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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

सर जॉन शोर ४१७
थे । अनेक बार पार्लिमेण्ट में इन क़र्ज़ों के विषय में पूछ ताछ की
गई । किन्तु इंगलिस्तान के मन्त्री बराबर टालमटोल और तरह तरह
की चालाकियों से काम लेते रहे। मिसाल के लिए नवाब को
क़र्ज़ देने वालों में एक अंगरेज़ पाल बेन्फ़ील्ड भी था। किन्तु
क़र्ज़ख़ाहों की जो सूचियाँ समय समय पर पार्लिमेण्ट के सामने
पेश की जाती थीं उनमें बेन्फ़ील्ड का नाम कभी उड़ा दिया जाता
था और कभी फिर जोड़ दिया जाता था। बात यह थी कि
बेन्फ़ील्ड और उसके अनेक साथियों ने पार्लिमेण्ट के चुनाव के
समय मन्त्रिमण्डल का पक्ष लेने वाले सदस्यों को चुनवा कर भेजने
में खूब धन ख़र्च किया था और मन्त्रियों के मुंह बन्द कर दिए
थे ।* पार्लिमेण्ट के अन्दर भी क़ुदरती तौर पर उस समय के
मन्त्रियों ही का प्रभाव था।
इसी सम्बन्ध में इतिहास लेखक विलियम हाविट लिखता है—
“जिस ढङ्ग से यातनाएँ दे देकर भारतीय नरेशों की रियासतें उनसे
ज़बरदस्ती छीनी गई हैं वह यह है कि चालबाज़ लोगों ने पहले तो बड़ी
होशियारी के साथ उन नरेशों को अपना क़र्ज़दार बनाया और फिर उन्हें अपनी
अत्यन्त बेजा माँगों के सामने तुरन्त सर झुकाने के लिए विवश कर दिया।”†
१३ अक्तूबर सन् १७६५ को ७६ साल की आयु में नवाब

  • Thornton in his History of British India, 2nd Edition 1859, pp. 181,

† “What then is this system of torture by which the possessions of the
Indian Princes have been wrung from them? It is this—the skilful applica-
tion of the process by which cunning men creat debtors, and then force
२७

४१८ भारत में अंगरेज़ी राज
मोहम्मदअली की मृत्यु हुई । उसका बेटा नवाब उमदतुल उमरा
करनाटक की मसनद पर बैठा और बाप के झूठे और अनसुने कर्ज़े
उसे उत्तराधिकार में मिले।
लॉर्ड कॉर्नवालिस के समय में कम्पनी और मोहम्मदअली के
दरमियान एक सन्धि हो चुकी थी, जिससे करनाटक की सेना का
सारा प्रबन्ध अंगरेज़ों के हाथों में आ गया था और करनाटक के
कुछ ज़िले इन कर्ज़ों के बदले में नवाब से रहन रखा लिए गए थे।
उमदतुल उमरा के मसनद पर बैठते ही मद्रास के गवर्नर ने उस
पर ज़ोर दिया कि आप रहन रक्खे हुए ज़िले और कुछ और क़िले
सदा के लिए कम्पनी को दे दें । २८ अक्तूबर सन् १७९५ को सर
जॉन शोर ने मद्रास के गवर्नर को लिखा—"आप नए नवाब को
इस बात पर राज़ी कीजिये कि वह अपनी तमाम रियासत कम्पनी
के सुपुर्द कर दे।" नवाब उमदतुल उमरा ने मद्रास के गवर्नर की
कोई बात मंजूर न की और कम से कम उस समय इस चाल से
करनाटक का कोई हिस्सा कम्पनी की अमलदारी में न आ सका।
किन्तु करनाटक की ओर अंगरेज़ों की नीयत बिल्कुल ज़ाहिर
हो गई।
सन् १७९४ में रुहेलखण्ड के नवाब फ़ैजुल्ला ख़ाँ की मृत्यु हुई ।
रुहेलखण्ड उसका छोटा बेटा गुलाम मोहम्मद अपने बड़े भाई
आली ख़ाँ को मार कर बाप की गद्दी पर बैठा ।
them at once to submit to their most exorbitant demands."-William How
as quoted in the introduction to Thornton's History of British India.

