गात् प्रथममक्षरं तकारमापतति। अत एवोक्तम्—
प्राग्लग्नगे नं जलगे णमाहुरस्तं गते टं नभसि स्थिते तम्।
मिथुनस्य सप्तमनवांशकाधिपतिर्भौमस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं खकारमापतति। कन्यायाः
सप्तमनवांशकाधिपतिश्चन्द्रस्तदीयवर्गात् प्रथममक्षरं यकारमापतति। धन्विनः सप्तमनवांशा-
धिपतिः शुक्रस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं छकारमापतति। मीनस्य सप्तमनवांशकाधिपतिः
सौरस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं फकारमापतति। अत एवोक्तम्—
प्राग्लग्नगे खं जलगे यमाहुरस्तं गते छं नभसि स्थिते फम्। इति॥२८॥
अन्येष्व्वाह—
लग्ने जमोकारमथाम्बुसंस्थे गमस्तसंस्थे विदुरम्बरे बम्।
ठं लग्नगेऽन्त्ये हिबुकाश्रिते डं थमस्तगे दं नभसि स्थिते वै ॥२९॥
मिथुन लग्न में अष्टम नवांश हो तो मिथुन में अष्टम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का
तृतीय अक्षर जकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में अष्टम नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का
नवम अक्षर ओकार, सप्तम राशि ( धनु ) में अष्टम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का
तृतीय अक्षर गकार और दशम राशि ( मीन ) में अष्टम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का
तृतीय अक्षर बकार आता है। मिथुन लग्न में नवम नवांश हो तो मिथुन में नवम
नवांशाधिपति बुध के वर्ग का द्वितीय अक्षर ठकार, चतुर्थ राशि ( कन्या ) में नवम
नवांशाधिपति बुध के वर्ग का तृतीय अक्षर डकार, सप्तम राशि ( धनु ) में नवम
नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का द्वितीय अक्षर थकार और दशम राशि ( मीन ) में
नवम नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का तृतीय अक्षर दकार आता है॥२९॥
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५१८ बृहत्संहिता
मिथुनस्याष्टमनवांशकाधिपतिः शुक्रस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं जकारमापतति। कन्याया
अष्टमनवांशकाधिपतिः सूर्यस्तदीयवर्गान्नवममक्षरमोकारमापतति। धन्विनोऽष्टमनवांशका-
धिपतिर्भौमस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं गकारमापतति। मीनस्याष्टमनवांशकाधिपतिः सौरस्त-
दीयवर्गात् तृतीयमक्षरं बकारमापतति। अत एवोक्तम्—
लग्ने जमोकारमथाम्बुसंस्थे गमस्तसंस्थे विदुरम्बरे बम्।
मिथुनस्य नवमनवांशकाधिपतिर्बुधस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं ठकारमापतति। कन्याया
नवमनवांशकाधिपतिर्बुधस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं डकारमापतति। धन्विनो नवमनवांशका-
धिपतिर्जीवस्तदीयवर्गाद् द्वितीयमक्षरं थकारमापतति। मीनस्य नवमनवांशकाधिपति-
र्जीवस्तदीयवर्गात् तृतीयमक्षरं दकारमापतति। अत एवोक्तम्—
ठं लग्नेऽन्त्ये हिबुकाश्रिते डं थमस्तगे दं नभसि स्थिते वै। इति।।२९।।
अत्र प्रविभागमाह—
एवं विकल्पोऽक्षरसंग्रहोऽयं नाम्नां निरुद्दिष्टविधान उक्तः।
सर्वेषु लग्नेषु च केचिदेवमिच्छन्ति पूर्वोक्तविधानवत्तु ॥३०॥
इस तरह यह नामाक्षरों के संग्रहों की निर्विशेष विधि कही गई है। कोई-कोई
आचार्य मेष आदि सभी लग्नों में पूर्वोक्त विधि को करने के लिये कहते हैं।।३०।।
एवमनेनानन्तरोक्तेन प्रकारेण विकल्पो विकल्पनाम यस्याक्षरसंग्रहस्य वर्णसंघातस्य
सोऽयं नाम्नामभिधानानां निर्विशेषेणोद्दिष्टमुक्तं विधानं विधिर्येन। उक्तः कथितः। सर्वेष्वखिलेषु
लग्नेषु मेषादिषु राशिषु केचिदाचार्या एवमनेन प्रकारेणेच्छन्ति वाञ्छन्ति। पूर्वोक्तविधानवत्
तु। पूर्वोक्तेन प्रागुद्दिष्टेन विधानेन तुल्यं वर्तत इति पूर्वोक्तविधानवत्। मेषे ककार इत्यादि-
नेति।।३०।।
अत्रैव नामानयने प्रकारान्तरमाह—
केन्द्राणि वा केन्द्रगतांशकैः स्वैः
पृथक्पृथक् सङ्गुणितानि कृत्वा ।
त्रिकृद्विभक्तं विदुरक्षरं तत्
क्षेत्रेश्वरस्यांशापरिक्रमस्वम् ॥३१॥
केन्द्रगत मेषादि राशि के नवांशसंख्या से केन्द्रगत राशि के अक्षरों को गुणा करके
नव का भाग देने से जो शेष बचे तत्तुल्य नवांशाधिपति क्रम से अक्षर जानना चाहिये।
यहाँ पर आचार्य के कहने का अभिप्राय यह है कि चर आदि तीनों केन्द्रों में मंगल आदि
