बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकुनोत्तराध्यायः ५२१
रचिताक्षरकोशस्य टीका शिष्यहितावहा।
भट्टोत्पलेन सुस्पष्टा श्लोकैः खाङ्गाश्विसम्मितैः।। इति।। ३२।।
एवमेव गतेऽक्षरकोशे आगतस्य नामानयनमाह—
द्व्यक्षरं चरगृहांशकोदये नाम चास्य चतुरक्षरं स्थिरे।
नामयुग्ममपि च द्विमूर्तिषु त्र्यक्षरं भवति चास्य पञ्चभिः ॥१४॥
चर लग्न और चर नवांश में आगन्तुक या प्रश्नकर्ता के दो अक्षर का नाम तथा
स्थिर लग्न और स्थिर नवांश में चार अक्षर का नाम होता है। द्विस्वभाव राशि के लग्न
और नवांश में दो नाम होते हैं; उनमें एक तीन अक्षर का और दूसरा पाँच अक्षर का होता
है।।१४।।
यस्मिन् तस्मिन् राशौ लग्नगते चरगृहांशकोदये तत्कालं तस्य चरराश्यंशको लग्न-
गतो भवति, तदा तस्यागन्तुः प्रष्टुर्वा द्व्यक्षरं नाम। लग्ननवांशयोर्भेदे यो बलवांस्तद्वशात्नाम।
एवं स्थिरलग्ने स्थिरनवांशकोदये च चतुरक्षरं नाम। द्विमूर्तिषु द्विस्वभावेषु लग्नगतेषु
तन्नवांशकेषु चास्य नामयुग्मं नामद्वितयं भवति। तत्रैकं नाम त्र्यक्षरम्। द्वितीयं पञ्चभिरक्षरैर्भवति।
एवं चरलग्ने चरांशके विज्ञेयम्।।१४।।
अथ नामवर्णानयनमाह—
काद्यास्तु वर्गाः कुजशुक्रसौम्यजीवार्कजानां क्रमशः प्रदिष्टाः ।
वर्णाष्टकं यादि च शीतरश्मेरवेरकारात् क्रमशः स्वराः स्युः ॥१५॥
नामानि चाग्न्यम्बुकुमारविष्णुशक्रेन्द्रपत्नीचतुराननानाम् ।
तुल्यानि सूर्यात् क्रमशो विचिन्त्य द्वित्र्यादिवर्णैर्घटयेत् स्वबुद्ध्या ॥१६॥
मंगल शुक्र, बुध, बृहस्पति और शनि के क्रम से कवर्ग आदि हैं। जैसे—मंगल के
कवर्ग, शुक्र के चवर्ग, बुध के टवर्ग, बृहस्पति के तवर्ग और शनि के पवर्ग हैं तथा चन्द्र
के यकार आदि आठ वर्ण ( य, र, ल, व, श, ष, स, ह ) और रवि के अकार आदि
बारह स्वर ( अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ) हैं।
प्रयोजन—लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम—इन चारो स्थानों में जो वर्तमान नवांशा-
धिपतियों के अक्षर हों, उनको क्रम से स्थापन करके नाम-रचना करनी चाहिये। जो ग्रह
वर्गोत्तम, स्वराशि, स्वद्रेष्काण, स्वनवांश या स्वोच्च में स्थित या बली हो, वह अपने
अक्षर को द्विगुणित और त्रिगुणित करके देता है तथा जो वर्गोत्तम आदि से वर्जित हो,
वह अपने अक्षर का नाश करता है। यदि लग्न या नवांश का पति सूर्य हो तो अग्नि-
पर्याय, चन्द्र हो तो अम्बुपर्याय, बुध हो तो विष्णुपर्याय, बृहस्पति हो तो इन्द्रपर्याय,
शुक्र हो तो इन्द्राणीपर्याय, शनि हो तो ब्रह्मपर्याय के नाम होते हैं। सूर्य आदि ग्रहों के
क्रम से विचार करके दो, तीन आदि अक्षरों के नामों की अपनी बुद्धि से कल्पना करनी
चाहिये।।१५-१६।।
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