भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पुराने हमले ५५
थे। धीरे धीरे उनका अस्तित्व भी ‘यवनों’ के अस्तित्व की तरह शेष भारत-
वासियों के अस्तित्व में मिल कर एक हो गया।
शक और पहलव जातियों के हमलों के बाद मुसलमानों के हमले से
पहले भारत पर अब केवल एक हमला ‘हुण’ जाति का और बाक़ी रह
जाता है। यह हमला वास्तव में प्राचीन भारत पर सब से वहशियाना
हमला था। एशिया या यूरोप का क़रीब क़रीब कोई भी मुल्क इनके भयङ्कर
हमलों से नहीं बचा। इसी हुण जाति के हमलों से अपनी रक्षा करने के
लिये चीन के सम्राटों ने दो हज़ार मील लम्बी और अलौकिक चौड़ाई और
ऊँचाई की चीन की प्रसिद्ध “बड़ी दीवार” को तामीर कराया था। इन्हीं
हुण जाति के हमलों ने ईसा से क़रीब डेढ़ दो सौ साल पहले बख्तियारी
साम्राज्य को तहस नहस कर दिया। रूस और यूरोप को भी इन्हीं हमलों
ने बरबाद किया और क़रीब एक हज़ार साल तक वीरान बनाए रक्खा।
भारत का भी इन हमलों से बच सकना नामुमकिन था। ईसा के जन्म से
पहले इराक़ से लेकर भारत की उत्तर पच्छिमी सीमा तक सारा मुल्क इसी
जाति के अधीन था।
ईसा की पाँचवीं सदी के मध्य में इस हुण जाति के लोगों ने भारत
पर हमला किया। एक बार पञ्जाब, मध्य भारत और मालवा तक उनका
शासन जम गया। हुण सरदार तुरामान ने भारत के सम्राट बुद्धगुप्त को
परास्त कर दिया। किन्तु उसके बाद ही सम्राट यशोधर्मदेव ने, जिसकी
राजधानी उज्जैयनी थी, और जिसका साम्राज्य हिमालय से पूर्वीय घाट तक
और ब्रह्मपुत्र से अरब समुद्र तक सारे भारत पर फैला हुआ था, सन् ५७३
ई० में तुरामान के पुत्र मिहिरकुल को मुलतान के पास कोहूर नामक स्थान
५६ पुस्तक प्रवेश
पर परास्त कर भारत से हुण जाति की हुकूमत को मिटा दिया । इसके बाद
राज्यवर्धन ने शेष उत्तर भारत से हुण जाति के रहे सहे प्रभाव का भी अन्त
कर दिया ।
अब हम उन सब हमलों को एक एक कर बयान कर चुके हैं जो मुसल-
मानों के हमले से पहले भारत पर हुए थे । हमने यह सारा बयान यूरोपियन
इतिहास लेखकों की किताबों से ही किया है। इससे पूरी तरह अनुमान
किया जा सकता है कि भारत पर उस समय तक कितने और किस तरह के
हमले हुए । भारत ने कहाँ तक कामयाबी के साथ उनका मुक़ाबला किया,
उन हमलों से भारत को कहाँ तक हानि या लाभ हुआ, और इन सब
हमलों में और भारत पर अंगरेज़ों के हमले में कितना ज़बरदस्त अन्तर था ।
अन्य देशों पर हमले
सच यह है कि कम या ज़्यादा बाहर से हमलों का होना हर मुल्क के
इतिहास में एक मामूली बात है । फिर भी भारत पर कभी भी इतने ज़्यादा
हमले नहीं हो पाए जितने बाक़ी संसार के ज़्यादातर देशों और ख़ास कर
यूरोप के क़रीब क़रीब हर देश पर । इसके सबूत में अब हम यूरोप के
विविध देशों पर बाहर के हमलों और उनके नतीजों का सार वृत्तान्त
यूरोपियन लेखकों ही के आधार पर देते हैं, जिससे यह भी मालूम हो
जायगा कि भारत में कभी इस तरह के हमलों की वजह से उस बरबादी का
हज़ारवां हिस्सा भी देखने में नहीं आया, जो बरबादी कि इस तरह के हमलों
के सबब से तमाम यूरोप में एक हज़ार साल से ऊपर तक फैली रही ।
यूरोप पर एशियाई जातियों के हमले
अनेक यूरोपियन इतिहास लेखक स्वीकार करते हैं कि यूरोप के ऊपर
पुराने हमले ५७
एशियाई क़ौमों के हमले ईसा से हज़ारों साल पहले से जारी थे। इनमें
आर्य्य जाति के हमले का ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं। इसके बाद ईसा से
८०० साल पहले यूरोप पर अन्य एशियाई जातियों के हमलों का भी
यूरोपियन इतिहास में ज़िक्र आता है। वास्तव में इस तरह के हमले समय
समय पर बराबर होते रहे। किन्तु इस स्थान पर उन सब हमलों को छोड़
कर केवल हज़रत ईसा के जन्म के बाद के हमलों को ही थोड़े से शब्दों में
बयान कर देना चाहते हैं।
ईसा की दूसरी सदी से लेकर पूर्वीय एशिया और मध्य एशिया की
अनेक क़ौमें जैसे हुण, अबार, बलगार, ख़ज़ार, पत्ज़ेनाक, मगियार, मङ्गोल
इत्यादि बराबर अपनी एशियाई आबादियों से निकल निकल कर यूरोप
पर हमला करती रही हैं। इस तरह के हमले एक हज़ार साल तक, रूस