सर जॉन शोर ४१६
समाचार पाते ही सर जॉन शोर ने इरादा किया कि—"फ़ैज़ुल्ला खाँ
के ख़ानदान से रियासत बिल्कुल छीन ली जावे।"* सर रॉबर्ट
एबरक्रौम्बी अवध की सेना सहित आगे बढ़ा। बिटोवरा में लड़ाई
हुई। मिल लिखता है कि पहले रुहेलों का पल्ला कुछ भारी रहा, किन्तु
बाद में अंगरेज़ों की जीत हुई। अन्त में फ़ैजुल्ला ख़ाँ के ख़ानदान से
रियासत छीन ली गई। उसका तमाम ख़ज़ाना अवध के नवाब
वज़ीर को दे दिया गया और रियासत ज़ब्त कर ली गई। १० लाख
रुपए सालाना की जागीर रुहेलखण्ड के एक पिछले नवाब मोहम्मद
अली के बेटे अहमदअली को दे दी गई। रुहेलखण्ड के राज में
अंगरेज़ों की पैदा की हुई यह दूसरी बग़ावत थी।
अब केवल अवध के साथ सर जॉन शोर के व्यवहार को बयान
सर जॉन शोर करना बाक़ी है। सर जॉन शोर ने अपने एक
और अवध पत्र में साफ़ लिखा है कि—"अवध के साथ
हमारी जो सन्धियाँ हुई हैं उनकी हमें ख़ाक
परवा नहीं करनी चाहिए।" लार्ड कॉर्नवालिस ने सन् १७८८ में
अवध के नवाब के साथ यह सन्धि की थी कि कम्पनी की
सब्सिडियरी सेना का ख़र्च जो नवाब को देना पड़ता था, पचास
लाख सालाना से कभी बढ़ाया न जायगा। सर जॉन शोर ने
आकर बेखटके और बेवजह इस सन्धि को तोड़ डाला, गोकि
लिखा है कि नवाब हर साल ठीक समय पर रक़म अदा कर देता
था और अवध की प्रजा की हालत फिर कुछ सुधरती जा रही थी।

  • Mill, vol. vi, pp. 33, 34,

४२० भारत में अंग्रेज़ी राज
सर जॉन शोर ने नवाब पर ज़ोर दिया कि आप साढ़े पाँच लाख
सालाना के ख़र्च पर एक पलटन अंगरेज़ सवारों की और एक
हिन्दोस्तानी सवारों की अपने यहाँ और रक्खें। इस सेना का
असली मतलब यह था कि कम्पनी को उत्तरीय भारत में अपना
साम्राज्य बढ़ाने और स्वयं अवध को धीरे धीरे अपने अधीन करने के
लिए दूसरे के ख़र्च पर एक ज़बरदस्त सेना सदा तैयार मिल सके।
नवाब आसफ़ुद्दौला ने इस बार हिम्मत करके इनकार कर दिया
और गवर्नर जनरल को लॉर्ड कॉर्नवालिस के वादे की याद
दिलाई। सर जॉन शोर ने, ज़बरदस्ती आसफ़ुद्दौला के वज़ीर
महाराजा झाऊँलाल को पकड़ कर अपने यहाँ क़ैद कर लिया।
आसफ़ुद्दौला ने इस अत्याचार पर बहुतेरे एतराज किए, किन्तु
कम्पनी के अफ़सरों ने एक न सुनी। इसके बाद मार्च सन् १७६७
में सर जॉन शोर स्वयं लखनऊ पहुँचा और जिस तरह हो सका
उसने आसफुद्दौला को कम्पनी की माँग पूरी करने पर मजबूर
किया। साढ़े पाँच लाख सालाना की नई फ़ौज आसफुद्दौला के सर
मढ़ दी गई। असहाय आसफुद्दौला को इस व्यवहार का इतना
सदमा हुआ कि वह उसी समय से बीमार पड़ गया, उसने दवा
खाने तक से इनकार कर दिया और चन्द महीने के अन्दर मर
गया। आसफुद्दौला की मृत्यु ने अंगरेज़ों को एक और सुन्दर
अवसर प्रदान कर दिया।
आसफुद्दौला का बेटा वज़ीरअली अवध की मसनद पर बैठा।
सर जॉन शोर ने बाज़ाब्ता उसे नवाब स्वीकार कर लिया।

सर जॉन शोर ४२१
थोड़े ही दिनों के बाद सर जॉन शोर को पता चला (?) कि
अवध की मसनद आसफ़ुद्दौला का एक भाई सआदतअली, जो
का नीलाम उस समय बनारस में रहता था, उसके बेटे
वज़ीरअली की निस्बत अवध की गद्दी का ज़्यादा
हक़दार है। मेजर बर्ड, जो कुछ दिनों बाद लखनऊ में असिस्टेण्ट
रेज़िडेण्ट था, लिखता है—
“सर जॉन शोर यह देख कर कि पिछले वज़ीर के एक भाई के साथ
ज़्यादा अच्छा सौदा किया जा सकता है, बनारस पहुँचा। वहाँ पहुँच कर
उसने सआदतअली के सामने यह तजवीज़ पेश की कि कम्पनी की मदद से
आप वज़ीरअली को गद्दी से उतार दीजिये, इस साफ़ शर्त पर कि आप साढ़े
पचपन लाख सालाना की रक़म को खूब बढ़ा दें और उसके अलावा
कम्पनी की सहायता के बदले में हमें और धन व सम्पत्ति दें। इस साफ़
और निर्लज्ज शर्त पर नवाबी का इच्छुक ख़ुशी से राज़ी हो गया। लखनऊ
पहुँच कर × × × वज़ीरअली को उतार दिया गया और २१ जनवरी सन्
१७९८ को उसकी जगह सआदतअली के नवाब बनाए जाने का एलान कर
दिया गया।”*

