बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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शाकुनोत्तराध्यायः ५२३
तेषां लब्धनाम्नां सर्वग्रहेभ्यश्चन्द्रे बलवत्यंशकपतौ लग्नपतौ वा स्तनपानं वयः।
शिशुरित्यर्थः। एवं भौमे बाल्यं वर्षद्वयाद्वर्षषट्कं यावत्। बुधे व्रतस्थितो ब्रह्मचारी। आसप्त-
मात् षोडशवर्षः। शुक्रे यौवनोपेतस्त्रिंशद्वर्षं यावत्। जीवे मध्यः पञ्चाशद्वर्षः। अर्के सूर्ये
वृद्धोऽशीतिवर्षः। शनैश्चरेऽतीववृद्धः शतवार्षिक इति।।१७।।
वराहमिहिराचार्यरचिते शाकुनार्णवे।
अर्थिनामुत्पलश्चक्रेऽर्थाप्तये विवृत्तिप्लवम्।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ शाकुनोत्तरं
नाम षण्णवतितमोऽध्यायः॥९६॥
समाप्तं सर्वं शाकुनम्