से लेकर जरमनी, इतालिया, इङ्गलिस्तान और स्पेन तक बराबर होते रहे।
इनमें शुरू की हमला करने वाली क़ौमों ने पूर्वी यूरोप और मध्य यूरोप में
जाकर अपनी बस्तियाँ आबाद कीं। बाद के हमला करने वालों ने इन पहले
आए हुए लोगों को उत्तर और पच्छिम की ओर भगा कर ख़ुद उनकी जगह
ले ली।
ये हमले तमाम यूरोप के ऊपर इतने लगातार और इतने अधिक देशों
पर हुए कि उन्हें एक दूसरे के बाद तरतीबवार बयान करना हमारे लिए
अनावश्यक है। इसलिए हम इन सब क़रीब एक हज़ार साल के हमलों का
सार यूरोपियन इतिहास लेखकों ही के शब्दों में दे देना चाहते हैं।
ईसा की पाँचवीं सदी में क़रीब एक चौथाई यूरोप, जिसमें यूनान,
बलकान, इतालिया, स्पेन और इङ्गलिस्तान—सब शामिल थे, रोमन लोगों
२८ पुस्तक प्रवेश
के अधीन था। इसके बाद एशिया की इन्हीं हमलावर क़ौमों ने यूरोप
पहुँच कर सारे रोमन साम्राज्य को तहस नहस कर डाला।
इङ्गलिस्तान के ऊपर चार सौ साल तक रोमन लोगों की हुकूमत रही।
उसके बाद ईसा की पाँचवीं सदी में इन्हीं एशियाई क़ौमों में से एक सैक्सन
ने, जिसका उत्पत्ति स्थान कहीं पर मध्य एशिया में समझा जाता है, रोमन
लोगों को निकाल कर बाहर किया, और इङ्गलिस्तान के असली बाशिन्दे
ब्रिटनों को अपने अधीन कर लिया। आज कल की अँगरेज़ क़ौम जो अपने
देश के अन्दर हर तरह आज़ाद है, इन्हीं ब्रिटनों, सैक्सनों और इसी तरह
की अनेक क़ौमों से मिल कर बनी हुई है।
इन हमलों से यूरोप की बरबादी
जब कि विशाल और बलवान रोमन साम्राज्य भी इन लगातार हमलों
का मुक़ाबला न कर सका, तो फिर बाक़ी यूरोप की हालत का केवल
अनुमान कर लेना ही काफ़ी है। ईसा की पाँचवीं सदी में हुण जाति ने,
जिसका ज़िक्र भारत के सम्बन्ध में ऊपर आ जा चुका है, कास्पियन समुद्र
और डेन्यूब नदी के बीच अपना एक स्वतन्त्र साम्राज्य क़ायम कर लिया था
और रोम के निर्बल सम्राट तक इन हुण सम्राटों को खिराज देते थे। इसी
तरह का इन लोगों का एक दूसरा साम्राज्य ईसा की पाँचवीं और छठी
सदियों में पच्छिमी यूरोप में भी क़ायम हो गया। इन हमलों के सबब से
यूरोपियन समाज की जो हालत हुई उसे बयान करते हुए एक फ़्रांसीसी
इतिहास लेखक बुइसोनेद लिखता है :—
“पुराने रोमन समाज की सबसे ऊपर की और बीच श्रेणियों के
लोग उस तूफ़ान में मिट गए, या हमला करने वाले असभ्य लोगों
पुराने हमले ५६
ने उन्हें लूट लिया । उनमें से जो बचे वे विजेताओं में मिल कर
एक हो गए × × × ब्रिटेन में एङ्गलो सेक्सन जाति ने ब्रिटेन
जाति को बिलकुल बरबाद कर दिया × × × इन ज़ालिम
हमला करने वालों ने न केवल बड़े बड़े रोमन ज़मींदारों की
ज़मीनें छीन कर उन पर खुद अपने कुटुम्बों सहित रहना ही शुरू
कर दिया, बल्कि उन्होंने उन तमाम ज़मींदारों को मार डाला,
गिरजों को बरबाद कर दिया × × × ब्रिटेन (इंगलिस्तान) में जो
ब्रिटेन जाति के लोग बचे उन्हें उन्होंने गुलाम बना लिया × ×
× चारों ओर इतना दुःख फैल गया कि अनेक निराश लोगों को
केवल गुलामी में ही एक तरह का आश्रय मिला । डेन्यूब और
राइन के ज़िलों में गॉल (फ़्रान्स) में, बेल्जियम में और इतालिया
में रोमन आबादी के जिन लोगों की इन विजेताओं ने जान बख़्श
दी, उन्हें उन्होंने अपना गुलाम बना कर रखा । × × × ब्रिटेन में
इन लोगों ने इस तरह के जुल्म किए कि वहाँ के पुराने
उच्च घरानों के लोग मौत से बचने के लिए अरमोरिका
(पश्चिमोत्तर फ़्रान्स) चले गए और ब्रिटन लोगों की बहुत बड़ी
तादाद को क़त्ल कर डाला गया । × × × एकीटन में और स्पेन
में ईसाई धर्मपरायण लोगों को और पादरियों को पीटा गया,
उन्हें ज़ञ्जीरों से बाँध दिया गया और ज़िन्दा जला दिया गया ।
हर जगह, जब कि शहरों और क़स्बों को लूटा जाता था, स्त्रियों
को बड़ी बेइज़्ज़ती सहनी पड़ती थी । रोम विजय करने के बाद
ऐलेरिक के अधीन विसीगॉथ लोगों ने दरख़्तों के साए में लेट
६० पुस्तक प्रवेश
कर वहाँ की राजसभा के सदस्यों ( सेनेटर्स ) के बेटों और बेटियों
को, जिन्हें उन्होंने अपने जनान ख़ानों में क़ैद कर लिया था,
इस बात के लिए मजबूर किया कि वे सोने के प्यालों में शराब
भर भर कर उन्हें पिलाएँ । हर हमले के बाद हमला करने वालों