  • "Seeing that a better bargain could be made with a brother of the
    deceased Wazir, Sir John Shore repaired to Benares, and proposed to the
    latter, who was named Saadat Ali, to dethrone Wazir Ali, offering the
    support of the Company on the intelligible condition that the subsidy should
    be largely increased, and that their support should be paid for otherwise in
    money and kind. To this sitpulation, bold and bare-faced the aspirant to
    the Princedom 'cheerfully consented,' and, after a preliminary process at
    Lucknow, termed in the 'Parliamentary Return of Treaties' 'a full investi-
    gation,' and purporting to be an enquiry into the spuriousness of Wazir

४२२ भारत में अंग्रेज़ी राज
लखनऊ पहुँच कर बाज़ाब्ता तहक़ीक़ात (?) करके वजह यह
बताई गई कि वज़ीरअली की पैदाइश नाजायज़ है (!) ।
२१ फ़रवरी सन् १७६८ को १७ शर्तों की एक सन्धि सआदत
अली और सर जॉन शोर के बीच लिखी गई। मुख्य शर्तें ये थीं:—
“x x x सआदतअली कम्पनी की बक़ाया अदा करे, इलाहाबाद का
क़िला कम्पनी को दे दे और उसकी मरम्मत के लिए आठ लाख रुपए दे,
फ़तहगढ़ के क़िले की मरम्मत के लिए तीन लाख रुपए दे, फ़ौजों के इधर
से उधर आने जाने का ख़र्च दे—कितने लाख, यह बाद में तय किया जावेगा
सआदतअली को नवाब वज़ीर बनाने में कम्पनी का जो ख़र्च हुआ है उसके
लिए वह कम्पनी को बारह लाख रुपए दे, पदच्युत वज़ीरअली को डेढ़ लाख
रुपए की पेन्शन दे, x x x और सबसीडीयरी सेना के ख़र्च के लिए ५६
लाख सालाना की रक़म को बढ़ा कर ७६ लाख कर दिया जावे।”*
मेजर बर्ड लिखता है कि इस तरह “कुल मिला कर दस लाख
पाउण्ड (१ करोड़ रुपए से ऊपर) और इलाहाबाद का क़िला एक
साल के अन्दर कम्पनी को मिल गया।”*
एक शर्त यह भी थी कि सिवाय कम्पनी के आदमियों के और
कोई यूरोपियन आइन्दा अवध के राज में रहने न पावे।
इस समस्त सन्धि में शुरू से आख़ीर तक केवल 'रुपयों' और


Ali's birth, that prince was deposed and Saadat Ali was proclaimed, in his
stead, at Lucknow, on the 21st January, 1798--Dacoitee in Excelsis; or the
Spoliation of Oudh, by the East India Company,—by Major Bird, Assistant
Resident at Lucknow.

  • Dacoitee in Excelsis, pp. 35-38.

सर जॉन शोर ४२३
'लाखों' ही का ज़िक्र है। सर हैन​री लॉरेन्स ने जनवरी सन् १८४५
की “कलकत्ता रिव्यू” में इस सन्धि के विषय में लिखा है :—
“शायद सर जॉन शोर की सन्धि के अंगरेज़ पाठकों को सब से अधिक
यह बात खटकेगी कि अवध के शासन प्रबन्ध का इसमें कहीं ज़रा भी ज़िक्र
नहीं है। मालूम होता है कि अवध की प्रजा सब से बढ़कर बोली बोलने
वाले के हाथ नीलाम कर दी गई × × × उसके भतीजे के मुक़ाबले में
सआदतअली को अधिक निचोड़ा जा सकता था। × × × सर जॉन शोर
ने अवध की मसनद को अंगरेज़ गवरनर के हाथों की केवल एक बिकी की
चीज़ बना दिया। × × × हमें मजबूर होकर अवध के सम्बन्ध के इस तमाम
पत्र व्यवहार को सर्वथा निन्दनीय मानना पड़ता है।”†
सन् १७९५ में सर जॉन शोर ने डच लोगों के तमाम भारतीय
इलाक़े उनसे लेकर अंगरेज़ कम्पनी के अधीन
[भारत के ख़र्च पर] कर लिए। धीरे धीरे लङ्का, मलाका, बन्दा,
[अन्य देशों की] ऐम्बोयना आदिक अन्य एशियाई प्रदेशों से भी
[विजय] डच लोग निकाल दिए गए। मारीशस का
फ़्रांसीसी इलाक़ा और मनिला के उपजाऊ स्पेनिश इलाक़े अधिकतर
भारत ही के धन से ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल किए गए।