पाँच ग्रहों के छः-छः नवांश होते हैं तथा नव नवांश में नव अक्षर होते हैं; अतः यहाँ
-पर 'नव नवांश में नव अक्षर तो छः नवांश में क्या' इस त्रैराशिक से छः अक्षर आते हैं।
अतः चर राशि के प्रथम नवांश में अपने वर्ग का प्रथम अक्षर, द्वितीय में द्वितीय, तृतीय
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भवन्ति, नान्यानि। केन्द्राणि च लग्नचतुर्थसप्तमदशमानि।
वाशब्दो भावान्तरोक्तविकल्पप्रदर्शनार्थः। मेषे ककार इत्येतच्चक्रं प्रागुक्तं प्रदर्शितम्।
Now check lines 19 to 35:
वा केन्द्रगतांशकैः स्वैरिति। केन्द्रेषु चतुर्षु ये गताः समवस्थिता अंशका नवगास्तै-
रात्मीयैः पृथक् पृथक् प्रत्येकं संगुणितानि संहतानि कृत्वा विधाय। एतदुक्तं भवति—
केन्द्रस्थितं राशिं मेषादिकं नवांशैर्नवभिर्विभज्य यद्भवति तावत्सङ्ख्यमङ्कं संस्थाप्योदित-
नवांशकैः स्वैर्गुणयेत्। ततस्तत्केन्द्रचतुष्टयं त्रिकृता त्रिकृत्या भक्तं कार्यम्। त्रयाणां कृतिर्वर्ग-
स्त्रिकृद् नव इत्यर्थः। तया विभक्तं विभाजितम्। तदक्षरं वर्णं विदुर्जानते। यल्लब्धं तदक्षरम्।
कस्य? क्षेत्रेश्वरस्य राश्यधिपतेः। अंशपरिक्रमेण नवांशपरिपाट्या स्वमात्मीयम्। अयमभि
५२० बृहत्संहिता
| मेष | वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चि० | धनु | मकर | कुम्भ | मीन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | फ | ज | प | ख | ब | च | व | ग | प | छ | स |
| छ | ब | घ | अ | ज | भ | ख | ई | झ | फ | ग | ई |
| ट | थ | द | ठ | ट | ध | त | ड | ड | थ | द | ढ |
| र | घ | म | ज | श | ङ | ब | झ | ह | ग | भ | ञ |
| आ | ञ | प | घ | उ | च | भ | ङ | ऐ | झ | म | क |
| ड | ढ | न | द | ण | ण | ध | ध | ट | ढ | न | त |
| ञ | ष | ख | म | च | य | ङ | प | छ | ल | क | फ |
| क | ऊ | ज | प | ख | ओ | च | ठ | ग | इ | छ | ब |
| न | ट | ठ | त | त | ड | ण | थ | थ | ट | ठ | द |
| अथ व्याप्तिदर्शनार्थमाह— | |||||||||||
| सञ्चिन्तितप्रार्थितनिर्गतेषु नष्टक्षतस्त्रीरतिभोजनेषु । | |||||||||||
| स्वप्नर्क्षचिन्तापुरुषादिवर्गेष्वेतेषु नामान्युपलक्षयेत ॥३२॥ | |||||||||||
| सञ्चिन्तित ( मन से चिन्तित ) कार्यों की परिकल्पना, पार्थित ( वाणी से युक्त ), | |||||||||||
| निर्गत ( निर्गमन ), नष्ट वस्तु, क्षत, स्त्री, रति ( स्त्री के साथ रमण ), भोजन ( आहारविशेष | |||||||||||
| मांस आदि ), स्वप्न, नक्षत्र, चिन्ता और पुरुष आदियों के नामों को जानना चाहिये। | |||||||||||
| यहाँ पर चारो केन्द्रों को प्रस्तुत होने के कारण लग्न आदि क्रम से सञ्चिन्तित आदि के | |||||||||||
| नामों को जानना चाहिये। जैसे—लग्न से सञ्चिन्तित, चतुर्थ से प्रार्थित, सप्तम से निर्गत, | |||||||||||
| दशम से नष्ट वस्तु; फिर लग्न से क्षत, चतुर्थ से स्त्री, सप्तम से रति, दशम से भोजन; | |||||||||||
| फिर लग्न से स्वप्न, चतुर्थ से नक्षत्र, सप्तम से चिन्ता और दशम से पुरुषादि के नामों | |||||||||||
| को जानना चाहिये। यहाँ तक यवनेश्वरकृत अक्षरकोश है॥३२॥ | |||||||||||
| सञ्चिन्तितं मनसा पदार्थानां परिकल्पनम्। प्रार्थितं वाचोक्तम्। इदं सम्पद्यतामिति। | |||||||||||
| निर्गतं निर्गमनम्। नष्टं दृष्टिविषयादपहृतं यद्वस्तु। क्षतं हिंसितम्। स्त्रीरतिरुत्तमादिस्त्रिया | |||||||||||
| सह रमणम्। भोजनमाहारविशेषो मांसादि। एतेषु पदार्थेषु। तथा स्वप्नं सुप्तस्य स्वप्नावस्थायां | |||||||||||
| नानाप्रकारवस्तुदर्शनम्। ऋक्षं नक्षत्रं तज्ज्ञानम्। चिन्ता मनसा परिकल्पनम्। पुरुषादिः, | |||||||||||
| पुरुषो नर आदिर्येषाम्। आदिग्रहणात् स्त्रीनपुंसकयोर्ग्रहणम्। पुरुषादीनां वर्गेषु समूहेषु | |||||||||||
| एतेषु नामान्यभिधानान्युपलक्षयेत विन्द्यात्। कथम्? यथासंख्यं केन्द्रचतुष्टयस्य प्रस्तुतत्वात्। | |||||||||||
| अत्र यथासंख्यं प्रदर्श्यते। लग्नादारभ्य सञ्चिन्तितनामान्युपलक्षयेत्। चतुर्थादारभ्य प्रार्थितना- | |||||||||||
| मान्युपलक्षयेत्। सप्तमादारभ्य निर्गतनामान्युपलक्षयेत्। दशमादारभ्य नष्टनामान्युपलक्षयेत्। | |||||||||||