की स्त्रियों की तादाद बढ़ जाती थी । × × × मकदूनियां में,
थिसेली में, यूनान में, इलीरिया में, एपाइरस और डेन्यूब के
प्रान्तों में हमला करने वाले तूरानियों, जरमनों और स्लैव लोगों
ने पुरुषों को क़त्ल कर डाला और स्त्रियों और बच्चों को गिरफ़्तार
कर लिया ! × × × एक्वीटेन का पादरी प्रॉस्पर अपनी एक
कविता में लिखता है कि—‘ईश्वर के मन्दिर जला डाले
गए और मठ लूट लिए गए ! यदि गॉल (फ़्रान्स) की भूमि
पर से समुद्र की लहरें फिर जातीं तो उनसे हमें इतना अधिक
नुक़सान न होता !’ × × × हुण जाति के लोगों ने सब चीज़ों
का नाश कर डाला और जहाँ से निकले, मुल्क को वीरान बना
दिया । × × × इतिहास लेखक हृदेसियस लिखता है कि पाँचवी
सदी में स्पेन का ‘केवल नाम’ बाक़ी रह गया था । पूरब में
और पच्छिम में दोनों जगह बेशुमार खुशहाल नगर मिट गए और
फिर कभी न उभर सके । अकेले हुण जाति ने पूरब में सत्तर नगरों
को बरबाद कर दिया × × × ब्रिटेन में लण्डीनियम (लन्दन),
इबोरेकम ( यार्क ), कैमेलोडूनम ( कालचेस्टर ), डोरोवरनम
( कैण्टरबरी ), वेण्टाइसेनोरम ( नारविच ), एक्वासुलिस ( बाथ )
के खुशहाल छोटे छोटे शहर जिनकी रोमन लोगों ने बुनियाद
पुराने हमले ६५
रक्खी थी, खण्डहर होकर ढेर होगए। $\times\times\times$ पोप ग्रिग़री पहला
चिल्लाने लगा, 'मालूम होता है कि दुनियां का अन्त होने वाला
है। $\times\times\times$ पैनोनिया, नारिकम, रेटिया, हैलवेशिया (स्वीज़र-
लैण्ड), गॉल (फ़्रान्स), बेलजियम, ब्रिटेन, स्पेन और उत्तर और
मध्य इतालिया को ख़ास तौर पर तीव्र कष्ट भोगने पड़े, और
बलकान प्रायद्वीप को शायद इनसे भी अधिक कष्ट भोगने पड़े।
उस समय के इतिहास लेखक सब एक मत से बयान करते हैं कि
पूरब (यूनान इत्यादि) में और पच्छिम (इतालिया आदि) में
दुनियां पर एक समान वीरानी छा रही थी और इतिहास लेखकों
के अपने चित्तों पर निर्जनता और वीरानी का असर रह जाता था।
कोई कोई यह भी मानने लगे थे कि ईसाइयों के धर्म ग्रन्थों में
सृष्टि के जिस अन्त (क़यामत) की पेशीनगोई की गई है उसका
समय आ गया है।"*
यह कहानी अधिकांश यूरोप के ऊपर ईसा की पांचवीं, छठी और
सातवीं सदी के हमलों की है। आठवीं, नवीं और दसवीं सदी के इसी के
हमलों की बाबत इतिहास लेखक बुइसोनेद लिखता है—
"नवीं और दसवीं सदियों में नए हमलों ने पच्छिम यूरोप को
बरबादी से ढक लिया। स्केन्डिनेविया के डाकुओं ने, जिन्हें
'नॉर्थमैन' कहते थे' सन् ८३० से ९११ तक, क़रीब एक सदी
तक, वही जरमनों के से दुष्ट पराक्रम जारी रक्खे, उन्होंने जनता
- Life and Work in Meideval Europe, by P. Boissonade, book 1.
chapter, i, ii.
६२ पुस्तक प्रवेश
का संहार किया, लोगों को गुलाम बना लिया, नगरों को जला
डाला, और ईसाई जरमनी, लो-कन्ट्रीज़ (हॉलेण्ड और बेल्जियम)
पच्छिमी फ़्रांस, स्कॉटलैण्ड, आयरलैण्ड और इङ्गलिस्तान को लूट
लिया या बरबाद कर दिया। पूरबी यूरोप में हूण और अवार
जातियों के भाई-बन्द मगियार जाति ने डेन्यूब के मैदानों में, और
मध्य यूरोप, उत्तर इतालिया और पूरबी फ़्रान्स में बरबादी फैला
दी। दक्खिन यूरोप में बर्बर और अरब जाति के लुटेरों, सैरेसेन
लोगों ने इतालिया के समुद्रतट और पास के टापुओं में, प्रावेन्स
में और डोफ़्राइन (दक्खिन पूरबी फ़्रांस) में लूट मार जारी
रक्खी।"*
इन तमाम क़रीब एक हज़ार साल के हमलों के नतीजों को बयान
करते हुए बुइसोनेद् अन्त में लिखता है—
“असभ्य जातियों के हमलों ने एक सच्ची आफ़त बरपा कर दी।
दो सौ साल के अन्दर ही ईसाई रोमन साम्राज्य का वह व्यवस्थित
भवन, जिसकी छाया के नीचे मज़दूरों और कारीगरों ने
उन्नति की थी और वे मालामाल हो गए थे, पच्छिमी यूरोप में
नींव से लेकर शिखर तक उलट गया और पूरबी यूरोप में भी
उसकी बुनियादें बेहद खोखली हो गईं। हर तरफ़ खण्डहर
दिखाई देते थे, व्यवस्था की जगह अव्यवस्था और अराजकता का
राज था, और क़ानून की जगह जिसकी लाठी उसकी भैंस का
- Life and Work in Medieval Europe, by P. Boissonade, book i,
chapter x, p. 115.