† "What will perhaps most strike the English reader of Sir John
Shore's treaty is, the entire omission o the slightest provision for the good
Government of Oudh. The people seemed as it were sold to the highest
bidder. . . . Saadat Ali was . . . . a more promising sponge to
squeeze, than his nephew . . . He (Sir John Shore) made the Musnud
of Oudh a mere transferable property in the hands of the British Governor,

४२४ भारत में अंगरेज़ी राज
इंगलिस्तान की इन सेवाओं के बदले में सर जॉन शोर को
अक्तूबर सन् १७६७ में 'लॉर्ड टेनमाउथ' की उपाधि मिली। मार्च
सन् १७६८ में वह इंगलिस्तान लौट गया। अपने समय में वह 'पक्का
ईसाई' मशहूर था, और राजनीति में वारन हेस्टिंग्स उसका आदर्श
था। निस्सन्देह इंगलिस्तान के लिए उसकी सेवाएँ क्लाइव और
वारन हेस्टिंग्स की सेवाओं के मुक़ाबले की थीं।
. . . . We are obliged entirely to condemn the whole tenor of Oudh
negotiations."—Sir Henry Lawrence in the Calcutta Review for January, 1845

तेरवाँ अध्याय
अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा
सर जॉन शोर के बाद मार्किस वेल्सली ब्रिटिश भारत का
गवर्नर जनरल नियुक्त हुआ। मार्किस वेल्सली
मार्किस वेल्सली का शासनकाल इतने अधिक महत्व का था और
उसके समय में इस देश के अन्दर इतने गहरे उलटफेर हुए कि
उस समय की राजनैतिक घटनाओं को बयान करने से पहले वेल्सली
के चरित्र, उस समय के यूरोप की राजनैतिक अवस्था, अंगरेज़
क़ौम की आकांक्षाओं और वेल्सली के शासन के उद्देश को संक्षेप
में दिखा देना आवश्यक है। वेल्सली का नाम पहले लॉर्ड मार्निङ्गटन
था। उसका जन्म सन् १७६० ई० में आयरलैण्ड में हुआ। सन्
१७६३ ईसवी में वह इंगलिस्तान के उस 'बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल' का
एक मेम्बर नियुक्त हुआ जो कम्पनी के भारतीय शासन की देख

रेख के लिए पालिंमेण्ट की ओर से बनाया गया था। इससे पहले
के एक गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस और इंगलिस्तान के
प्रधान मन्त्री पिट से वेल्सली की गहरी मित्रता थी। इन दोनों की
मदद से सन् १७६३ से १७६८ तक वेल्सली इंगलिस्तान में बैठा
हुआ भारतीय इतिहास और भारत की उस समय की राजनैतिक
हालत का गौर से अध्ययन करता रहा। वेल्सली को भारत भेजने
से पहले प्रधान मन्त्री पिट ने उसे एक सप्ताह अपने पास रख
कर हिन्दोस्तान के अन्दर एक विशाल ब्रिटिश साम्राज्य क़ायम
करने की सम्भावना और उसके उपायों पर उसके साथ ख़ूब
बातचीत की। इस तरह शिक्षा पाकर वेल्सली ७ नवम्बर सन्
१७६७ को अपने देश से रवाना हुआ और मार्ग में दो महीने
अफ़रीका की आशा अन्तरीप में ठहर कर मई सन् १७६८ में
कलकत्ते पहुँचा।
अठारवीं सदी के अन्त में पच्छिम के देशों में क़ौमी आज़ादी
[हाशिया: यूरोप में क़ौमी आज़ादी की लहर] की एक ज़बरदस्त लहर चल रही थी। 'स्वतन्त्रता'
'समता' और 'मनुष्य मात्र के बन्धुत्व' की
आवाज़ें चारों ओर गूंज रही थीं। ४ जुलाई सन्
१७७६ को अमरीका ने अपने आपको इङ्गलिस्तान की दासता से
स्वतन्त्र कर देश में प्रजातन्त्र राज (रिपब्लिक) की स्थापना
की। ७ वर्ष के भयङ्कर रक्तपात के बाद ३० नवम्बर सन् १७८२ को
इंगलिस्तान ने लाचार होकर अमरीका की 'स्वाधीनता' को स्वीकार
किया। सन् १७८६.में फ्रांस की जगद् प्रसिद्ध राजक्रान्ति का

