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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 760 में से

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पृष्ठ 553

पाकाध्यायः ५२५
अन्येष्वप्याह—
शीतोष्णविपर्यासः फलपुष्पमकालजं दिशां दाहः ।
स्थिरचरयोरन्यत्वं प्रसूतिविकृतिश्च षण्मासात् ॥४॥
शीत और उष्ण का विपर्यय ( शीतकाल में उष्णता और उष्णकाल में शीतता )
का, बिना ऋतु के फल-फूलों का, दिग्दाह का, स्थिर ( वृक्षादि ), चर ( चतुष्पदादि )
का विपर्यय ( वृक्षादि का चल और चतुष्पदादि का निश्चल होने ) का और प्रसूति-
विकृति का फल छः मास में होता है॥४॥
शीतोष्णविपर्यासः। उष्णकाले शीतता शीतकाले तूष्णता। अथवा स्वभावशीतगतस्य
वस्तुन उष्णता, स्वभावोष्णस्य शीतता। फलं पुष्पं वा अकालजम् अनृतावुपपन्नम्। दिशां
दाहो दिग्दाहः। स्थिरचरयोरन्यत्वं विपर्ययः; स्थिरस्य वृक्षादेश्चरता, चतुष्पदादेरचलत्वम्।
प्रसूतिविकृतिरतिप्रसवविकारश्च। षण्मासात् पच्यत इत्यर्थः॥४॥
अन्येष्वप्याह—
अक्रियमाणककरणं भूकम्पोऽनुत्सवो दुरिष्टं च ।
शोषश्चाशोष्याणां स्रोतोऽन्यत्वं च वर्षार्धात् ॥५॥
अक्रियमाण कार्य का ( आचाररहित कार्य का, जो कभी नहीं किया, उसका या
जो कभी नहीं किया, वह अकस्मात् किया उसका ) करना, भूमिकम्प, प्राप्त उत्सव को
नहीं करना, अशुभ अनभिमत वस्तु का होना, नहीं सूखने वाले सरोवर आदि का
सूखना, नदियों के प्रवाहों का उलटा बहना—इनका फल छः मास में होता है॥५॥
अक्रियमाणकस्याप्राप्ताचारस्य करणम्। अथवा यत्किञ्चित् कर्म कर्ता न करोति स्वय-
मेव कर्तुमायाति तदक्रियमाणकर्मकरणम्। अथवा यन्न कदाचित् कृतमकस्मात् क्रियते
तदप्यक्रियमाणकर्मकरणम्। भूकम्पः क्षितिचलनम्। अनुत्सवः प्राप्तोत्सवस्याकरणम्। दुरिष्टं
दुष्टमतीवाशोभनं यदरिष्टमनभिमतं वा यत्। अशोष्याणां सरःप्रभृतीनां शोषः। स्रोतसां नदन-
दीनामन्यत्वं प्रतीपगमनम्। ह्रदादीनामन्यत्वं शोषो जलाधिक्यं वा। वर्षार्धात् षण्मासात्
पच्यते॥५॥
अन्येष्वप्याह—
स्तम्भकुसूलार्चानां जल्पितरुदितप्रकम्पितस्वेदाः ।
मासत्रयेण कलहेन्द्रचापनिर्घातपाकाश्च ॥६॥
खम्भा, मिट्टी की बनी हुई कोठी ( कोठियाँ ), प्रतिमा—इनका सम्भाषण करना,
रोना, इनको अश्रुपात होना, इनमें पसीने का आना तथा कलह, इन्द्रधनुष और निर्घात
का फल तीन मास में होता है। यदि इन्द्रधनुष का फल पूर्वकथित अवधि ( एक
सप्ताह ) तक न हो तो तीन मास में होता है॥६॥
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