इस्लाम और भारत ६३
दौर था, प्रत्येक रूप में धन की उत्पत्ति रुक गई थी, जो ख़ज़ाने
पिछली नस्लों ने जमा कर रक्खे थे वे तितर बितर हो गए थे
और आर्थिक और सामाजिक उन्नति बन्द हो गई थी।”*
हमने यूरोपियन लेखकों ही के शब्दों में यूरोप के विविध देशों के ऊपर
एशियाई जातियों के इन हमलों के नतीजों को थोड़े से में बयान कर दिया
है। इस बयान को पढ़कर आसानी से देखा जा सकता है कि भारत या
यूरोप दोनों में से किसकी सरहदें अधिक कमज़ोर रही हैं, या दोनों में से
किसने बाहर के हमलों से अधिक सफलता के साथ अपनी सरहद की रक्षा
की है। इसके बाद भारत और यूरोप दोनों के ऊपर मुसलमानों के हमलों
को बयान करना बाक़ी है।
इस्लाम और भारत
भारत पर मुसलमानों के हमले
अब हम भारत के ऊपर मुसलमानों के हमलों की ओर आते हैं।
हमसे कहा जाता है कि भारत के ऊपर मुसलमानों का हमला अन्तिम
और सबसे अधिक नाशकर हमला था, जिसने देश के सामाजिक, धार्मिक,
नैतिक, आर्थिक और राजनैतिक जीवन का अनन्त काल के लिए नाश कर
दिया और सारे देश को दो अलग अलग एक दूसरे के विरुद्ध दलों में बाँट
- Life and Work in Medieval Europe, by P. Boissonade, conclusion,
p. 233.
६४ पुस्तक प्रवेश
दिया। इस देश के ऊपर मुसलमानों के हमले को देश की घोरतम आपत्ति
बताया जाता है, मुसलमानों की इस देश पर हुकूमत को देशवासियों की
निर्बलता का सबूत बताया जाता है, और इसी आधार पर यह साबित
करने की कोशिश की जाती है कि अंगरेज़ों ने इस देश में आकर उस
घोरतम आपत्ति के बुरे नतीजों से भारतवासियों की रक्षा की।
निस्सन्देह कोई भी विदेशी हमला किसी भी देश के लिए बड़ाई की
बात नहीं मानी जा सकती। फिर भी जिस तरह इससे पहले के हमलों की
बाबत में, उसी तरह इस हमले की बाबत हमें यह देखना होगा कि
मुसलमानों का दूसरे देशों पर हमला भारत ही की एक विशेषता थी या
संसार के अन्य देशों को भी इस हमले का सामना करना पड़ा। हमें यह
भी देखना होगा कि मुसलमानों का हमला पहले भारत पर हुआ या पहले
किसी दूसरे देश पर, दूसरे देशों के मुक़ाबले में भारत ने इस हमले का
कहाँ तक सफलता के साथ सामना किया, और मुसलमानों के हमले के
आख़िरी नतीजे भारत के लिए कहाँ तक हितकर रहे या अहितकर।
मोहम्मद साहब
मोहम्मद साहब का जन्म सन् ५६६ ईस्वी में हुआ था। सन् ६०६
ईस्वी में उन्होंने अपने नए मज़हब का प्रचार शुरू किया, जिसका मुख्य
रूप था—अरब के सैकड़ों क़बीलों और घरानों के अलग अलग हज़ारों
देवी देवताओं और उनकी मूर्तियों का अन्त कर उनकी जगह मनुष्य मात्र
के लिए एक निराकार अल्लाह की पूजा सिखाना, अलग अलग क़बीलों को
तोड़ कर अरब निवासियों को एक संयुक्त क़ौम बनाना, अरबों की असंख्य
धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों और हानिकर रूढ़ियों को तोड़ कर उनके
इस्लाम और भारत ६५
सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को पवित्र और उच्च करना, और इन सब से
बढ़ कर मनुष्य मात्र की समता और भ्रातृत्व का उपदेश देना । इसलाम के
गौण, विवादास्पद, या अहितकर पहलू से इस स्थान पर हमें कोई सम्बन्ध
नहीं है । वास्तव में मोहम्मद साहब के उपदेश धार्मिक, सामाजिक और
राजनैतिक तीनों क्षेत्रों में एक सा प्रभाव रखते थे । इन उपदेशों ने अरबों
के अन्दर एक नई रूह फूँक दी । वे धार्मिक और राजनैतिक दिग्विजय के
लिए अपने देश से निकल पड़े और मोहम्मद साहब की मृत्यु के क़रीब सौ
साल के अन्दर ही उन्होंने सभ्य संसार के एक बहुत बड़े हिस्से पर अपना
प्रभुत्व क़ायम कर लिया ।
मुसलमानों की हुकूमत
सन् ६२९ ईसवी में मक्का नगर ने मोहम्मद साहब की अधीनता
स्वीकार की । सन् ६२९ से ६३१ तक दो साल के अन्दर तमाम अरब मोह-
म्मद साहब के अधीन हो गया । ६३२ में मोहम्मद साहब की मृत्यु हुई ।
सन् ६३६ में इराक़ (मैसोपोटेमिया) और शाम (सीरिया) पर अरबों ने
विजय प्राप्त की । सन् ६३७ में उन्होंने बैतुलमुक़द्दस (जेरूसेलम) पर क़ब्ज़ा
किया । सन् ६३७ से ६४१ तक समस्त ईरान अरबों के शासन में आ गया ।
सन् ७०१ से ७१५ तक मुसलमानों ने पूरब में चीन की सरहद तक धावा
किया और समस्त तातार और तुर्किस्तान को अपने साम्राज्य में मिला लिया ।
इसके साथ ही साथ इस साहसी जाति की नज़र पच्छिम की ओर
गई । सन् ६३८ से ६४१ तक समस्त मिस्र ( इजिप्ट ) अरबों के शासन में
आ गया । ६४७ से ७०६ तक कारथेज और शेष समस्त उत्तर अफ़रीका
पर अरबों का साम्राज्य क़ायम हो गया । यूरोप का विशाल रोमन साम्राज्य
५
६६ पुस्तक प्रवेश
भी इन लोगों के हमलों से न बच सका । यहाँ तक कि सन् ७०० ईसवी
से ७१३ ईसवी तक स्पेन अरबों की हुकूमत में आ गया ।
यह सब इसलाम की पहली सदी की विजयों का इतिहास है । किन्तु
इसके बाद भी अरबों और दूसरी मुसलमान क़ौमों की फ़तूहात जारी रहीं ।
धीरे धीरे समस्त रूस, यूनान, बलकान, पोलैण्ड, दखिन इतालिया,
सिसली इत्यादि, आधे यूरोप पर मुसलमानों की हुकूमत क़ायम होगई
और कई सौ साल तक रही ।
सन् ६३६ ई० की एक घटना
भारत में सब से पहले सन् ६३६ ईसवी में ख़लीफ़ा उमर के ज़माने
में आजकल के बम्बई टापू के पास ताना नामक स्थान पर पहली बार
मुसलमानों की कुछ जल सेना दिखाई दी । यह सेना बहरायन ( इराक़ )
के मुसलमान गवरनर सक़ैफ़ी की आज्ञा से भेजी गई थी । ख़लीफ़ा उमर
की इसमें इजाज़त न ली गई थी । लिखा है कि जब ख़लीफ़ा उमर को
इस बात का पता लगा, वह बहरायन के गवरनर पर नाराज़ हुआ । जल-
सेना बिना किसी तरह की भी लड़ाई इत्यादि के वापस बुला ली गई, और
ख़लीफ़ा ने यह हुकुम दे दिया कि यदि फिर हिन्दोस्तान पर चढ़ाई की
जायगी तो चढ़ाई करने वालों को कड़ी सज़ाएँ दी जायँगी ।
इस छोटी सी घटना से मालूम होता है कि उस समय के अरब
मुसलमानों और भारतवासियों के बीच किस तरह के प्रेम और परस्पर
आदर का सम्बन्ध क़ायम था । हम अरबों और भारतवासियों के इस शुरू
के सम्बन्ध को आगे चल कर और अधिक विस्तार के साथ बयान करेंगे ।
किन्तु इससे पहले यहाँ पर हम इस देश के ऊपर मुसलमानों के पहले
इस्लाम और भारत ६७
बाज़ाब्ता हमने, उसके कारणों और उसके नतीजों को बयान कर देना
चाहते हैं ।
भारत पर पहला हमला
ईसा की आठवीं सदी के शुरू में कुछ अरब सौदागरों की सिंहलद्वीप
( लंका ) में मृत्यु हुई । ये अरब सौदागर इराक़ के रहने वाले थे । सिंहल-
द्वीप के राजा ने इन अरबों की कुछ अनाथ लड़कियों को एक जहाज़ में बैठा
कर इराक़ के मुसलमान गवर्नर हज्जाज के पास भेजा । मार्ग में कच्छ के
कुछ डाकुओं ने, जिन्हें बावरिज कहते थे, जहाज़ पर हमला करके अरब
लड़कियों को छीन लिया । हज्जाज ने काठियावाड़ के हिन्दू राजा दाहिर से
लड़कियाँ तलब कीं । दाहिर हजाज की माँग पूरी न कर सका । इस पर
हजाज ने बलूचिस्तान के रास्ते ख़ुश्की से मोहम्मद बिन क़ासिम के नेतृत्व
में एक सेना सन् ७१२ ईसवी के क़रीब भारत पर हमला करने के लिए
भेजी ।* यही भारत के ऊपर मुसलमानों का सब से पहला हमला था ।
भारत की राजनैतिक हालत उस समय कुछ निर्बल थी जिसका अधिक हाल
हम आगे चल कर देंगे । मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिन्ध और मुलतान को
विजय करके उन पर अपनी हुकूमत क़ायम कर ली ।
सिन्ध पर मुस्लिम हुकूमत
इस हमले के सम्बन्ध में हमें चार बातें ध्यान में रखनी चाहिएँ :—
( १ ) यह कि भारत पर मुसलमानों का पहला हमला उस समय
हुआ जब कि पूरब में तातार तक और पश्चिम में स्पेन तक मुसलमानों की
हुकूमत क़ायम हो चुकी थी ।
- Elliot's History of India, vol. i, p. 118.