अंग्रेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४२७
प्रारम्भ हुआ। सन् १७९२ में फ्रांस ने अपने स्वेच्छाचारी और
अन्यायी राजा सोलहवें लुई को गद्दी से उतार कर अपने यहाँ
प्रजातन्त्र राज (रिपब्लिक) क़ायम किया। २१ जनवरी सन्
१७९३ को सोलहवें लुई को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। फ्रांस ही
से “स्वतन्त्रता, समता और बन्धुत्व” (Liberty, Equality
and Fraternity) इन तीन शब्दों की पुकार उठी और चन्द
साल के अन्दर ही ये शब्द सारे यूरोप में इस सिरे से उस सिरे
तक गूंजने लगे। फ्रांस की इस महान क्रान्ति के विषय में इतालिया
के आदर्श देशभक्त महात्मा जौज़फ़ मैज़िनी ने लिखा है—
“ढाई करोड़ मनुष्य केवल किसी शब्द, किसी थोथे वाक्य या छाया के
पीछे इस तरह एक दिल होकर खड़े नहीं हो सकते
[मैज़िनी के विचार] और न आधे यूरोप को अपनी आवाज़ से जगा सकते
हैं। फ्रांस की राज्य क्रान्ति ख़तम हो गई यानी उसका
ऊपरी जोश ख़रोश जाता रहा, उसका बाहरी रूप नष्ट हो गया, जिस तरह कि
हर चीज़ का बाहरी रूप अपना काम पूरा करके नष्ट हो जाता है, किन्तु उस
क्रान्ति का उसूल, उसके भीतर का सिद्धान्त जीवित है। वह सिद्धान्त अपने
उस समय के समस्त अस्थायी आच्छादनों यानी बाहरी रूपों से अलग होकर
अब सदा के लिए हमारे मानसिक आकाश में ध्रुव तारे की तरह चमक रहा
है; उसकी शुमार मानव जाति की विजयों में की जाती है।
“हर महान सिद्धान्त अमर है। फ्रांस की राजक्रान्ति ने मनुष्य मात्र के
अधिकार, स्वतन्त्रता और समता के भावों को फिर से मनुष्य की आत्मा के
अन्दर प्रज्वलित कर दिया, अब यह ज्वाला कभी किसी के बुझाए नहीं बुझ

४२८ भारत में अंगरेज़ी राज
सकती। उस क्रान्ति ने फ्रांस निवासियों के अन्दर इस बात की चेतावनी
जगा दी कि आइन्दा कभी कोई हमारी क़ौमी ज़िन्दगी को खण्डित नहीं कर
सकता; और सब क़ौमों के लोगों में यह ज्ञान पैदा कर दिया कि जनता के
एक मत हो जाने पर क़ौम की शक्ति कितनी ज़बरदस्त होती है, उनमें यह दृढ़
विश्वास पैदा कर दिया कि विजय अन्त में जनता ही की होगी और कोई
शक्ति उसे इस विजय से वञ्चित नहीं रख सकती । राजनैतिक क्षेत्र में इस
क्रान्ति ने मानव उन्नति के एक युग को पूरा करके और उसका सार लेकर
हमें दूसरे युग की सीमा तक पहुँचा दिया।
“ये ऐसे नतीजे हैं जो कभी नष्ट न होंगे; कोई सरकारी उल्लेख कोई
राजनैतिक सिद्धान्त या किसी स्वेच्छाचारी सरकार के अनन्य अधिकार इन
नतीजों को नहीं मिटा सकते।”*
फ्रांसीसी क़ौम प्रायः शुरू से उच्च आदर्शों की उपासक रही है।

  • "Five and twenty millions of men do not rise up as, one man, nor
    rouse one half of Europe at their call, for a mere word, an empty formula,
    a shadow. The Revolution, that is to say the tumult and fury of the
    Revolution—perished; the form perished, as all forms perish when their
    task is accomplished, but the idea of the Revolution survived. That idea
    freed from every temporary envelope or disguise, now reigns for ever, a
    fixed star in the intellectual firmament; it is numbered among the conquests
    of Humanity.
    "Every great idea is immortal; the French Revolution rekindled the
    sense of Right, of liberty, and of equality in the human soul, never henceforth
    to be extinguished; it awakened France to the consciousness of the
    inviolability of her national life; awakened in every people a perception of
    the powers of collective will, and a conviction of ultimate victory, of which
    none can deprive them. It summed up and concluded (in the political
    sphere) one epoch of Humanity, and led us to the confines of the next.

अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४२६
किन्तु अंगरेज़ों और फ्रांसीसियों के चरित्र में आरम्भ से ही बहुत
बड़ा अन्तर दिखाई देता रहा है। जब कि
[हाशिया: अंगरेज़ों और] फ्रांसीसी समस्त संसार को स्वतंत्रता, समता
[हाशिया: फ्रांसीसियों के] और बन्धुत्व का उपदेश दे रहे थे, ठीक उस
[हाशिया: चरित्र में अन्तर] समय उनके पड़ोसी अंगरेज़ इन सिद्धान्तों के
प्रचार को रोकने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे। वजह यह थी कि
इंगलिस्तान के शासकों को साम्राज्य का और वहाँ के पूंजीपतियों
को दूसरे देशों से धन बटोरने का काफ़ी चसका पड़ चुका था।
इंगलिस्तान के साम्राज्य पिपासी शासकों और धन लोलुप पूंजी-
पतियों को इस बात का डर था कि यदि इस तरह के विचार संसार
में फैल गए तो हमारी अपनी इष्ट सिद्धि में बहुत बड़ी बाधा पड़ेगी।
जिस अंगरेज़ विद्वान एडमंड बर्क ने इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के
सामने इस योग्यता के साथ वारन हेस्टिंग्स के पाप कृत्यों को
खोला था, उसी बर्क को अब वहाँ के शासकों ने १५०० पाउण्ड
सालाना की पेन्शन देकर उससे फ्रांस की राजक्रान्ति के ख़िलाफ़
एक ज़बरदस्त पुस्तक लिखवा दी, ताकि फ्रांस की आज़ादी का
रोग इंगलिस्तान में फैलने न पाए।
इंगलिस्तान का प्रधान मन्त्री पिट हद दर्जे का साम्राज्य लोलुप
था। फ्रांस और फ्रांसीसी विचारों का वह कट्टर शत्रु था। उसी
की इच्छानुसार भारत का प्रत्येक अंगरेज़ अफ़सर यहाँ के देशी


