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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 286

सप्तमशतक ७. ( २३३ )
यद्यपि मुखसे नहीं नहीं वही जक लगीजाती है तौभी
हँसीसे भरीहुई भौंहोंमें 'हाँ' सीही ठहरती है । अर्थात
मुखमें नहीं भौंहोंमें हाँ है "विरोधाभास"॥ ७१८ ॥
मुख सूखै मिस रोष मुख, कहत रूखो ह्वै वैन ।
रूखे कैसे होत यह, नेह चीकने नैन ॥ ७१९ ॥
रोषके बहानेसे मुख रूखा किया मुखसे रूखी बातें
कहती हैं परन्तु यह नेहसे चिकने नेत्र रूखे कैसे होसकते हैं
"काव्यलिंगालंकार"॥ ७१९ ॥
वाम तमासे करिरही, विवश वारुणी सेइ ।
झुकति हँसति हँसि हँसि झुकति,झुकि २ हँसि २ देइ
वारुणी पान करके वाम विवश हो तमासे कररही है
कभी झुकती हँसती फिर झुकती झुक २ कर हँस देती है
"जातिअलंकार"॥ ७२० ॥
लग्यो सुमन ह्वैहै सुफल,आतप दोष निवारि ।
वारी वारी आपनी, सींच सुहदता वारि ॥७२१॥
• सुमन ( फूल ) लगा है अच्छा फल लगेगा गर्मीके
दोषसे बचाकर अपना अच्छा मन लगाके फलभी अच्छा लगेगा