६८ पुस्तक प्रवेश
(२) यह कि इतिहास लेखक विल्क्स के अनुसार इराक़ का गवर्नर
हज्जाज अपने देश में तेज़ मिज़ाज मशहूर था और इराक़ के अनेक
मुसलमानों ने उसकी सख्तियों से भाग कर भारत के दक्खिन में कोकण
और रासकुमारी आदि स्थानों में आश्रय लिया था।
(३) यह कि इतिहास से पता चलता है कि मोहम्मद बिन क़ासिम
सिन्ध के अन्दर अपनी हिन्दू और मुसलमान प्रजा के साथ एक समान
निष्पक्ष व्यवहार करता था।
सिन्ध विजय के बाद उसने हज्जाज से लिख कर पूछा कि यहाँ के
लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जावे। हज्जाज ने उत्तर दिया—
“जब कि उन लोगों ने आत्मसमर्पण कर दिया है और ख़लीफ़ा
को टैक्स देना मंज़ूर कर लिया है तो उनसे और कुछ भी चाहना जायज़
नहीं है। हमने उन्हें अपनी हिफ़ाज़त में ले लिया है, और हम किसी तरह
भी उनके जान या माल पर हाथ नहीं उठा सकते। उन्हें अपने देवताओं
की पूजा करने की इजाज़त दी जाती है। हरगिज़ किसी शख़्स को भी न
अपने धर्म का पालन करने से मना करना चाहिये और न रोकना चाहिये।
अपने घरों में वे जिस तरह चाहें रहें।”*
डॉक्टर बेनीप्रसाद ने अपनी पुस्तक 'जहांगीर के इतिहास' में लिखा
है कि—“८ वीं सदी में मोहम्मद बिन क़ासिम की सिन्ध पर हुकूमत नरमी
और धार्मिक उदारता की एक जीती जागती मिसाल थी।”†
- "The History of Medieval India." by Ishwari Prasad, p. 52, 53.
† "Mohammad Bin Qasim's administration of Sindh in the 8th century
was a shining example of moderation and tolerance "--History of Jehangir,
by Dr. Beniprasad, p. 89.
इस्लाम और भारत ६६
( ४ ) हमें यह याद रखना चाहिए कि इसके बाद महमूद ग़ज़नवी के
समय तक यानी तीन सौ साल तक फिर न कोई और हमला मुसलमानों
का भारत पर हुआ और न सिन्ध या मुलतान से आगे उनका राज बढ़ा ।
प्राचीन अरब और भारत का सम्बन्ध
अब हम उस समय के अरबों और भारतवासियों के परस्पर सम्बन्ध
को थोड़े विस्तार के साथ बयान कर देना चाहते हैं । अरबों और भारत-
वासियों का सम्बन्ध अरबों के मुसलमान होने से बहुत पहले से यानी
हज़रत मोहम्मद के जन्म से कम से कम पाँच सौ साल पहले से चला
आता था । हज़रत ईसा के जन्म के समय से ही सैकड़ों बल्कि हज़ारों
अरब सौदागर भारत के पश्चिमी और पूर्वी बन्दरगाहों पर आकर उतरते
थे। ख़ासकर पच्छिम में चाल, कल्याण, सुपारा, और मलबार तट पर
अरबों की अनेक बड़ी बड़ी बस्तियों का उस समय के इतिहास में ज़िक्र
आता है । हज़रत ईसा के जन्म से पहले ही लंका और दक्खिन भारत में अरबों
और ईरानियों की अनेक बस्तियाँ मौजूद थीं । ईरान, अरब, अफ़रीका और
यूरोप के विविध देशों के साथ भारत का उस समय जितना व्यापार था,
अधिकतर अरब और ईरानी सौदागरों ही के हाथों में था । रोमन इतिहास
लेखक लिखते हैं कि रोम और यूनान के जो जहाज़ उन दिनों भारत आते
जाते थे उनके भी नाविक अधिकतर अरब ही होते थे । भारत और चीन के
बीच की तिजारत का भी एक ख़ासा हिस्सा अरबों ही के हाथों में था,
जिसके सबब भारत के पूर्वी तट से भी ये लोग पूरी तरह परिचित थे, और
वहाँ भी स्थान स्थान पर इनकी अनेक बस्तियाँ आबाद थीं ।
उस समय के अरबों का मज़हब एक प्राचीन ढङ्ग का सीधा सा मज़हब
७० पुस्तक प्रवेश
था । वे अपने अलग अलग क़बीलों के अनेक देवी देवताओं को मानते थे
और उनकी मूर्तियों की पूजा करते थे । उस समय के अनेक यात्रा वृत्तान्तों
से साबित है कि ये अरब अत्यन्त सरल स्वभाव और उदार चित्त होते थे,
भारतवासियों से उनका मेल जोल और प्रेम ख़ूब बढ़ा हुआ था और
भारत में उनकी बस्तियाँ ख़ूब ख़ुशहाल थीं ।
इसके बाद मोहम्मद साहब के जन्म और इसलाम के प्रचार का समय
आया । अरबों और ख़ासकर अरब व्यापारियों का भारत आना जाना पहले
की तरह जारी रहा । फ़रक़ केवल यह हो गया कि पुराने मूर्तिपूजक अरबों
की जगह अब निराकार के उपासक नए मुसलमान अरब भारत आने लगे ।
या वही अरब अब मुसलमान हो गए, उनके साथ साथ अब एक नए
