बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
DevanagariHindipublished760 पृष्ठ
पृष्ठ 548, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 548
५२० बृहत्संहिता
| मेष | वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चि० | धनु | मकर | कुम्भ | मीन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | फ | ज | प | ख | ब | च | व | ग | प | छ | स |
| छ | ब | घ | अ | ज | भ | ख | ई | झ | फ | ग | ई |
| ट | थ | द | ठ | ट | ध | त | ड | ड | थ | द | ढ |
| र | घ | म | ज | श | ङ | ब | झ | ह | ग | भ | ञ |
| आ | ञ | प | घ | उ | च | भ | ङ | ऐ | झ | म | क |
| ड | ढ | न | द | ण | ण | ध | ध | ट | ढ | न | त |
| ञ | ष | ख | म | च | य | ङ | प | छ | ल | क | फ |
| क | ऊ | ज | प | ख | ओ | च | ठ | ग | इ | छ | ब |
| न | ट | ठ | त | त | ड | ण | थ | थ | ट | ठ | द |
| अथ व्याप्तिदर्शनार्थमाह— | |||||||||||
| सञ्चिन्तितप्रार्थितनिर्गतेषु नष्टक्षतस्त्रीरतिभोजनेषु । | |||||||||||
| स्वप्नर्क्षचिन्तापुरुषादिवर्गेष्वेतेषु नामान्युपलक्षयेत ॥३२॥ | |||||||||||
| सञ्चिन्तित ( मन से चिन्तित ) कार्यों की परिकल्पना, पार्थित ( वाणी से युक्त ), | |||||||||||
| निर्गत ( निर्गमन ), नष्ट वस्तु, क्षत, स्त्री, रति ( स्त्री के साथ रमण ), भोजन ( आहारविशेष | |||||||||||
| मांस आदि ), स्वप्न, नक्षत्र, चिन्ता और पुरुष आदियों के नामों को जानना चाहिये। | |||||||||||
| यहाँ पर चारो केन्द्रों को प्रस्तुत होने के कारण लग्न आदि क्रम से सञ्चिन्तित आदि के | |||||||||||
| नामों को जानना चाहिये। जैसे—लग्न से सञ्चिन्तित, चतुर्थ से प्रार्थित, सप्तम से निर्गत, | |||||||||||
| दशम से नष्ट वस्तु; फिर लग्न से क्षत, चतुर्थ से स्त्री, सप्तम से रति, दशम से भोजन; | |||||||||||
| फिर लग्न से स्वप्न, चतुर्थ से नक्षत्र, सप्तम से चिन्ता और दशम से पुरुषादि के नामों | |||||||||||
| को जानना चाहिये। यहाँ तक यवनेश्वरकृत अक्षरकोश है॥३२॥ | |||||||||||
| सञ्चिन्तितं मनसा पदार्थानां परिकल्पनम्। प्रार्थितं वाचोक्तम्। इदं सम्पद्यतामिति। | |||||||||||
| निर्गतं निर्गमनम्। नष्टं दृष्टिविषयादपहृतं यद्वस्तु। क्षतं हिंसितम्। स्त्रीरतिरुत्तमादिस्त्रिया | |||||||||||
| सह रमणम्। भोजनमाहारविशेषो मांसादि। एतेषु पदार्थेषु। तथा स्वप्नं सुप्तस्य स्वप्नावस्थायां | |||||||||||
| नानाप्रकारवस्तुदर्शनम्। ऋक्षं नक्षत्रं तज्ज्ञानम्। चिन्ता मनसा परिकल्पनम्। पुरुषादिः, | |||||||||||
| पुरुषो नर आदिर्येषाम्। आदिग्रहणात् स्त्रीनपुंसकयोर्ग्रहणम्। पुरुषादीनां वर्गेषु समूहेषु | |||||||||||
| एतेषु नामान्यभिधानान्युपलक्षयेत विन्द्यात्। कथम्? यथासंख्यं केन्द्रचतुष्टयस्य प्रस्तुतत्वात्। | |||||||||||
| अत्र यथासंख्यं प्रदर्श्यते। लग्नादारभ्य सञ्चिन्तितनामान्युपलक्षयेत्। चतुर्थादारभ्य प्रार्थितना- | |||||||||||
| मान्युपलक्षयेत्। सप्तमादारभ्य निर्गतनामान्युपलक्षयेत्। दशमादारभ्य नष्टनामान्युपलक्षयेत्। | |||||||||||
| पुनर्निवृत्य लग्नादारभ्य क्षतनामान्युपलक्षयेत्। चतुर्थादारभ्य स्त्रीनामान्युपलक्षयेत्। सप्तमा- | |||||||||||
| दारभ्य रतिनामान्युपलक्षयेत्। दशमादारभ्य भोजननामान्युपलक्षयेत्। पुनर्निवृत्य लग्नादारभ्य | |||||||||||
| स्वप्ननामान्युपलक्षयेत्। चतुर्थादारभ्य ऋक्षनामान्युपलक्षयेत्। सप्तमादारभ्य चिन्तानामा- | |||||||||||
| न्युपलक्षयेत्। दशमादारभ्य पुरुषादिनामान्युपलक्षयेदिति। भद्रम्॥ | |||||||||||
| CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA |