बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
दूर भाजते हैं. अर्थात् डोरा और राजस बढानेके समय दूर
भागते हैं. जिस समय ( डोरा ) गुणा बढायाजाता है चंग दूर
चला जाता है, और स्वामीके निकट निर्गुणता प्रगट करते हैं,
आशय यह कि, डोरा पाकर जैसे चंग दूर जाता है, इसीप्रका-
र रजोगुणकी शक्ति पानेसे राजा प्रभुको भूल जाते हैं, और
जब वह अपना रजोगुणी ऐश्वर्य खेंचलेता है तब दीन दुःखी
हो आठ पहर प्रभुको मनाते हैं, अथवा प्रभुके गुण विस्तार
समय विषय पीठ देकर भागते हैं, तब गुणीकी खोज होती
है, कोई क्षीरसागर और कोई वैकुंठमें खोज करते हैं, जब
निर्गुणब्रह्म कहाजाता है तब व्यापक होनेसे निकटही भास-
ता है आशय यह कि, रज तमकी वृद्धिमें चंगकी भांति प्रभु
से दूर होना है। "श्लेषालंकार" ॥ ६७३ ॥
नटुवालौं प्रभुकर गहै, निगुणी गुण लपटाय ।
वहै गुणी करते छुटै, निगुणीपै ह्वै जाय ॥ ६७४ ॥
लट्टूकी भाँति जब प्रभु हाथमें पकड़ते हैं तब निर्गुणको
गुण लिपटता है वही गुणी हाथसे छूटनेपर निर्गुणी होजाता है
आशय यह कि, जयशाह जिस निर्गुणीको अपने पास रखते
हैं वह गुणी होजाता है और छूटनेपर निर्गुणी होता है जैसे
लट्टू "श्लेषालंकार पूर्णोपमा" ॥ ६७४ ॥
जात जात वित होत है, ज्यों जियमें संतोष ।
(२२०) सतसई-सटीक ।
होत होत जो होय तो, होय घरैंमें मोष ॥६७५॥
धन जातेर मनमें संतोष होता है होतेरभी धन जो संतोष
हो ता घडीमें वा घरही मुक्त होय “विभावना” ॥ ६७५ ॥
ब्रजवासिनको उचित धन, सो धन रुचित न कोय।
सुचित न आयो सुचितई, कहो कहांते होय ६७६
ब्रजवासियोंका उचित धन श्रीकृष्णके प्रेमरूपी धन
किसीके चित्तमें न आया तो पवित्रता और स्थिरता कहांसे
होगी “पर्यायोक्ति व्यावृत्तिदीपकालंकार” ॥ ६७६ ॥
मनमोहनसे मोहकरि, तू घनश्याम सँभारि ।
कुंजविहारीसों विहारि, गिरिधारी उर धारि ६७७॥
हे मानवती ! तू मानसे निर्मोही होरही है मनमोहनसे
मोह (प्रेम) कर इन घनश्याम (काले मेघ) को देखकर
उनको संभार वे इस समय कुंजमें स्थित हैं तू भी कुंजमें चल-
कर उनके साथ विहार कर वे गिरिधारी सबके रक्षक हैं इस
समय तू उनको हृदयसे लगाय धारण कर “पुनरुक्तवदाभा-
सालंकार” [ दो०-अर्थ लखै पुनरुक्तसों, अरु पुनरुक्त न
होय। सो पुनरुक्त्याभासवत, भूषण कह सब कोय ]॥६७७॥
तौलगि या मनसदनमें, हरि आवैं केहि बाट ।
निपटविकट जबलों जुटे, खुलै न कपटकपाट ६७८
सप्तमशतक ७. ( २२१ )
तबतक इस मनरूपी घरमें भगवान् किस बाटसे आवैं