| पुनर्निवृत्य लग्नादारभ्य क्षतनामान्युपलक्षयेत्। चतुर्थादारभ्य स्त्रीनामान्युपलक्षयेत्। सप्तमा- | |||||||||||
| दारभ्य रतिनामान्युपलक्षयेत्। दशमादारभ्य भोजननामान्युपलक्षयेत्। पुनर्निवृत्य लग्नादारभ्य | |||||||||||
| स्वप्ननामान्युपलक्षयेत्। चतुर्थादारभ्य ऋक्षनामान्युपलक्षयेत्। सप्तमादारभ्य चिन्तानामा- | |||||||||||
| न्युपलक्षयेत्। दशमादारभ्य पुरुषादिनामान्युपलक्षयेदिति। भद्रम्॥ | |||||||||||
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शाकुनोत्तराध्यायः ५२१
रचिताक्षरकोशस्य टीका शिष्यहितावहा।
भट्टोत्पलेन सुस्पष्टा श्लोकैः खाङ्गाश्विसम्मितैः।। इति।। ३२।।
एवमेव गतेऽक्षरकोशे आगतस्य नामानयनमाह—
द्व्यक्षरं चरगृहांशकोदये नाम चास्य चतुरक्षरं स्थिरे।
नामयुग्ममपि च द्विमूर्तिषु त्र्यक्षरं भवति चास्य पञ्चभिः ॥१४॥
चर लग्न और चर नवांश में आगन्तुक या प्रश्नकर्ता के दो अक्षर का नाम तथा
स्थिर लग्न और स्थिर नवांश में चार अक्षर का नाम होता है। द्विस्वभाव राशि के लग्न
और नवांश में दो नाम होते हैं; उनमें एक तीन अक्षर का और दूसरा पाँच अक्षर का होता
है।।१४।।
यस्मिन् तस्मिन् राशौ लग्नगते चरगृहांशकोदये तत्कालं तस्य चरराश्यंशको लग्न-
गतो भवति, तदा तस्यागन्तुः प्रष्टुर्वा द्व्यक्षरं नाम। लग्ननवांशयोर्भेदे यो बलवांस्तद्वशात्नाम।
एवं स्थिरलग्ने स्थिरनवांशकोदये च चतुरक्षरं नाम। द्विमूर्तिषु द्विस्वभावेषु लग्नगतेषु
तन्नवांशकेषु चास्य नामयुग्मं नामद्वितयं भवति। तत्रैकं नाम त्र्यक्षरम्। द्वितीयं पञ्चभिरक्षरैर्भवति।
एवं चरलग्ने चरांशके विज्ञेयम्।।१४।।
अथ नामवर्णानयनमाह—
काद्यास्तु वर्गाः कुजशुक्रसौम्यजीवार्कजानां क्रमशः प्रदिष्टाः ।
वर्णाष्टकं यादि च शीतरश्मेरवेरकारात् क्रमशः स्वराः स्युः ॥१५॥
नामानि चाग्न्यम्बुकुमारविष्णुशक्रेन्द्रपत्नीचतुराननानाम् ।
तुल्यानि सूर्यात् क्रमशो विचिन्त्य द्वित्र्यादिवर्णैर्घटयेत् स्वबुद्ध्या ॥१६॥
मंगल शुक्र, बुध, बृहस्पति और शनि के क्रम से कवर्ग आदि हैं। जैसे—मंगल के
कवर्ग, शुक्र के चवर्ग, बुध के टवर्ग, बृहस्पति के तवर्ग और शनि के पवर्ग हैं तथा चन्द्र
के यकार आदि आठ वर्ण ( य, र, ल, व, श, ष, स, ह ) और रवि के अकार आदि
बारह स्वर ( अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ) हैं।
प्रयोजन—लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम—इन चारो स्थानों में जो वर्तमान नवांशा-
धिपतियों के अक्षर हों, उनको क्रम से स्थापन करके नाम-रचना करनी चाहिये। जो ग्रह
वर्गोत्तम, स्वराशि, स्वद्रेष्काण, स्वनवांश या स्वोच्च में स्थित या बली हो, वह अपने
अक्षर को द्विगुणित और त्रिगुणित करके देता है तथा जो वर्गोत्तम आदि से वर्जित हो,
वह अपने अक्षर का नाश करता है। यदि लग्न या नवांश का पति सूर्य हो तो अग्नि-
पर्याय, चन्द्र हो तो अम्बुपर्याय, बुध हो तो विष्णुपर्याय, बृहस्पति हो तो इन्द्रपर्याय,
शुक्र हो तो इन्द्राणीपर्याय, शनि हो तो ब्रह्मपर्याय के नाम होते हैं। सूर्य आदि ग्रहों के
क्रम से विचार करके दो, तीन आदि अक्षरों के नामों की अपनी बुद्धि से कल्पना करनी
चाहिये।।१५-१६।।
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५२२ बृहत्संहिता
काद्यास्तु वर्गा इति। ककाराद्या वर्गाः कुजादीनां भौमादीनां क्रमशः परिपाट्या
उक्ताः। तद्यथा—कवर्गः कुजस्य। चवर्गः शुक्रस्य। टवर्गः सौम्यस्य बुधस्य। तवर्गो
जीवस्य गुरोः। पवर्गोऽर्कजस्य सौरस्य। यदि यकारादिवर्णाष्टकं शीतरश्मेश्चन्द्रस्य। रवेरा-
दित्यस्याकारात् प्रभृति क्रमशः द्वादश स्वराः स्युर्भवेयुः। प्रयोजनम्—चतुर्षु लग्नादिषु
केन्द्रेषु ये तत्कालं नवांशकाः समुद्गताः, तेषां येऽधिपतयो ग्रहास्तेषां ये वर्गा उक्तास्तै-
र्वर्गैरंशकगणनया प्राग्वदक्षरकोशाभिहितं प्राग्वद्वर्णमुत्पाद्य तैर्वर्णैस्तस्य नामोत्पादनीयमिति।
अत एव मेषे ककार इत्यादिकस्याक्षरचक्रस्य न्यासः प्रदर्शितः, किन्तु तत्रस्थो ग्रहो वर्गोत्तम-
स्वराशिद्रेष्काणनवांशोच्चवक्रस्थितो भवति, तदायुर्र्दायगणनावद् द्वित्रिगुणत्वमक्षराणा
शाकुनोत्तराध्यायः ५२३
तेषां लब्धनाम्नां सर्वग्रहेभ्यश्चन्द्रे बलवत्यंशकपतौ लग्नपतौ वा स्तनपानं वयः।
