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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 698

सर जॉन शोर ४१६
समाचार पाते ही सर जॉन शोर ने इरादा किया कि—"फ़ैज़ुल्ला खाँ
के ख़ानदान से रियासत बिल्कुल छीन ली जावे।"* सर रॉबर्ट
एबरक्रौम्बी अवध की सेना सहित आगे बढ़ा। बिटोवरा में लड़ाई
हुई। मिल लिखता है कि पहले रुहेलों का पल्ला कुछ भारी रहा, किन्तु
बाद में अंगरेज़ों की जीत हुई। अन्त में फ़ैजुल्ला ख़ाँ के ख़ानदान से
रियासत छीन ली गई। उसका तमाम ख़ज़ाना अवध के नवाब
वज़ीर को दे दिया गया और रियासत ज़ब्त कर ली गई। १० लाख
रुपए सालाना की जागीर रुहेलखण्ड के एक पिछले नवाब मोहम्मद
अली के बेटे अहमदअली को दे दी गई। रुहेलखण्ड के राज में
अंगरेज़ों की पैदा की हुई यह दूसरी बग़ावत थी।
अब केवल अवध के साथ सर जॉन शोर के व्यवहार को बयान
सर जॉन शोर करना बाक़ी है। सर जॉन शोर ने अपने एक
और अवध पत्र में साफ़ लिखा है कि—"अवध के साथ
हमारी जो सन्धियाँ हुई हैं उनकी हमें ख़ाक
परवा नहीं करनी चाहिए।" लार्ड कॉर्नवालिस ने सन् १७८८ में
अवध के नवाब के साथ यह सन्धि की थी कि कम्पनी की
सब्सिडियरी सेना का ख़र्च जो नवाब को देना पड़ता था, पचास
लाख सालाना से कभी बढ़ाया न जायगा। सर जॉन शोर ने
आकर बेखटके और बेवजह इस सन्धि को तोड़ डाला, गोकि
लिखा है कि नवाब हर साल ठीक समय पर रक़म अदा कर देता
था और अवध की प्रजा की हालत फिर कुछ सुधरती जा रही थी।

  • Mill, vol. vi, pp. 33, 34,