जबतक अतिविकट भिड़े हुए कपाटरूपी किवाड़ नहीं खु-
लते "रूपक" ॥ ६७८ ॥
बुधि अनुमान प्रमाण श्रुति,किये नीठ ठहराय ।
सूक्ष्मगतिपरब्रह्मकी,अलखलखी नहिंजाय६७९
बुद्धि अनुमान और वेदप्रमाणसे मनमें निश्चय ठहरता
है परन्तु परब्रह्मकी सूक्ष्म गति होनेसे तथा अलख होनेसे
लखी नहीं जाती इसीप्रकार कटिभी सूक्ष्म है होतो पर दि-
खाई नहीं देती "अनुमानालंकार" ॥ ६७९ ॥
या भव पारावारको, उलँघि पार को जाय ।
तियछवि छाया ग्राहिणी, गहै बीचही आय६८०
इस जगतरूपी संसारको उल्लंघनकर पार कौन जा सकता
है इसमें तियकी छवि छायाग्राहिणी है, सो बीचही आकर
पकड़लेती है आशय यह कि, स्त्रीसे कोई ही मुक्त होता
है छायाग्राहिणीने महावीरजीको धग था "पूर्णोपमा वा
दृष्टान्त" ॥ ६८० ॥
तज तीरथ हरि राधिका, तनद्युति कर अनुराग ।
जेहिब्रजकेलिनि कुंजमग,पगपगहोतप्रयाग६८१
हे मन ! अनेक तीर्थोंका भ्रमण छोड़कर राधाकृष्णके
शरीरकी कान्तिमें प्रेम कर, जिस ब्रजकी विहारकुंजके
( २२२ ) सतसई-सटीक ।
मार्गमें ( पग पगपर प्रयाग होता है, ) इयाम शरीर यमुना,
राधिकाकी शोभा गंगा दोनोंका अनुराग सरस्वती है
“ अनुज्ञा ” अथवा हे तिय ! रथ त्याग यहां राधाइयामके
चरणोंमें अनुराग कर इस ब्रजमें पग पगमें प्रयाग होता है,
किसीकी स्त्री रथमें बैठी यात्रा करतीथी उसके स्वामीने कहा
है “ काव्यलिंग ” ॥ ६८१ ॥
अपने अपने मत लगे, वाद मचावत शोर ।
ज्यों त्यों सेवो सबहिको, एकै नन्दकिशोर ६८२
अपने २ मतमें लगे सब वृथा शोर मचाते हैं, जैसे तैसे
सबका सेवना एकही नंदकिशोर है “परिसंख्यालंकार” ६८२
तो अनेक अवगुण भरी, चाहै याहि बलाय ।
ज्यों पति सम्पति हू बिना, यदुपति राखैजाय ६८३
सम्पत्ति अनेक अवगुण भरी है, इसकी चाहना हमारी
बलाय करती है, जो कृष्णचंद्र रक्खैं तो सम्पत्ति बिनाभी
पत रहती है “ संभावना ” ॥ ६८३ ॥
दीरघ साँस न लेइ् दुख, सुखसाईं मति भूल ।
दई दई कत करत है, दई दई सुकबूल ॥६८४॥
दुःखसे दीर्घश्वास मत ले सुखके स्वरूप भगवान्को मत
भूले दैव दैव क्यों करता है जो दैवने दिया है सो अंगीकार
कर “ जमकालंकार ” ॥ ६८४ ॥
सप्तमशतक ७. ( २२३ )
दियो सुशींश चढ़ाय ले, आछी भाँति अहेर ।
जापै चाहत सुखलयो, ताके दुखहि नफेरि ६८५
भगवान्ने जो दिया है सो शिरचढ़ाले अच्छी भाँति देख
अंगीकार कर जिससे सुख लियाचाहता है उसके दिये दुःखको
मतफेरे “ विचित्र ” ॥ ६८५ ॥
नीकीदई अनाकनी, फीकी परी गुहारि ।
मनो तज्यो तारन विरह, वारिक वारण तारि ६८६
