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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 287

( २३४ ) सतसई-सटीक ।
क्रोधरूपी गरमीसे बचाव कर हे वारी ! अपनी प्रेमरूपी वा-
ड़ीको सुहृदतारूप जलसे सींच मान मत कर "श्लेषालं-
कार" ॥ ७२१ ॥
ललन चलन सुनि चुपरही, बोली आप न ईठ ।
राख्यो गंहि गाढे गरो, मनो गलगलीदीठ ॥७२२॥
लालनका चलना सुनकर चुपरही स्वयं प्रीतमसे न बोली
मानो आंसूभरी दृष्टि ने कसकर प्यारीका गला पकड़ रक्खा
है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ७२२ ॥
सकै सताय न तम विरह, निशदिन सरस सनेह ।
वहै रहै लागी दृगनि, दीपशिखासी देह ॥ ७२३ ॥
रात दिन सनेहके कारण विरह रूपी तम नहीं सतासकता
कारण कि, रात दिन नेत्रोंसे उसकी देह दीपकी शिखासी
लगी रहती है "विशेषोक्ति" ॥ ७२३ ॥
इति श्री पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहित विहारी-
लालकी सतसई सम्पूर्ण ।