मज़हब और इसलाम के नए विचारों और नए आदर्शों ने भी भारत में
प्रवेश किया । हमें याद रखना चाहिए कि अरब मुसलमानों और उनके साथ
इसलाम के इस तरह भारत में प्रवेश करने का किसी सैन्य यात्रा या फ़ौजी
हमले से कोई सम्बन्ध न था ।
आठवीं सदी का भारत
इस स्थान पर आगे बढ़ने से पहले उस समय के भारत की हालत को
संक्षेप में बयान कर देना भी आवश्यक है । ईसा की सातवीं सदी के मध्य
में सम्राट हर्षवर्धन की सत्ता का अन्त हुआ । उत्तर भारत टुकड़े टुकड़े होकर
अनेक छोटी छोटी रियासतों में बँट गया । राजपूतों ने पश्चिम से चल कर
उत्तर पूरब में और मध्य भारत में अनेक छोटी छोटी रियासतें क़ायम कर
लीं । अनेक नई जातियाँ अपने को राजपूत कहने लगीं । यहाँ तक कि
मुसलमानों के आने से ठीक पहले पञ्जाब से दक्खिन तक और बङ्गाल से
इस्लाम और भारत ७१
अरब सागर तक क़रीब क़रीब सारा देश राजपूतों के शासन में आगया ।
कोई प्रधान केन्द्रीय शक्ति इन सब छोटी बड़ी रियासतों को वश में रखने
वाली न थी, और आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना अपना
राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे । यानी एक प्रधान
और प्रबल भारतीय साम्राज्य की जगह एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी और एक
दूसरे से स्वतन्त्र अनेक छोटे बड़े राजा भारत पर शासन करते थे, और
राजनैतिक या राष्ट्रीय एकता केवल स्वप्नमात्र थी। पुराने साम्राज्यों के केन्द्र
मगध, पाटलीपुत्र, गया इत्यादि खण्डहर दिखाई दे रहे थे। वैशाली,
कुशीनगर, केड़िया, रामग्राम, कपिलवस्तु और श्रावस्ती, जिनके नाम बौद्ध
इतिहास में मशहूर हो चुके थे, अब बरबाद दिखाई देते थे और देश के
राजनैतिक और आर्थिक जीवन के दूसरे केन्द्रों ने उनकी जगह ले ली थी ।
धर्म के क्षेत्र में भी भारत का वह समय एक बहुत बड़े परिवर्तन और
अवनति का समय था । बुद्ध की मृत्यु से ढाई सौ साल के अन्दर, यानी
हज़रत ईसा के जन्म से क़रीब ढाई सौ साल पहले, उस समय के बिगड़े
हुए हिन्दू धर्म को भारत से निकाल कर बौद्ध धर्म उसका स्थान ले चुका
था । किन्तु जिन ब्राह्मण पुरोहितों और उच्च जातियों के विशेषाधिकारों पर
बौद्ध धर्म ने हमला किया था उनकी ओर से विद्रोह की आग बराबर
सुलगती रही । धीरे धीरे प्रतिमापूजा ने और अन्य प्राचीन हिन्दू कर्मकाण्ड
ने बौद्ध धर्म में भी प्रवेश करना शुरू किया। उत्तर भारत में महायान
सम्प्रदाय की नींव रक्खी गई, जिसमें बुद्ध भगवान के अलावा अनेक
बोधिसत्वों की और ख़ासकर 'अमिताभ' की पूजा होने लगी। बौद्ध मन्दिरों
का समस्त कर्मकाण्ड हिन्दू मन्दिरों के ढङ्ग पर ढल गया । शुरू के बौद्ध मत
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ने जो स्थान संस्कृत से छीन कर देश की भाषा प्राकृत या पाली को दिया
था, वह अब महायान सम्प्रदाय में फिर से संस्कृत को प्रदान किया गया ।
ज्ञान मार्ग की जगह बहुत दरजे तक कर्मकाण्ड और भक्ति ने ले ली ।
धीरे धीरे आजकल के वैष्णव मत, शैवमत और तान्त्रिक सम्प्रदाय ने
मिलकर बौद्ध मत को भारत से निकाल बाहर कर दिया और प्राचीन हिन्दू
धर्म को फिर से उसका स्थान प्रदान कर दिया । निस्सन्देह उच्च श्रेणी के
थोड़े से लोगों के लिए उपनिषद और दर्शनशास्त्र के सूक्ष्म उपदेश उस
समय भी मौजूद थे, किन्तु सर्वसाधारण के लिए धर्म का पथ खासा
अन्धकारमय और गन्दा हो चला था । जिस जातिभेद को बौद्ध धर्म ने नष्ट
कर स्त्रियों और शूद्रों को मनुष्यत्व के अधिकार प्रदान करना चाहा था, वह
जातिभेद फिर अपने पूरे ज़ोर के साथ क़ायम हो चुका था । ब्राह्मणों की
श्रेष्ठता और अन्य वर्णों, ख़ासकर शूद्रों की हीनता ने फिर से भारतीय
समाज को जकड़ कर उसके विकास को असम्भव कर दिया था । पण्डों और
पुरोहितों के विशेषाधिकार फिर से क़ायम हो गए थे । और अधिकांश आम
जनता के लिए सिवाय जात पाँत और ऊँच नीच के नियमों का पालन