हे ईश ! आपने अच्छी आनाकानीकी मेरी पुकार सुन-
करभी आनाकानी की, एकबार हाथीको तारकर मानों तारने-
का यशही छोड़ दिया ॥ ६८६ ॥
कौनभांति रहिहै विरद, अब देखनी मुरारि ।
वीधे मोमों आनिकै, गीधे गीधहि तारि ॥ ६८७॥
अब तुम्हारा यश किसप्रकारसे रहेगा सो देखना है हे
मुरारि ! आप मुझसे आकर अटकेहो और पगनेहो गिद्धको
तारकर अर्थात् मुझको किस प्रकारसे तार सकोगेहो “काव्य-
लिंग ” ॥ ६८७ ॥
बंधुभये का दीनके, को तारे रघुराय ।
तूठे तूठे फिरतहो, झूठे विरद कहाय ॥ ६८८ ॥
( २२४ ) सतसई-सटीक ।
हे भगवन् ! आप किस दीनके बंधु हुए आपने किसको
तारा जो प्रसन्नहो लोकोंसे झूठा यश कहलानेको फिरतेहो ॥
थोरेई गुण रीझते, बिसरई वह बानि ।
तुमहू कान्ह मनो भये, आजकालके दानि ६८९
पहले तो थोड़ेसेही गुणसे रीझ जाते थे अब वह बान
बिसरादी, हे कृष्ण! तुम भी मानों आजकालके ढोलिनटके
समान दानी हुए जैसे नट ढोल बजाकर करतब दिखाता है
इस प्रकार दो एक कार्यकर आपने बिरद विख्यात किया
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६८९ ॥
कबको टेरत दीनरत, होत न श्याम सहाय ।
तुमहू लागी जगत गुरु, जगनायक जगवाय ६९०
हे श्याम ! मैं कबका दीनहो टेरता हूं आप मेरे सहाय
नहीं होते हे जगद्गुरु ! आपको भी जगतकी हवा लगी है
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६९० ॥
ज्यों ह्वैहौं त्यों होंहुँगो, हौं हरि अपनी चाल ।
हठ नकरो अतिकठिन है, मोतारिबो गोपाल ६९१
जो हूंगा सो होंऊंगा, हे कृष्ण ! मैं अपनी रीतिपरहूं तुम
हठ न करो मैं महापापी हूँ मेरा तारना अतिकठिन है
“ उत्प्रेक्षा ” ॥ ६९१ ॥
सप्तमशतक ७. ( २२५ )
करो कुबत जग कुटिलता, तजो न दीनदयाल ।
दुखी होहुगे सरलहिय, बसत त्रिभंगीलाल ६९२
चाहे सबसंसार मेरी निंदाकरे परन्तु मैं कुटिलता न छोडूँगा,
हृदय सीधा न करूंगा, हे दीनदयालु ! आप सीधा हृदय
करनेसे दुःखीहोगे कारण कि, मेरे हृदयमें त्रिभंगी-
छविकी आपकी मूर्त्ति निवास करती है चरण कटि ग्रीवा ति-
रछी कर खड़े होनेको त्रिभंगी कहते हैं सूधे हृदयमें टेढा
आपसे न रहा जायगा " काव्यलिंग " ॥ ६९२ ॥
मोहिं तुम्हें बाढी बहस, को जीतै यदुराज ।
अपने २ बिरदकी, दुहूँ निबाहनि लाज ॥६९३॥
हे यदुराज ! मुझमें और तुममें बहस पड़ी है देखें
कौन जीतै अपने २ बिरदकी दोनों लाज निबाहैं ये अर्थात्
मैं तौ अपना पतितपन नहीं छोडूँगा और आप अपना पतित
पावनपन नहीं छोडेंगे " विरोधाभास " ॥ ६९३॥
समै पलट पलटै प्रकृति, को न तजै निज चाल ।