शिशुरित्यर्थः। एवं भौमे बाल्यं वर्षद्वयाद्वर्षषट्कं यावत्। बुधे व्रतस्थितो ब्रह्मचारी। आसप्त-
मात् षोडशवर्षः। शुक्रे यौवनोपेतस्त्रिंशद्वर्षं यावत्। जीवे मध्यः पञ्चाशद्वर्षः। अर्के सूर्ये
वृद्धोऽशीतिवर्षः। शनैश्चरेऽतीववृद्धः शतवार्षिक इति।।१७।।
वराहमिहिराचार्यरचिते शाकुनार्णवे।
अर्थिनामुत्पलश्चक्रेऽर्थाप्तये विवृत्तिप्लवम्।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ शाकुनोत्तरं
नाम षण्णवतितमोऽध्यायः॥९६॥
समाप्तं सर्वं शाकुनम्
अथ पाकाध्यायः
अथ पाकाध्यायो व्याख्यायते। तत्रादावेव ग्रहाणां चारोक्तफलस्य पाककालज्ञानमाह—
पक्षाद्बानोः सोमस्य मासिकोऽङ्गारकस्य वक्रोक्तः ।
आदर्शनाच्च पाको बुधस्य जीवस्य वर्षेण ॥१॥
षड्भिः सितस्य मासैरब्देन शनेः सुरद्विषोऽब्दार्धात् ।
वर्षात् सूर्यग्रहणे सद्यः स्यात् त्वाष्ट्रकीलकयोः ॥२॥
त्रिभिरेव धूमकेतोर्मासैः श्वेतस्य सप्तरात्रान्ते ।
सप्ताहात् परिवेषेन्द्रचापसन्ध्याभ्रसूचीनाम् ॥३॥
सूर्य का फल एक पक्ष में, चन्द्र का एक मास में, मङ्गल का वक्रोक्तानुसार
( भौमचार प्रकरणोक्तानुसार ) , बुध का उदित काल तक में, बृहस्पति का एक वर्ष में,
शुक्र का छः मास में, शनि का एक वर्ष में, चन्द्रग्रहण में राहु का छः मास में, सूर्यग्रहण
का एक वर्ष में, त्वष्टा नामक ग्रह, तामस और कीलक का तत्काल, धूमकेतु का तीन
मास में, श्वेतकेतु का सात रात में तथा सूर्य, चन्द्र के परिवेष, इन्द्रधनुष, सन्ध्या और
अभ्रसूची का फल सात दिन में होता है॥१-३॥
पक्षाद् भानोरिति । भानोरादित्यस्य यत् फलमर्कचारोक्तं शुभमशुभं वा तत् पक्षात्
पञ्चदशभिर्दिनैर्भवति। एवं सोमस्य मासिको मासप्रमाणमस्य मासिको मासेन भवति।
अङ्गारकस्य भौमस्य वक्रोक्तो वक्रे कथितः। यथा—'तद्वक्त्रमुष्णामुदये पीडाकरमग्नि-
वार्तानाम्' 'दूषयति रसानुदये' 'व्यालं त्रयोदशर्क्षाच्चतुर्दशाद्वा विपच्यतेऽस्तमये', 'तत्कालं
मुखरोगम्' इति, 'तदनुवक्रे दस्युगणेभ्यः पीडाम्' इति। अन्यदपि नक्षत्राश्रितं यत्फलं
तदेवमेव यस्मिन् वक्रे तन्नक्षत्रं पठ्यते। उदयर्क्षादनन्तरं तस्य नक्षत्रस्य तद्वक्रोक्तसमः पाक-
काल इति परिशेषनक्षत्राणां नक्षत्रपाककालमिति आगमविदः। बुधस्यादर्शनात् पाकः सूर्य-
मण्डलान्निर्गतो यावत्कालो दृश्यते तावानेव तस्य पाकः। जीवस्य बृहस्पतेर्वर्षेण पाकः।
षड्भिः सितस्य मासैरिति । सितस्य शुक्रस्य स्वचारे यदुक्तं फलं वीथिमण्डल-
नक्षत्राश्रितं तस्य षड्भिर्मासैः पाकः। अब्देन वर्षेण शनेः सौरस्य। सुरद्विषो राहोश्चन्द्रस्य
ग्रहणे अब्दार्धात् षड्भिर्मासैः पाकः। सूर्यग्रहणेऽर्कोपरागे वर्षात् फलम्। सतमस्कं पर्व
विनेति यस्त्वष्टा नाम ग्रह उक्तस्तस्य त्वष्टुस्तामसकीलकानां च सद्यस्तस्मिन्नेवाहनि पाकः
स्याद् भवेत्।
त्रिभिरेवेति । धूमकेतोस्त्रिभिरेव मासैः फलं पच्यते। श्वेतस्य श्वेतकेतोः सप्तरात्रान्ते
सप्तभिर्दिनैः। परिवेषः सूर्यचन्द्रमसोः। इन्द्रचापम्। सन्ध्याफलम्। अभ्रसूची। एषां सर्वेषां
सप्ताहात् फलमिति॥१-३॥
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पाकाध्यायः ५२५
अन्येष्वप्याह—
शीतोष्णविपर्यासः फलपुष्पमकालजं दिशां दाहः ।
स्थिरचरयोरन्यत्वं प्रसूतिविकृतिश्च षण्मासात् ॥४॥
शीत और उष्ण का विपर्यय ( शीतकाल में उष्णता और उष्णकाल में शीतता )
का, बिना ऋतु के फल-फूलों का, दिग्दाह का, स्थिर ( वृक्षादि ), चर ( चतुष्पदादि )
का विपर्यय ( वृक्षादि का चल और चतुष्पदादि का निश्चल होने ) का और प्रसूति-
विकृति का फल छः मास में होता है॥४॥
शीतोष्णविपर्यासः। उष्णकाले शीतता शीतकाले तूष्णता। अथवा स्वभावशीतगतस्य
वस्तुन उष्णता, स्वभावोष्णस्य शीतता। फलं पुष्पं वा अकालजम् अनृतावुपपन्नम्। दिशां
दाहो दिग्दाहः। स्थिरचरयोरन्यत्वं विपर्ययः; स्थिरस्य वृक्षादेश्चरता, चतुष्पदादेरचलत्वम्।
प्रसूतिविकृतिरतिप्रसवविकारश्च। षण्मासात् पच्यत इत्यर्थः॥४॥
अन्येष्वप्याह—
अक्रियमाणककरणं भूकम्पोऽनुत्सवो दुरिष्टं च ।
शोषश्चाशोष्याणां स्रोतोऽन्यत्वं च वर्षार्धात् ॥५॥
अक्रियमाण कार्य का ( आचाररहित कार्य का, जो कभी नहीं किया, उसका या
जो कभी नहीं किया, वह अकस्मात् किया उसका ) करना, भूमिकम्प, प्राप्त उत्सव को
