बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२३२) सतसई-सटीक ।
तजब हटावन हठ परो, शठमति आठों जाम ।
भयो वाम वा वामको, रहत कामबेकाम ॥ ७१५ ॥
यह शठमति आठों प्रहर हठ नहीं छोडता हठ ग्रहण किये
है कामदेव निष्प्रयोजन सदाही उससे प्रतिकूल रहता है
वाम-बायाँ प्रतिकूल ॥ ७१५ ॥
पायल पाँय लगीरहै, लगे अमोलक लाल ।
भोडरहूकी भासिहै, बेंदी भामिनि भाल ॥७१६॥
अमूल्य लाल लगनेसेभी पायल पांवसेही लगी रहती है
चाहे अभ्रककीभी है परन्तु बेंदी बालाके माथेपरही शोभित
होतीहै ऊँचे ऊँचेही हैं नीचे नीचेही हैं "अन्योक्ति" ॥७१६॥
भो यह ऐसोई समय, जहां सुखद दुख देत ।
चैतचाँदकी चाँदनी, डारत किये अचेत ॥७१७॥
अब यह ऐसाही समय आगया सुखदाई वस्तु दुःखदाई
होगई चैतके महीनेकी चाँदनी अचेत किये डालती है
"व्याघात अलंकार" ॥ ७१७ ॥
यदपि नाहिं नाहीं वही, वदन लगी जकजाति ।
तदपि भौंह हांसी भरिनु, हाँसीये ठहराति ७१८॥