भों अकरुण करुणा करौ-यह कपूत कलिकाल ॥
- समयके पलटनेमें रागरागिनी बदलती है अपनी चाल
१५
( २२६ ) सतसई-सटीक ।
कौन नहीं छोडदेता हे दयालु ! आप भी करुणारहित हुए
अब दया करो यह कलिकाल महाकपूत है "सहोक्ति" ६९४
तौवलिये भलिए वनी, नागर नन्दकिशोर ।
जो तुम नीकेकै लखो, मो करनीकी ओर ६९५
म बलिहारी जाऊं हे नागरनन्दकिशोर ! तो तौ भली ही
बनजाय जो आप भली प्रकारसे मेरी करनीकी ओर देखा
" सम्भावना लंकार " ॥ ६९५ ॥
हरि कीजत तुमसों यहै, बिनती बार हजार ।
जेहितेहि भांति ड्योरहौं, पर्योरहौं दरबार ६९६
हे हरि ! आपसे वारंवार यही विनती है कि, जिस तिस
भाँतिसे डरता हुआ आपके दरबारमें पड़ा रहूं " लोकोक्ति
अलंकार " ॥ ६९६ ॥
निजकरनी सकुचौंहिकत, सकुचावत इहिचाल ।
मोहूसे अतिविमुखसों, सन्मुख होत गुपाल ६९७॥
एक तो मैं अपनी करनीसे सकुचाता हूं फिर आप इस री-
तिसे क्यों सकुचातेहो कि, आप मुझसे अति विमुखके भी
सन्मुख होते हो हे कृष्ण ! " परिकरांकुर " ॥ ६९७ ॥
सप्तमशतक ७. ( २२७ )
कीजै चित सोई तरौं, जेहि पतितनके साथ ।
मेरे गुण अवगुण गणनि,गिनौ न गोपीनाथ६९८॥
हे कृष्ण ! चित्तमें वही कीजिये जिससे मैं पतितोंके साथ
तरजाऊं हे गोपीनाथ!आप मेरे गुण अवगुणकी गिन्ती नकरो
" दीपकालंकार " ॥ ६९८ ॥
प्रगटभये द्विजराजकुल,सुवस बसे ब्रजआय ।
मेरे हरो कलेश सब,केशव केशव राय ॥ ६९९॥
चन्द्रवंशमें प्रगट होकर ब्रजमें आनकर बसे केशवभग-
वान् और केशवराय ( पिता ) मेरे सब क्लेश हरें, पिताके
पक्षमें, जो ब्राह्मणश्रेष्ठकुलमें उत्पन्न हुए और ब्रजमें आन-
कर बसे " श्लेषालंकार " ॥ ६९९ ॥
सोरठा ।
मोहूदीजे मोष, ज्यों अनेक अधमन दियो ।
जो बांधि ही तोष, तों बांधो अपने गुणन॥ ७००॥
हे भगवन् मुझे भी आप मुक्ति दीजिये जैसे अनेक अ-
धर्मियोंको दी है और जो बाँधिहीमें सन्तोष हो तो अपने
गुणोंसे बांधो "श्लेषालंकार" ॥ ७०० ॥
(२२८) सतसई-सटीक ।
चलतपाय निर्गुणी गुणी, धन मणि मोतीमाल ।
भेंटभये जयशाहसों, भाग चाहियत भाल ७०१॥
गुणी निर्गुणीभी जिसको पाकर धनमणि मोतीमाला
लेकर जाते हैं जयशाहसे भेंट होनेपर माथेमें भाग्य चाहिये
“काकोक्ति” ॥ ७०१ ॥
रहति न रण जयशाहमुख, लखि लाखनकी फौज।
जाचि निराखर हू चलै, लैलाखनकी मौज ७०२॥
लाखों मनुष्योंकी सेनाभी युद्धमें जयशाहका मुख देख
स्थित नहीं रहसकती और मांगकर निरक्षरभी जिनसे लाखों
लेजाते हैं ॥ ७०२ ॥
प्रतिबिम्बित जयशाहदुति, दीपति दर्पणधाम ।
