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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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सर जॉन शोर ४२३
'लाखों' ही का ज़िक्र है। सर हैन​री लॉरेन्स ने जनवरी सन् १८४५
की “कलकत्ता रिव्यू” में इस सन्धि के विषय में लिखा है :—
“शायद सर जॉन शोर की सन्धि के अंगरेज़ पाठकों को सब से अधिक
यह बात खटकेगी कि अवध के शासन प्रबन्ध का इसमें कहीं ज़रा भी ज़िक्र
नहीं है। मालूम होता है कि अवध की प्रजा सब से बढ़कर बोली बोलने
वाले के हाथ नीलाम कर दी गई × × × उसके भतीजे के मुक़ाबले में
सआदतअली को अधिक निचोड़ा जा सकता था। × × × सर जॉन शोर
ने अवध की मसनद को अंगरेज़ गवरनर के हाथों की केवल एक बिकी की
चीज़ बना दिया। × × × हमें मजबूर होकर अवध के सम्बन्ध के इस तमाम
पत्र व्यवहार को सर्वथा निन्दनीय मानना पड़ता है।”†
सन् १७९५ में सर जॉन शोर ने डच लोगों के तमाम भारतीय
इलाक़े उनसे लेकर अंगरेज़ कम्पनी के अधीन
[भारत के ख़र्च पर] कर लिए। धीरे धीरे लङ्का, मलाका, बन्दा,
[अन्य देशों की] ऐम्बोयना आदिक अन्य एशियाई प्रदेशों से भी
[विजय] डच लोग निकाल दिए गए। मारीशस का
फ़्रांसीसी इलाक़ा और मनिला के उपजाऊ स्पेनिश इलाक़े अधिकतर
भारत ही के धन से ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल किए गए।

† "What will perhaps most strike the English reader of Sir John
Shore's treaty is, the entire omission o the slightest provision for the good
Government of Oudh. The people seemed as it were sold to the highest
bidder. . . . Saadat Ali was . . . . a more promising sponge to
squeeze, than his nephew . . . He (Sir John Shore) made the Musnud
of Oudh a mere transferable property in the hands of the British Governor,