करने, असंख्य देवी देवताओं, भयङ्कर 'रुद्र' और प्रचण्ड 'शक्ति' की मूर्तियों
को पूजने, जप, तप, यज्ञ, हवन, पूजा, पाठ, ब्राह्मणों को दान, तीर्थयात्रा,
मन्तर, जन्तर और जटिल कर्मकाण्ड के और कोई धर्म न रह गया था । ज्ञान
का सन्तोष केवल ऊपर के इने गिने लोगों के लिए था । शेष जन समुदाय
के लिए कर्मकाण्ड और अन्धविश्वास । उस समय के भारतीय साहित्य,
चीनी और अरब यात्रियों के वृत्तान्तों, सिक्कों और शिलालेखों, सबसे इसी
शोचनीय हालत का पता चलता है ।
इस्लाम और भारत ७३
चीनी यात्री फ़ाहियान के समय यानी पाँचवीं सदी में उत्तर पश्चिमी
भारत के अन्दर काबुल से मथुरा तक बौद्धमत की हीनयान सम्प्रदाय
का प्रचार अभी बाक़ी था, किन्तु शेष भारत से बौद्धधर्म मिटता जा
रहा था। दो सौ साल बाद जब प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्यूनत्साँग
भारत पहुँचा तो उसने देखा कि उत्तर में हीनयान की जगह महायान
ने ले ली थी। ह्यूनत्साँग के बयान से मालूम होता है कि ख़ासकर
शिव की पूजा उस समय समस्त भारत में ज़ोरों के साथ फैलती जा रही
थी। अयोध्या के पास उसे इस तरह के मनुष्य मिले जो हर साल दुर्गा
की मूर्ति के सामने मनुष्य की बलि चढ़ाया करते थे। बंगाल के शैव राजा
सशङ्क ने अनेक बौद्ध मन्दिरों को तोड़ कर उनमें बुद्ध की मूर्तियों की जगह
शिव की मूर्ति क़ायम करना और बौद्ध धर्म के मानने वालों को तकलीफ़ें
दे देकर अपने राज से निकालना शुरू कर दिया था। अन्य स्थानो पर नर
मुण्डों की मालाएँ पहिने कापालिकों से ह्यूनत्साँग की भेंट हुई, इत्यादि ।
ह्यूनत्साँग लिखता है कि अफ़गानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया तक उस
समय बौद्ध मत के माननेवाले और शैव मत के मानने वाले दोनों पाए जाते
थे। इसके बाद के अरब यात्रियों, मोहम्मद इब्न इसहाक़ अन्नदीम,
अल्शहरस्तानी इत्यादि की पुस्तकों से भी इन्हीं बातों का समर्थन
होता है और पता चलता है कि मुसलमानों के आने के समय तक
भारत से बौद्धमत क़रीब क़रीब लोप हो चुका था और शैवमत इत्यादि
ने उसकी जगह ले ली थी। अलबेरूनी लिखता है कि शैव और वैष्णव
सम्प्रदायों के अलावा, शक्ति, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, स्कन्ध, गणेश
यम और कुबेर की मूर्तियों की पूजा भी भारत में शुरू हो गई थी और इन
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सब की अलग अलग सम्प्रदाएँ थीं। बौद्ध और जैन मतों ने मांस और
मदिरा का उपयोग एक बार बिलकुल बन्द कर दिया था, किन्तु कापालिकों
और शाक्तों दोनों के ज़रिये इन दोनों चीज़ों का उपयोग स्थान स्थान पर
फिर से धर्म का एक अङ्ग बन गया था। सारांश यह कि राजनैतिक, धार्मिक
और सामाजिक, तीनों दृष्टि से भारत उस समय अन्धकार और अराजकता
की हालत में था,—असंख्य छोटी बड़ी रियासतें, एक दूसरे की दुश्मन,
सैकड़ो मत मतान्तर, और अगणित सदाचार-विरुद्ध कुरीतियाँ और अन्ध
विश्वास !
भारत में इसलाम धर्म
ठीक उस समय, जब कि देश की यह हालत थी, इसलाम का भारत
में पदार्पण हुआ। हम लिख चुके हैं कि इसलाम के जन्म से पहले अरबों
की इस देश में ख़ासकर दक्खिन भारत में अनेक बस्तियाँ थीं। उस समय
के समस्त इतिहास से यह भी साबित है कि अरबों और भारतवासियों में
बड़ा प्रेम था, और अरब सौदागर इस देश के अन्दर आदर की दृष्टि से देखे
जाते थे। मुसलमानों के सैनिक हमले से बहुत पहले, ईसा की सातवीं सदी
से ही अरब सौदागरों के साथ साथ नए इसलाम धर्म ने भी दक्खिन की
ओर से भारत के अन्दर प्रवेश किया। इतिहास से पता चलता है कि इस
नए धर्म का भी भारतवासियों ने उसी प्रेम के साथ स्वागत किया, जिस
प्रेम के साथ वे सैकड़ों साल पहले से अरब सौदागरों का स्वागत करते रहे
थे। एक बार भारतवर्ष की सीमाओं के अन्दर प्रवेश करते ही इसलाम भी
भारत की असंख्य सम्प्रदायों में से एक गिना जाने लगा। इतिहास लेखक
रॉलैण्डसन लिखता है कि सातवीं सदी के अन्त में मुसलमान अरब