सब जग जीतनको कियो, कायव्यूह मनु काम ॥
शीशमहलमें राजा जयशाहकी परछाहीं दीप्तिको प्राप्त
होती है मानों सब जगत् जीतनेको कामदेवने अपनी काया-
का व्यूह (समूह) रचा है “उत्प्रेक्षा लंकार” ॥ ७०३ ॥
घर घर हिन्दुनि तुरकिनी, देत अशीश सराह ।
पतिनु राखि चादर चुरी, पति राखी जयशाह ७०४
सप्तमशतक ७. ( २२९ )
घर घरमें हिन्दुओंकी और तुरकोंकी स्त्री सराहना कर
अशीश देती हैं कि, हमारे पतियोंकी रक्षाकर जय शाहने
हमारी चूरी और चादर रक्खी वैधव्यमें हिन्दुओंमें चूरी और
तुरकोंमें चादरका त्याग होता है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ७०४॥
सामा सेन सयानकी, सबै शाहके साथ ।
बाहुबली जयशाहजू, फते तिहारे हाथ ॥७०५॥
सामान सेना चातुरीयुक्त सब दिल्लीपतिकी शाहके
साथ है परन्तु हे बाहुबली जयशाहजी ! फतह ( जीत )
आपहीके हाथ है 'तुम जहाँ जातेहो जीततेहो' ( दक्षिणका
युद्ध है ) ॥७०५॥
हुकम पाय जयशाहको, हरिराधिकाप्रसाद ।
करी बिहारी सतसई, भरी अनेक सवाद॥७०६॥
जयशाहका हुकम पाकर हरि राधिकाके प्रसादसे बिहारी-
दासने अनेक संवादभरी सतसई निर्माण करी ॥ ७०६ ॥
सम्बतग्रहशशिजलधिक्षिति, छठतिथिवासरचंद।
चैतमास पख कृष्णमें, पूरण आनंदकंद॥७०७॥
संवत १७१९ में चैत्रकृष्ण छठ चंद्रवारके दिन यह सत-
सई पूर्णहुई ग्रह ९ शशि १ जलधि ७ क्षिति १ अंकों
की वामगतिसे १७१९ सम्बत हुए ॥ ७०७ ॥
( २३० ) सतसई-सटीक ।
गुरुजन दूजे व्याहको, नितउठि कहत रिसाय ।
पतिकी पति राखत वधू, आप न बाँझकहाय ७०८
घरके बड़ेलोग नित उठकर दूसरा व्याह करनेको रिसा-
कर कहते हैं परन्तु बहू आप बांझ कहाकरभी पतिकी पत
रखती है पतिका दोष कथन नहीं करती "जातिअलं-
कार" ॥ ७०८ ॥
अरे हंस या नगरमें, जैयो आप विचारि ।
कागनसों जिन प्रीतिकर, कोयलदईबिडारि ७०९
अरे हंस इस नगरमें विचारकर जाना कारण कि, यहांके
निवासियोंने कौएसे प्रीति करके कोयलोंको निकाल दियाहै
"अन्योक्ति" ॥ ७०९ ॥
यदपि पुराने बक तऊ, सरवर निपट कुचाल ।
नये भये तो कहाभये, ये मनहरन मराल॥७१०॥
यद्यपि पुराना बगलाहै तोभी सरोवरपर उसकी अतिही
कुचाल है नयेहुए तो क्या हुआ यह हंस मन हरनेवाले
हैं ॥ ७१० ॥
सखी सिखावत मानविधि, सैनन बरजति बाल ।
हरुवेकहि मो हिय वसत, सदा विहारीलाल ७११॥
सप्तमशतक ७. ( २३१ )
सखी मान सिखाती है परन्तु बाला सैनोंमें बरजती है
हौलेसे कहती है मेरे हृदयमें विहारीलाल सदा बसते हैं
"प्रेमालंकार" ॥ ७११ ॥
ठाढ़ी मंदिरमें लखै, मोहन द्युति सुकुमार ।