नहीं करना, अशुभ अनभिमत वस्तु का होना, नहीं सूखने वाले सरोवर आदि का
सूखना, नदियों के प्रवाहों का उलटा बहना—इनका फल छः मास में होता है॥५॥
अक्रियमाणकस्याप्राप्ताचारस्य करणम्। अथवा यत्किञ्चित् कर्म कर्ता न करोति स्वय-
मेव कर्तुमायाति तदक्रियमाणकर्मकरणम्। अथवा यन्न कदाचित् कृतमकस्मात् क्रियते
तदप्यक्रियमाणकर्मकरणम्। भूकम्पः क्षितिचलनम्। अनुत्सवः प्राप्तोत्सवस्याकरणम्। दुरिष्टं
दुष्टमतीवाशोभनं यदरिष्टमनभिमतं वा यत्। अशोष्याणां सरःप्रभृतीनां शोषः। स्रोतसां नदन-
दीनामन्यत्वं प्रतीपगमनम्। ह्रदादीनामन्यत्वं शोषो जलाधिक्यं वा। वर्षार्धात् षण्मासात्
पच्यते॥५॥
अन्येष्वप्याह—
स्तम्भकुसूलार्चानां जल्पितरुदितप्रकम्पितस्वेदाः ।
मासत्रयेण कलहेन्द्रचापनिर्घातपाकाश्च ॥६॥
खम्भा, मिट्टी की बनी हुई कोठी ( कोठियाँ ), प्रतिमा—इनका सम्भाषण करना,
रोना, इनको अश्रुपात होना, इनमें पसीने का आना तथा कलह, इन्द्रधनुष और निर्घात
का फल तीन मास में होता है। यदि इन्द्रधनुष का फल पूर्वकथित अवधि ( एक
सप्ताह ) तक न हो तो तीन मास में होता है॥६॥
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५२६ बृहत्संहिता
स्तम्भः प्रसिद्धः। कुसूलं मृन्मयं यत्रान्नादिकं स्थाप्यते। अर्चा प्रतिमा। एतासां जल्पितं
सम्भाषणं रुदितमश्रुविमोचनम्। प्रकम्पितं चलनम्। स्वेदो घर्मः। एते सर्वे मासत्रयेण
पच्यन्ते। तथा कलहः। इन्द्रचापम्। निर्घातः। एतेषां च पाको मासत्रयेण परिपच्यते।
इन्द्रचापस्य पूर्वं सप्ताहात् फलमुक्तम्। सप्ताहाद्यदि न परिपच्यते तदा मासत्रयेणेति।।६।।
अन्येष्वप्याह—
कीटाखुमक्षिकोरगबाहुल्यं मृगविहङ्गविरुतं च।
लोष्टस्य चाप्सु तरणं त्रिभिरेव विपच्यते मासैः ॥७॥
कीड़ों, चूहों, मक्खियों और सांपों की अधिकता, मृग और पक्षियों के शब्द, जल
में ढेले का तैरना—इनका फल तीन मास में होता है।।७।।
कीटः कृमिः। आखुर्मूषकः। मक्षिका प्रसिद्धा। उरगाः सर्पाः। एषां बाहुल्यं प्रभूतता।
मृगाणां मृगजातीनाम्। विहङ्गानां पक्षिणां च विरुतम्। लोष्टस्य मृन्मयस्य चाप्सु जले
तरणं मज्जनं त्रिभिरेव मासैर्विपच्यते।।७।।
अन्येष्वप्याह—
प्रसवः शुनामरण्ये वन्यानां ग्रामसम्प्रवेशश्च।
मधुनिलयतोरणेन्द्रध्वजाश्च वर्षात् समधिकाद्वा ॥८॥
वन में कुत्तों का प्रसव होना, वनैले जीवों का गाँव में प्रवेश करना, शहद के छत्ते
का लगाना, तोरण, इन्द्रध्वज—इनका फल एक वर्ष में या उससे भी कुछ अधिक
समय में होता है।।८।।
शुनां सारमेयाणामरण्ये निर्जने प्रसवः। वन्यानां सत्त्वानां ग्रामे सम्प्रवेशः। मधुनिलयो
माक्षिकस्थानम्। तोरणं प्रसिद्धम्। इन्द्रध्वज इन्द्रयष्टिः। एते सर्व एव वर्षात् परिपच्यन्ते
समधिकाद्वा।।८।।
अन्येष्वप्याह—
गोमायुगृध्रसङ्घा दशाहिकाः सद्य एव तूर्यरवः ।
आक्रुष्टं पक्षफलं वल्मीको विदरणां च भुवः ॥९॥
सियार और गिद्धों के समूहों का फल दश दिन में, बिना बजाये तुरही के शब्द का
फल तत्काल तथा शाप, वल्मीक और भूमि के फटने का फल एक पक्ष में होता
है।।९।।
गोमायुः शृगालः। गृध्राणां सङ्घाः समूहाः। एते दशाहिका दशभिर्दिनैः पच्यन्ते।
तूर्यरवः तूर्यशब्दः। अनाहतस्य स्वयमेव शब्दः। आहतस्य विस्वनत्वं वा सद्यस्तस्मिन्नेवाहनि
पच्यते। आक्रुष्टं शापमानं पक्षफलं पक्षेण पच्यते। तथा वल्मीको गृहादुत्पन्नो भुवो भूमेर्वि-
दरणां स्फोटनं च पक्षेण पच्यते।।९।।
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पाकाध्यायः ५२७
अहुताशप्रज्वलनं घृततैलवसादिवर्षणं चापि ।
सद्यः परिपच्यन्ते मासेऽध्यर्धे च जनवादः ॥१०॥
अग्नि के विना ज्वाला उठने का और घी, तेल, चर्बी आदि ( मांस, रक्त, अन्न,
मद्य, पुष्प, फल, पत्ता, मिट्टी और पत्थर ) की वर्षा होने का फल तत्काल होता है तथा
जनापवाद का फल डेढ़ मास में होता है॥१०॥
अहुताशप्रज्वलनमनग्निज्वलनम्। घृतवर्षणम्। तैलवर्षणम्। वसावर्षणम्। आदिग्रहणाद्
मांसरक्तान्नपानपुष्पफलपर्णमृत्तिकापाषाणवर्षणं च। एते सर्वे सद्य एव तस्मिन्नहनि परि-
पच्यन्ते। जनवादो जनैरपवादोऽध्यर्धेन मासेन सार्धेन परिपच्यते॥१०॥
अन्येष्वप्याह—
छत्रचितियूपहुतवहबीजानां सप्तभिर्भवति पक्षैः ।