“ These are results which will not pass away : they defy every protocol,
constitutional theory, or veto of despotic power.”—Joseph Mazzini.

४३० भारत में अंगरेज़ी राज
दरबारों में फ़्रांसीसियों, उनके देश और उनके विचारों को बदनाम
करने की हर तरह कोशिश करता रहता था। वेल्सली को भी
फ़्रांसीसी क़ौम और फ़्रांसीसी विचारों से हद दर्जे का द्वेष था।
इसकी एक वजह यह भी बताई जाती है कि इंगलिस्तान में वेल्सली
ने एक फ़्रान्सीसी स्त्री अपने घर में रख रक्खी थी, जिससे वेल्सली
के कई बच्चे हुए। बच्चे होने के बाद वेल्सली ने उसके साथ
बाज़ाब्ता विवाह किया, किन्तु बाद में दोनों में कुछ अनबन हो गई
और उस स्त्री ने वेल्सली के साथ भारत आने से इनकार कर
दिया। जो हो, वेल्सली फ़्रांसीसियों से इतना डरता था कि भारत
आते ही उसने ४ मई सन् १७९८ को यहाँ के जंगी लाट सर
आल्फ्रेड क्लार्क को एक “प्राइवेट और गुप्त” पत्र द्वारा यह साफ़
साफ़ आदेश दिया कि—कलकत्ता, चट्टग्राम, चन्द्रनगर, चुंचड़ा
इत्यादि से और बाक़ी तमाम ब्रिटिश भारतीय इलाक़ों से एक एक
फ़्रांसीसी को और फ़्रांसीसियों से सम्बन्ध रखने वाले समस्त अन्य
यूरोप निवासियों तक को चुन चुनकर ज़बरदस्ती यूरोप भेज दिया
जाय। मार्किस वेल्सली प्रजा के अधिकारों का इतना पक्का विरोधी
था और उसके राजनैतिक विचार इतने अनुदार थे कि स्वयं अपने
देश इंगलिस्तान के अन्दर वह मामूली पार्लिमेण्ट के सुधारों तक
के ख़िलाफ़ था।
पिट के समय तक आयरलैंड की एक अलग पार्लिमेण्ट थी।
पिट ने इस उद्देश से कि आयरलैंड को इंगलिस्तान के राज्य में मिला

अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४३१
लिया जाय और इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के मातहत कर दिया
[आयरलैण्ड की स्वाधीनता का अपहरण] जाय, जान बूझ कर आयरलैंड में सशस्त्र विद्रोह
खड़ा कर दिया। प्रसिद्ध अंगरेज़ विद्वान डब्ल्यू०
टी० स्टेड ने उस समय के ऐतिहासिक लेखों
से साबित किया है कि आयरलैंड का सन् १७६८
का विद्रोह ब्रिटिश सरकार का उकसाया हुआ था और आयरलैंड
की स्वाधीनता छीनने के उद्देश से किया गया था। स्टेड यह भी
लिखता है कि जिन उपायों से इंगलिस्तान के शासकों ने आयरलैंड
की स्वाधीनता छीन कर उसे इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के मातहत
किया, उनमें एक उपाय आयरलैंड की स्त्रियों के साथ "बेरोक टोक
बलात्कार" ("Free-rape") भी था। ये उपाय थे जिनके ज़रिये
'ब्रिटेन' का नाम 'ग्रेट ब्रिटेन' रक्खा गया।
मार्किस वेल्सली ने २ अक्टूबर सन् १८०० ई० को कलकत्ते से
[भारत में मार्किस वेल्सली का उद्देश] अपने एक मित्र के नाम पत्र लिखा जिसके नीचे
लिखे वाक्य से उसके और कम्पनी के दोनों के
भारतीय शासन के उद्देश का साफ़ पता चलता
है। इस पत्र में वेल्सली ने लिखा :—
“ × × × मैं बादशाहतों के ढेर लगा दूँगा और फ़तह पर फ़तह तथा
मालगुज़ारी पर मालगुज़ारी लाद दूँगा। मैं इतनी शान, इतना धन और
इतनी सत्ता इकट्ठी कर दूँगा कि एक बार मेरे महत्त्वाकांक्षी और धनलोलुप
मालिक भी 'त्राहि त्राहि' चिल्लाने लगेंगे। × × ×” ❀