तनु थाके हू नाथके, चखचित चतुर निहार ७१२
वह सुकुमारी मंदिरमें खड़ी मोहनकी कोमल कान्ति दे-
खती है शरीर थकनेपरभी उसके नेत्र और चित्त नहीं थके
देखेही जाती है "विशेषोक्ति लंकार" ॥ ७१२ ॥
शशिबदनी मोसों कहत, सो यह साँची बात ।
नैननलिन यह रावरे, न्याय निरखि नैजात ७१३
आप मुझसे चंद्रमुखी कहते हो सो यह बात सत्य है इसी
कारण यह आपके कमलनेत्र मुझे देखकर झुक जाते हैं
अर्थात् चंद्रको देख कमल सकुचाता है "हेतूत्प्रेक्षा" ॥७१३॥
जा मृग नेनीके सदा, वेणी परसति पाय ।
तायदेखमनतीस्थनि, विकटनि जाय बलाय ७१४
जिस मृगलोचनीके सदा वेणी (शिरकी चोटी वा त्रिवेनी)
पाँय परसती है उसका दर्शन कर फिर विकट तीर्थोंमें
विचरनेको बलाय जाय. (राधिका वर्णन) ॥ ७१४ ॥
(२३२) सतसई-सटीक ।
तजब हटावन हठ परो, शठमति आठों जाम ।
भयो वाम वा वामको, रहत कामबेकाम ॥ ७१५ ॥
यह शठमति आठों प्रहर हठ नहीं छोडता हठ ग्रहण किये
है कामदेव निष्प्रयोजन सदाही उससे प्रतिकूल रहता है
वाम-बायाँ प्रतिकूल ॥ ७१५ ॥
पायल पाँय लगीरहै, लगे अमोलक लाल ।
भोडरहूकी भासिहै, बेंदी भामिनि भाल ॥७१६॥
अमूल्य लाल लगनेसेभी पायल पांवसेही लगी रहती है
चाहे अभ्रककीभी है परन्तु बेंदी बालाके माथेपरही शोभित
होतीहै ऊँचे ऊँचेही हैं नीचे नीचेही हैं "अन्योक्ति" ॥७१६॥
भो यह ऐसोई समय, जहां सुखद दुख देत ।
चैतचाँदकी चाँदनी, डारत किये अचेत ॥७१७॥
अब यह ऐसाही समय आगया सुखदाई वस्तु दुःखदाई
होगई चैतके महीनेकी चाँदनी अचेत किये डालती है
"व्याघात अलंकार" ॥ ७१७ ॥
यदपि नाहिं नाहीं वही, वदन लगी जकजाति ।
तदपि भौंह हांसी भरिनु, हाँसीये ठहराति ७१८॥
सप्तमशतक ७. ( २३३ )
यद्यपि मुखसे नहीं नहीं वही जक लगीजाती है तौभी
हँसीसे भरीहुई भौंहोंमें 'हाँ' सीही ठहरती है । अर्थात
मुखमें नहीं भौंहोंमें हाँ है "विरोधाभास"॥ ७१८ ॥
मुख सूखै मिस रोष मुख, कहत रूखो ह्वै वैन ।
रूखे कैसे होत यह, नेह चीकने नैन ॥ ७१९ ॥
रोषके बहानेसे मुख रूखा किया मुखसे रूखी बातें
कहती हैं परन्तु यह नेहसे चिकने नेत्र रूखे कैसे होसकते हैं
"काव्यलिंगालंकार"॥ ७१९ ॥
वाम तमासे करिरही, विवश वारुणी सेइ ।
झुकति हँसति हँसि हँसि झुकति,झुकि २ हँसि २ देइ
वारुणी पान करके वाम विवश हो तमासे कररही है
कभी झुकती हँसती फिर झुकती झुक २ कर हँस देती है
"जातिअलंकार"॥ ७२० ॥
लग्यो सुमन ह्वैहै सुफल,आतप दोष निवारि ।
वारी वारी आपनी, सींच सुहदता वारि ॥७२१॥