छत्रस्य तोरणस्य च केचिन्मासात् फलं प्राहुः ॥११॥
छत्र, यज्ञ की चिति, याज्ञिक यूप, अग्नि, बीज—इन सबों में विकार उत्पन्न होने
का फल सात पक्ष में होता है। कोई-कोई आचार्य छत्र और तोरण का फल एक मास
में कहते हैं॥११॥
छत्रमातपत्रम्। चितिर्यज्ञचितिः। यूपो याज्ञिकः। हुतवहोऽग्निः। बीजानि प्रसिद्धानि
यान्युप्यन्ते। एतेषां सर्वेषां यद्वैकृतं तत् सप्तभिः पक्षैः सार्धैस्त्रिभिर्मासैः पच्यते। केचिन्मु-
नयश्छत्रस्य तोरणस्य च मासात् फलं प्राहुरुक्तवन्तः। तथा च गर्गः—
चितियूपहुताशेषु फलं पक्षैस्तु सप्तभिः।
आतपत्रफलं मासात् तोरणस्यैवमस्त्विति।। इति।।११।।
अन्येष्वप्याह—
अत्यन्तविरुद्धानां स्नेहः शब्दश्च वियति भूतानाम् ।
मार्जारनकुलयोर्मूषकेण सङ्गश्च मासेन ॥१२॥
अतिशय शत्रुता रखने वाले जीवों में परस्पर स्नेह, आकाश में प्राणियों का शब्द
और चूहे के साथ मार्जार और नेवले के संग का फल एक मास में होता है॥१२॥
अत्यन्तविरुद्धानमतिशत्रूणां च प्राणिनां स्नेहः प्रीतिः परस्परम्। वियत्याकाशे भूतानां
प्राणिनां शब्दः। मार्जारस्य विडालस्य। नकुलः प्रसिद्धस्तस्य च। मूषकेण सङ्गो युतिः।
मासेन पच्यते॥१२॥
अन्येष्वप्याह—
गन्धर्वपुरं मासाद्रसवैकृत्यं हिरण्यविकृतिश्च ।
ध्वजवेश्मपांशुधूमाकुला दिशश्चापि मासफलाः ॥१३॥
गन्धर्वनगर, रस ( मधुर आदि ) में विकार और सुवर्ण में विकार का फल एक
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अषाढे द्वे पूर्वोत्-`
Wait, look at "अषाढे द्वे पूर्वोत्-":
अ - षा - ढे (aṣāḍhe)
द्वे (dve)
पू - र्वो - त्- (pūrvot-)
:
राषाढे मासचतुष्के चतुर्भिर्मासैस्तयोः पाकः। अभिजित्तारा सद्यः पाको तस्मिन्नेवाहनि
Wait, let's look at "पाको":
प (pa) + ा (ā) + क (ka) + ो (o) = पाको.
Yes, "पाको तस्मिन्नेवाहनि"!
:
पाकं करोति।।१५।।
:
अथ श्रवणादीनां पाककालज्ञानमाह—
:
सप्ताष्टावध्यर्द्धं त्रयस्त्रयः पञ्च चैव मासाः स्युः ।
Wait, let's check:
सप्ताष्टावध्यर्द्धं:
स - प्ता - ष्टा - व - ध्य - र्द्धं (saptāṣṭāvadhyarddhaṁ)
त्र - य - स्त्र - यः (trayastrayaḥ)
प - ञ्च (pañca)
चै - व (caiva)
मा - साः (māsāḥ)
पाकाध्यायः ५२९
आठ, डेढ़, तीन, तीन और पाँच मास में फल होता है।।१६।।
यथाक्रमेण श्रवणादीनां नक्षत्राणां पाकः। तद्यथा--सप्तभिर्मासैः श्रवणस्य पाकः।
अष्टभिर्धनिष्ठायाः। अध्यर्धेन सार्धेन मासेन शतभिषजः। त्रिभिः पूर्वायाः। त्रिभिरुत्तरायाः।
पञ्चभी रेवत्याः। एवमनेन क्रमेण श्रवणादीनां नक्षत्राणां पाकः।
अत्र पाकाध्याये येषामुत्पातानां पाको नोक्तस्तेषां भूकम्पाध्याये उक्तः; यथा—
पक्षैश्चतुर्भिरनिलस्त्रिभिरग्निर्दैवराट् च सप्ताहात्।
सद्यः फलति च वरुणो येषु न कालोऽद्भुतेषूक्तः।। इति।।१६।।
अद्भुते दृष्टे शान्त्यादिकं कृत्वाऽद्भुतशान्तिं नयेत्; अन्यथा पाकभेदो भवेत्येत-
ज्ज्ञापयितुमाह—
निगदितसमये न दृश्यते चेदधिकतरं द्विगुणे प्रपच्यते तत्।
यदि न कनकरत्नगोप्रदानैरुपशमितं विधिवद् द्विजैश्च शान्त्या ।।१७।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां पाकाध्यायो
नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ।।९७।।
यदि पूर्वोक्त समय में फल दिखाई न दे तो उससे द्विगुणित तुल्य काल में अधिक
फल होता है; परन्तु ब्राह्मणों के द्वारा सुवर्ण, रत्न और गौ का दान आदि शान्ति करने से
शान्त नहीं होने पर ही द्विगुणित काल में फल होता है।।१७।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां पाकाध्यायः सप्तनवतितमः ।।९७।।
निगदितसमये यथोक्तकाले चेद्यदि न दृश्यते पाकस्तदा तस्मात् पाकोऽधिकतरं
द्विगुणे काले प्रपच्यते पाकमायाति। यदि कनकप्रदानेन सुवर्णदानेन, रत्नानां मणीनां
प्रदानेन, गवां धेनूनां प्रदानेन। एतैस्तथा द्विजैर्ब्राह्मणैश्च विधिवत् शान्त्या नोपशमितम्
तदाऽधिकतरमतीवाधिकं द्विगुणे काले समये। यस्याद्भुतस्य काल उक्तस्तस्मिन् द्विगुणे
तत् प्रपच्यते पाकमायातीति।।१७।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ पाकाध्यायो
नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ।।९७।।
बृ० भ० द्वि०-३४
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अथ नक्षत्रकर्मगुणाध्यायः