  • "I will heap Kingdoms upon Kingdoms, victory upon victory,

४३२ भारत में अंगरेज़ी राज
भारत आने से पहले दो महीने आशा अन्तरीप में रह कर
वेलसली ने भारत की अनेक देशी रियासतों की स्वाधीनता को नाश
करने की तरकीबें सोचीं। इस काम में उसे दो अंगरेज़ अफ़सरों से
बहुत बड़ी मदद मिली। एक सर डेविड बेयर्ड और दूसरा मेजर
कर्कपैट्रिक। सर डेविड बेयर्ड टीपू सुलतान के यहाँ क़ैद रह चुका
था। डेविड बेयर्ड का बयान है कि टीपू प्रायः अपने मनोरंजन के
लिए बेयर्ड को बन्दर की तरह कपड़े पहनवा कर एक ऊँचा बाँस
गड़वा कर उसे उस बाँस पर चढ़वाया उतरवाया करता था और
बन्दर की तरह नचवाया करता था। हम भी इस बयान को केवल
मनोरंजन के तौर पर दे रहे हैं। नहीं तो टीपू की इस तरह की
हरकतों का सबूत सिवा अंगरेज़ क़ैदियों के बयानों के और कहीं
नहीं मिलता, और इन बयानों पर बहुत अधिक विश्वास नहीं
किया जा सकता। मेजर कर्कपैट्रिक वारन हेस्टिंग्स और कॉर्न-
वालिस के समय का खुर्रांट नीतिज्ञ था। माधोजी सींधिया के
यहाँ नैपाल में और हैदराबाद में, तीन जगह वह कम्पनी के दूत
का काम कर चुका था। माधोजी सींधिया को नाना फड़नवीस से
लड़ाकर मराठों की सत्ता को नाश करने में, नैपाल के मागों और
सैन्यबल इत्यादि का गुप्त पता लगाने में और हैदराबाद की सेना
revenue upon revenue; I will accumulate glory and wealth and power, until
the ambition and avarice even of my masters shall cry mercy. . . . . "—
Marquess of Wellesley's letter to lady Anne Barnard, dated October 2nd,
1800.

अंग्रेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४३३
से फ्रांसीसियों को निकलवाकर उनकी जगह अंग्रेज़ भरती कराने
में मेजर कर्कपैट्रिक का ख़ास हाथ था।
इन दोनों अंग्रेज़ों से वेल्सली को देशी रियासतों की स्थिति
का ठीक ठीक पता चल गया और अपनी तजवीज़ों को पक्का करने
में बहुत बड़ी मदद मिली। आशा अन्तरीप से वेल्सली ने प्रधान
मन्त्री पिट और भारत मन्त्री डण्डास के नाम जो पत्र इंगलिस्तान
भेजे, उनसे साफ़ ज़ाहिर हो जाता है कि इंगलिस्तान के शासकों
ने वेल्सली को क्या क्या हिदायतें दी थीं और भारत पहुँच कर
उसकी क्या तजवीज़ें थीं।
एक ख़ास तजवीज़ इस समय यह की गई कि भारतीय नरेशों
सबसीडीयरी के पास उस समय तक जहाँ जहाँ अपनी
एलाएन्स स्वतन्त्र सेनाएँ मौजूद थीं, उन सेनाओं को एक
एक कर किसी प्रकार बरखास्त करा दिया
जावे; उन नरेशों और उनकी रियासतों की रक्षा का भार कम्पनी
अपने ऊपर ले ले; और पुरानी रियासती सेनाओं की जगह कम्पनी
की सेनाएं, अंग्रेज़ अफ़सरों के अधीन, रियासतों के ख़र्च पर
उन रियासतों में क़ायम कर दी जावें। इस नई तजवीज़ का नाम
'सबसीडीयरी एलाएन्स' रक्खा गया। 'सबसीडी' का अर्थ
'आर्थिक सहायता' और 'एलाएन्स' का अर्थ 'मित्रता' है। मतलब
यह था कि हर देशी नरेश कम्पनी को निश्चित 'आर्थिक सहायता'
देकर कम्पनी की 'सैनिक मित्रता' लाभ कर सके। निस्सन्देह देशी
नरेशों को उनकी रियासतों के अन्दर उन्हीं के ख़र्च पर क़ैद करके
२८

