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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 284

सप्तमशतक ७. ( २३१ )
सखी मान सिखाती है परन्तु बाला सैनोंमें बरजती है
हौलेसे कहती है मेरे हृदयमें विहारीलाल सदा बसते हैं
"प्रेमालंकार" ॥ ७११ ॥
ठाढ़ी मंदिरमें लखै, मोहन द्युति सुकुमार ।
तनु थाके हू नाथके, चखचित चतुर निहार ७१२
वह सुकुमारी मंदिरमें खड़ी मोहनकी कोमल कान्ति दे-
खती है शरीर थकनेपरभी उसके नेत्र और चित्त नहीं थके
देखेही जाती है "विशेषोक्ति लंकार" ॥ ७१२ ॥
शशिबदनी मोसों कहत, सो यह साँची बात ।
नैननलिन यह रावरे, न्याय निरखि नैजात ७१३
आप मुझसे चंद्रमुखी कहते हो सो यह बात सत्य है इसी
कारण यह आपके कमलनेत्र मुझे देखकर झुक जाते हैं
अर्थात् चंद्रको देख कमल सकुचाता है "हेतूत्प्रेक्षा" ॥७१३॥
जा मृग नेनीके सदा, वेणी परसति पाय ।
तायदेखमनतीस्थनि, विकटनि जाय बलाय ७१४
जिस मृगलोचनीके सदा वेणी (शिरकी चोटी वा त्रिवेनी)
पाँय परसती है उसका दर्शन कर फिर विकट तीर्थोंमें
विचरनेको बलाय जाय. (राधिका वर्णन) ॥ ७१४ ॥