अथ नक्षत्रकर्मगुणाध्यायो व्याख्यायते। तत्रादावेवाश्विन्यादीनां तारकाप्रमाणज्ञानमाह—
शिखिगुणरसेन्द्रियानलशशिविषयगुणर्तुपञ्चवसुपक्षाः ।
विषयैकचन्द्रभूतार्णवाग्निरुद्राश्विवसुदहनाः ॥१॥
भूतशतपक्षवसवो द्वात्रिंशच्चेति तारकामानम्।
क्रमशोऽश्विन्यादीनां कालस्ताराप्रमाणेन ॥२॥
नक्षत्रजमुद्वाहे फलमब्दैस्तारकामितैः सदसत्।
दिवसैर्ज्वरस्य नाशो व्याधेरन्यस्य वा वाच्यः ॥३॥
अश्विनी आदि नक्षत्रों के क्रम से शिखि ( ३ ) आदि तारे होते हैं। जैसे—अश्विनी
में तीन, भरणी में तीन, कृत्तिका में छः, रोहिणी में पाँच, मृगशिरा में तीन, आर्द्रा में एक,
पुनर्वसु में चार, पुष्य में तीन, आश्लेषा में पाँच, मघा में पाँच, पूर्वाफाल्गुनी में दो,
उत्तराफाल्गुनी में दो, हस्त में पाँच, चित्रा में एक, स्वाति में एक, विशाखा में चार,
अनुराधा में चार, ज्येष्ठा में तीन, मूल में ग्यारह, पूर्वाषाढ़ा में दो, उत्तराषाढ़ा में दो,
अभिजित् में तीन, श्रवण में तीन, धनिष्ठा में चार, शतभिषा में सौ, पूर्वभाद्रपदा में दो,
उत्तरभाद्रपदा में दो और रेवती में बत्तीस तारे होते हैं। तारों के प्रमाण से नक्षत्रों का फल
होता है। जैसे कि विवाह में नक्षत्रों का शुभाशुभ फल तारातुल्य वर्षों में होता है तथा
जिस नक्षत्र में ज्वर या अन्य रोग की उत्पत्ति हो, उस नक्षत्र के तारातुल्य दिन में उसका
नाश होता है॥१-३॥
शिखिगुणेति । शिखिनोऽग्नयस्त्रयोऽश्विन्यास्तारकाप्रमाणम्। गुणास्त्रयः सत्त्वरज-
स्तमांसि भरण्यास्तारकाप्रमाणम्। रसाः षड् मधुरादयः कृत्तिकायाः। इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि
पञ्च रोहिण्याः। अनलास्त्रयोऽग्नयो मृगशिरसः। शशी चन्द्र एक आर्द्रायाः। विषयाः शब्दादयः
पञ्च पुनर्वसोः। गुणास्त्रयस्तिष्यस्य। ऋतवः शिशिरादयः षडाश्लेषायाः। पञ्च मघायाः।
वसवोऽष्टौ पूर्वफल्गुन्याः। पक्षौ द्वौ उत्तरफल्गुन्याः। विषयाः पञ्च हस्तस्य। एकश्चित्रायाः।
चन्द्र एक एव स्वातेः। भूतानि पञ्च विशाखायाः। अर्णवाः समुद्राश्चत्वारोऽनुराधायाः।
अग्नयस्त्रयो ज्येष्ठायाः। रुद्रा एकादश मूलस्य। अश्विनौ द्वौ पूर्वाषाढायाः। वसवोऽष्ट उत्तरा-
षाढायाः। दहना अग्नयस्त्रयः श्रवणस्य। भूतानि पञ्च पृथिव्यादीनि धनिष्ठायाः। शतं शत-
भिषजः। केचिच्छराः पञ्चेति पठन्ति। पक्षौ द्वौ पूर्वभद्रपदायाः। वसवोऽष्ट उत्तरभद्रपदायाः।
द्वात्रिंशद् रेवत्याः। इत्येवंप्रकारं तारकामानम्। नक्षत्राणामेषां च क्रमशः परिपाट्या तारा-
प्रमाणेन तत्संख्यया कालो ज्ञेयश्चेत्याह—नक्षत्रजमुद्वाह इति। उद्वाहे विवाहे नक्षत्रस्य
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नक्षत्रकर्मगुणाध्यायः ५३१
यत् फलं सदसच्छुभमशुभं वा तारकामितस्तारकासंख्यैरब्दैर्वर्षैर्वक्तव्यम्। यथा—'मृगशिरसि
मघायाम्' इति। यथा—'बहुसुखसुतदासीवित्तसौभाग्ययुक्त' इति। यत् फलं सच्छोभनं
तथाद्र्द्राद्ये भचतुष्टये नेति। सदसत्फलं शुभं दुष्टं ततारकामितैस्तारकासंख्यैरब्दैर्भवति।
दिवसैर्ज्वरस्य नाश इति । तारकामितैर्दिवसैर्ज्वरस्योत्पन्नस्य नाशो वाच्यो वक्तव्यः।
इति तारकामानम्।।१-३।।
अथ नक्षत्रदेवता आह—
अश्वियमदहनकमलजशशिशूलभृददितिजीवफणिपितरः ।
योन्यर्यमदिनकृत्त्वष्टृपवनशक्राग्निमित्राश्च ॥४॥
शक्रो निर्ऋतिस्तोयं विश्वे ब्रह्मा हरिवसुर्वरुणः।
अजपादोऽहिर्बुध्न्यः पूषा चेतीश्वरा भानाम् ॥५॥
अश्विनीकुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, शिव, अदिति, बृहस्पति, सर्प, भग ( सूर्य-
विशेष ), अर्यमा ( सूर्यविशेष ), रवि, त्वष्टा ( विश्वकर्मा ), वायु, इन्द्राग्नी मित्र, इन्द्र,
निर्ऋति ( राक्षस ), जल, विश्वेदेव, ब्रह्मा, विष्णु, वसु, वरुण, अजचरण ( सूर्यविशेष ),
अहिर्बुध्न्य ( सूर्यविशेष ), पूषा ( सूर्यविशेष )—ये क्रम से अश्विनी आदि नक्षत्रों के
स्वामी होते हैं। जैसे—अश्विनीकुमार अश्विनी के, यम भरणी के, अग्नि कृत्तिका के,
ब्रह्मा रोहिणी के, चन्द्रमा मृगशिरा के इत्यादि स्वामी होते हैं।।४-५।।
अश्वियमदहनेति । अश्वादीनां क्रमेण भानां नक्षत्राणामीश्वराः। तद्यथा—अश्विना-
वश्विन्याः। यमो भरण्याः। दहनोऽग्निः कृत्तिकायाः। कमलजो ब्रह्मा रोहिण्याः। शशी चन्द्रो