४३४ भारत में अंग्रेज़ी राज
रखने का इससे सुन्दर उपाय न सोचा जा सकता था। इस 'सब्सिडी-
डीयरी एलायन्स' के विषय में एक यूरोपियन विद्वान लिखता है:—
“सब्सिडीयरी एलायन्स × × × सिवाय एक धोखे के और कुछ न थी।
उसका उद्देश इङ्गलिस्तान की जनता की आँखों में धूल डालना था × × ×।
“× × × ये देश ज़ाहिरा विजय नहीं किए जाते थे, वहाँ के नरेशों
को छत्र, चँवर आदिक राजत्व के समस्त चिन्हों सहित तख़्त पर रहने
दिया जाता था, किन्तु असली ताक़त उनके हाथों से लेकर एक पोलिटिकल
एजण्ट के हाथों में दे दी जाती थी × × ×।”*
इस तजवीज़ का उद्देश 'इंग्लिस्तान की जनता की आँखों में
धूल डालना' रहा हो या न रहा हो, इसमें सन्देह नहीं कि उस समय
के असंख्य भोले एशिया निवासियों की आँखों में धूल डालने के
लिए यह काफ़ी साबित हुई ।
जिन छलों द्वारा वेल्सली ने भारत में अपने सबसीडीयरी एला-
यन्स का जाल बिछाया, जिस प्रकार उसने भारत के मुसलमानों
और मराठों को वश में किया, निज़ाम और पेशवा को फाँस कर
उन्हें कम्पनी का क़ैदी बनाया, करनाटक के नवाब, तञ्जोर के राजा,
अवध के नवाब वज़ीर और सूरत और फ़र्रुख़ाबाद के नवाबों के
इलाक़े छीने और टीपू, सींधिया, होलकर और भोंसले को बरबाद

  • "The Subsidiary system. . . . was nothing more than a delusion;
    it was for the purpose of throwing dust into the eyes of the British public....
    " . . . these countries were not ostensibly conquered; the sovereign
    was allowed to remain on his throne, with all the trappings of royalty, but
    substantial power was transferred from him to the person of a political
    agent,"—Asiatic Quarterly Review for January 1887.

अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४३५

किया, इन सब बातों का विस्तृत बयान अलग अलग अध्यायों में
किया जावेगा ।
इस अध्याय को समाप्त करने से पहले केवल एक बात हम
[ईसाई धर्म प्रचार] और बता देना चाहते हैं । वह यह कि मार्किस
वेल्सली के शुद्ध राजनैतिक उद्देश के अलावा
उसका एक उद्देश भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना भी था ।
वेल्सली ने भारत आते ही ईसाई धर्म के अनुसार अंगरेज़ी
इलाके के अन्दर रविवार की छुट्टी का मनाया जाना जारी किया ।
उस दिन समाचार पत्रों का छपना इक क़ानूनन् बन्द कर दिया ।
कलकत्ते के फ़ोर्ट विलियम में उसने एक कॉलेज की स्थापना की ।
इस कॉलेज का एक उद्देश विदेशी सरकार के लिए सरकारी नौकर
तैयार करना था । वेल्सली के जीवन चरित्र का रचयिता आर०
आर० पीयर्स साफ़ लिखता है कि यह कॉलेज भारतवासियों में
ईसाई धर्म को फैलाने का भी एक मुख्य साधन था । इस कॉलेज
के ज़रिये भारत की सात भिन्न भिन्न भाषाओं में इंजील का अनुवाद
करा कर उसका भारतवासियों में प्रचार कराया गया । मार्किस
वेल्सली न अपने व्यक्तिगत जीवन में चरित्रवान था और न
सार्वजनिक जीवन में अपने से पहले के किसी गबरनर जनरल से
अधिक ईमानदार था, फिर भी उसकी इस ईसाई धर्मनिष्ठा के
लिए अंगरेज़ इतिहास लेखक प्रायः उसकी प्रशंसा करते हैं । सच
यह है कि उसका ईसाई धर्म प्रचार भी राजनैतिक इष्ट सिद्धि का
एक साधन मात्र था ।

चौदवाँ अध्याय
वेल्सली और निज़ाम
आशा अन्तरोप से वेल्सली ने इंगलिस्तान के मन्त्री डण्डास
[हाशिया: इंगलिस्तान के] के नाम दो ख़ास पत्र लिखे, एक २३ फ़रवरी
[हाशिया: मन्त्री के नाम] सन् १७९८ को और दूसरा २८ फ़रवरी को ।
[हाशिया: वेल्सली के पत्र] इनमें से पहले पत्र में वेल्सली ने लिखा :—
“ × × × हमें सबसे बड़ा लाभ इस समय इस
बात में है कि देशी नरेश एक दूसरे के साथ अपनी दोस्ती या दुश्मनी का
फ़ैसला तक नहीं कर सकते ।”*
इस वाक्य में तीन ख़ास देशी शक्तियों की ओर इशारा था,

  • “Bear in mind the state of the native powers in India at this moment;
    and recollect that the greatest advantage which we now possess is the
    present deranged condition of those interests.”—Marquess Wellesley to
    Mr. Dundas 23rd February, 1798.