• सुमन ( फूल ) लगा है अच्छा फल लगेगा गर्मीके
दोषसे बचाकर अपना अच्छा मन लगाके फलभी अच्छा लगेगा
( २३४ ) सतसई-सटीक ।
क्रोधरूपी गरमीसे बचाव कर हे वारी ! अपनी प्रेमरूपी वा-
ड़ीको सुहृदतारूप जलसे सींच मान मत कर "श्लेषालं-
कार" ॥ ७२१ ॥
ललन चलन सुनि चुपरही, बोली आप न ईठ ।
राख्यो गंहि गाढे गरो, मनो गलगलीदीठ ॥७२२॥
लालनका चलना सुनकर चुपरही स्वयं प्रीतमसे न बोली
मानो आंसूभरी दृष्टि ने कसकर प्यारीका गला पकड़ रक्खा
है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ७२२ ॥
सकै सताय न तम विरह, निशदिन सरस सनेह ।
वहै रहै लागी दृगनि, दीपशिखासी देह ॥ ७२३ ॥
रात दिन सनेहके कारण विरह रूपी तम नहीं सतासकता
कारण कि, रात दिन नेत्रोंसे उसकी देह दीपकी शिखासी
लगी रहती है "विशेषोक्ति" ॥ ७२३ ॥
इति श्री पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहित विहारी-
लालकी सतसई सम्पूर्ण ।
प्रशंसा।
दोहा।
सतसैयाके दोहरा, ज्यों नावकको तीर।
देखतके छोटे लगैं, बेधैं सकल शरीर ॥ १ ॥
सतसईके दोहे नावककेसे तीर हैं देखनेके छोटे लगते हैं
परन्तु सब शरीर वेधते हैं ॥ १ ॥
ब्रजभाषा वरणा कविन, बहुविधि बुद्धिविलास।
सबकी भूषण सतसई, करी विहारीदास ॥ २ ॥
यद्यपि कवियोंने अपनी बुद्धिके अनुसार अनेकविधि
ब्रजभाषाका वर्णन कियाहै परन्तु विहारीदासने सबकी
भूषण सतसई निर्माण की है ॥ २ ॥
करे सातसै दोहरा, सुकवि विहारीदास।
सबकोऊ तिनको पढ़ैं, गुणैं गुणेश विलास ॥ ३ ॥
सुकवि विहारीदासने सातसौ दोहे निर्माण किये उनके
पढ़नेसे गुणनकरनेसे सुख होता है ॥ ३ ॥
( २३६ ) सतसई-सटीक ।
दोहा-राधामाधव पदकमल, प्रेमसहित शिरनाय ।
भाषामें सतसईको, टीका लिखो बनाय ॥ १ ॥
अलंकार अरु अर्थ सब, भाव सहित दरशाय ।
कियो सरसटीका सरल, बुधजन लख सुखपाय॥ २ ॥
वेद बाण अरु अंक विधु, सम्वत पौष सुमास ।
तेरस तिथि बुधवारको, पूरण किय सुखरास ॥ ३ ॥
बसत रामगंगा निकट, नगर मुरादाबाद ।
भजन करत हरिको तहां, बुध ज्वालापरसाद ॥ ४ ॥
तिन हितसों टीका कियो, राधाकृष्ण मनाय ।
ब्रजविलास रचना कछू, भाषामय दरशाय ॥ ५ ॥
जगत विदित श्रीसेठजी, खेमराज सुखदान ।
तिनको सौंपी स्वत्वसह, याहि न छापे आन ॥ ६ ।
कृष्णराधिका ध्यान धर, भज श्रीराधे श्याम ।
इनहीके परसादसे, सिद्ध होत सब काम ॥ ७ ॥
इति ।
पुस्तक मिलनेका पता—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् प्रेस खेतवाड़ी-मुंबई.
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