बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३० ) सतसई-सटीक ।
गुरुजन दूजे व्याहको, नितउठि कहत रिसाय ।
पतिकी पति राखत वधू, आप न बाँझकहाय ७०८
घरके बड़ेलोग नित उठकर दूसरा व्याह करनेको रिसा-
कर कहते हैं परन्तु बहू आप बांझ कहाकरभी पतिकी पत
रखती है पतिका दोष कथन नहीं करती "जातिअलं-
कार" ॥ ७०८ ॥
अरे हंस या नगरमें, जैयो आप विचारि ।
कागनसों जिन प्रीतिकर, कोयलदईबिडारि ७०९
अरे हंस इस नगरमें विचारकर जाना कारण कि, यहांके
निवासियोंने कौएसे प्रीति करके कोयलोंको निकाल दियाहै
"अन्योक्ति" ॥ ७०९ ॥
यदपि पुराने बक तऊ, सरवर निपट कुचाल ।
नये भये तो कहाभये, ये मनहरन मराल॥७१०॥
यद्यपि पुराना बगलाहै तोभी सरोवरपर उसकी अतिही
कुचाल है नयेहुए तो क्या हुआ यह हंस मन हरनेवाले
हैं ॥ ७१० ॥
सखी सिखावत मानविधि, सैनन बरजति बाल ।
हरुवेकहि मो हिय वसत, सदा विहारीलाल ७११॥