मृगशिरसः। शूलभृद्रुद्र आर्द्रायाः। आदित्यः पुनर्वसोः। जीवो बृहस्पतिस्तिष्यस्य। फणी
सर्प आश्लेषायाः। पितरो मघायाः। योनिर्भगः पूर्वफल्गुन्याः। अर्यमा उत्तरफल्गुन्याः।
दिनकृदादित्यो हस्तस्य। त्वष्टा चित्रायाः। पवनो वायुः स्वातेः। शक्राग्नी इन्द्राग्नी विशाखायाः।
मित्रोऽनुराधायाः। शक्र इन्द्रो ज्येष्ठायाः। निर्ऋती राक्षसो मूलस्य। तोयं जलं पूर्वाषाढायाः।
विश्वे देवा उत्तराषाढायाः। ब्रह्माऽभिजितः। हरिर्विष्णुः श्रवणस्य। वसुर्धनिष्ठायाः। वरुणो-
ऽपाम्पतिः शतभिषजः। अजपादोऽजैकपात् पूर्वभद्रपदायाः। अहिर्बुध्न्य उत्तरभद्रपदायाः।
पूषा रेवत्याः। चशब्दः समुच्चये। इत्येवंप्रकारा भानां नक्षत्राणामीश्वराः स्वामिनो नक्षत्र-
देवताः।।४-५।।
अधुना ध्रुवाणि नक्षत्राणि तैश्च यानि कर्माणि क्रियन्ते तानि चाह—
त्रीण्युत्तराणि तेभ्यो रोहिण्यश्च ध्रुवाणि तैः कुर्यात्।
अभिषेकशान्तितरुनगरधर्मबीजध्रुवारम्भान् ॥६॥
उन पूर्वोक्त नक्षत्रों में से तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र ध्रुव ( स्थिर ) संज्ञक हैं।
इनमें अभिषेक ( राजा आदि का अभिषेक ), शान्ति ( उत्पातों का प्रतीकार ), रोपण
( वृक्षों का रोपण ), नगर ( नगरों की प्रतिष्ठा आदि ), धर्मक्रिया, बीज ( बीजों का
बोना ) और स्थिर कार्यों का आरम्भ करना चाहिये।।६।।
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५३२ बृहत्संहिता
तेभ्यो नक्षत्रेभ्यस्त्रीण्युत्तराणि उत्तरफल्गुनी उत्तराषाढोत्तरभाद्रपदा तथा रोहिण्यः । एतानि
नक्षत्राणि चत्वारि ध्रुवाणि स्थिराणीत्यर्थः । तैश्च ध्रुवैः किं तत्? अभिषेको नृपादेः । शान्तिः
शान्तिकमुत्पातप्रतीकारः । तरुर्वृक्षस्तस्य रोपणम्। नगरं पत्तनं तत्प्रतिष्ठादि। धर्मो धर्म-
क्रिया। बीजं बीजवपनम्। अन्येषां ध्रुवाणां स्थिराणां कर्मणारम्भान् कुर्यादिति। तथा
च पराशरः—
चत्वारो हि चतुष्का ध्रुवो मृदुर्दारुणस्तथा क्षिप्रः ।
उग्राणि पञ्च पञ्च चराणि साधारणे द्वे च ।।
चत्वारि खलु नक्षत्रेषु ध्रुवाणि भवन्ति। प्राजापत्यं त्रीण्युत्तराणि। तेषु पुरनगरग्राम-
काननोपवनभवनानि। वेशनतरुकुसुमबीजवपनस्थिरनिधिनिधानकृषिधनगोऽश्वमित्रसंग्रहण-
स्नपनालङ्करणपत्युद्वहनचरणाभिगमननृपतिनायकाभिषेकमन्त्रेज्याव्रतनियमायुष्यपौष्टिकशान्ति-
कधान्यान्यन्यानि स्थिराणि कारयेत्। ऋणधनप्रयोगपथगमनमद्यवैरक्षौराणि च वर्जयेत्।।६।।
अथ तीक्ष्णानि नक्षत्राणि तैर्यानि कर्माणि क्रियन्ते तानि चाह—
मूलशिवशक्रभुजगाधिपानि तीक्ष्णानि तेषु सिद्ध्यन्ति ।
अभिघातमन्त्रवेतालबन्धवधभेदसम्बन्धाः ॥७॥
मूल, आर्द्रा, ज्येष्ठा, आश्लेषा—ये तीक्ष्णसंज्ञक नक्षत्र हैं। इनमें अभिघात ( उपद्रव ),
मन्त्र ( मन्त्रसाधन प्रयोग ), वेताल (वेताल के उत्थापन आदि का कर्म ), बन्ध
( बन्धन ), वध, भेद ( मिले हुये दो को अलग करना ) और सम्बन्ध ( राजकुल में
आवेदन ) की सिद्धि होती है।।७।।
मूलं प्रसिद्धम्। शिवाधिपमार्द्रा। शक्राधिपं ज्येष्ठा। भुजगाधिपं सर्पदैवत्यमाश्लेषा।
एतानि नक्षत्राणि तीक्ष्णानि दारुणानीत्यर्थः। तेषु तीक्ष्णेषु सिद्ध्यन्ति। के ते? अभिघात
उपद्रवः। मन्त्रो मन्त्रसाधनप्रयोगः। वेतालं वेतालोत्थापनादिकर्म। बन्धो बन्धनम्। वधस्ता-
डनम्। भेदः पृथक्करणं श्लिष्टयोर्द्वयोः। सम्बन्धो राजकुल आवेदनम्। एते सिद्ध्यन्ति।
तथा च पराशरः—
‘चत्वारि नक्षत्रेषु दारुणानि भवन्ति। आर्द्रा श्लेषा ज्येष्ठा मूलमित्येतेष्वरिनगर-
स्कन्धावारावरोधनमथ नरेन्द्रामिघातयुद्धकलहकूटसाहसोपधानभेदवञ्चनविवादचौर्यानृतशपथ-
कितवच्छलनपणयन्त्रायुधग्रहणकरणदर्शनाभिचारगदवियोगवधभृत्यनिग्रहचतुष्पददमन-
भटनियोगान्। विशेषतो मूले मूलकर्म। रुद्रर्क्षेषु पीडनवपनधान्यतरुकुसुमबीजवेश्म प्रवेश-
स्थिरनिधिनियोगांश्च कारयेत्। सर्वेषु च सर्वं दारुणं कर्म’।।७।।
अथोग्राणि नक्षत्राणि तैश्च यत् कर्म कर्तव्यं तच्चाह—
उग्राणि पूर्वभरणीपित्र्याण्युत्सादननाशशाठ्येषु ।
योज्यानि बन्धविषदहनशस्त्रघातादिषु च सिद्ध्यै ॥८॥
तीनों पूर्वा, भरणी, मघा—ये नक्षत्र उग्रसंज्ञक हैं। इनको उत्सादन, नाश ( परार्थनाश )
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