भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
सर जॉन शोर ४०१
चाहता था और दूसरी ओर दिल्ली सम्राट् के रहे सहे मान और
उसके अधिकार का अन्त कर देना चाहता था। इंगलिस्तान पहुँच
कर वारन हेस्टिंग्स पर जो मुक़दमा चला उसमें एक इलज़ाम उस
पर यह था—
“मुग़ल सम्राट् के थोड़े से रहे सहे इलाकों को छीन लेने के लिए वारन
हेस्टिंग्स मराठा राज के प्रधान सेनापति माधोजी सींधिया से मिल गया;
और जब कि एक ओर उसने अपना एक दूत इस काम के लिए दिल्ली भेज
दिया कि वह वहाँ पर सम्राट् और उसके वज़ीरों के साथ गुप्त साज़िशें जारी
रक्खे × × × दूसरी ओर इस तमाम समय में वह सम्राट् और उसके वज़ीरों
के ख़िलाफ़ बराबर मराठों से मिला रहा; मराठों के साथ भी उसने दग़ा की
और उनसे बहाना यह लेता रहा कि मैं सम्राट् से तुम्हारे अधिकारों की रक्षा
कर रहा हूँ। इस तरह उसने उन सब के नाश की तदबीर की और सब का
नाश कर डाला।”*
वारन हेस्टिंग्स ही की सलाह से माधोजी सींधिया ने एक
[हाशिया: दिल्ली सम्राट् के] ज़बरदस्त फ़ौज रक्खी, उस फ़ौज में यूरोपियन
[हाशिया: साथ दग़ा] अफ़सर रक्खे और वारन हेस्टिंग्स की ख़ास
सिफ़ारिश पर एक यूरोपियन दी बॉयन को
उसका प्रधान सेनापति नियुक्त किया। यही फ़ौज लेकर माधोजी
- " . . . . Warren Hastings did unite with the Captain-General of
the Marhatta State, called Madhoji Scindhia, in designs against the few
remaining territories of the Moghul Emperor; and that whilst he sent an
agent to Delhi and carried on intrigues with the King and his ministers,
. . . . he did all along concur with the Marhattas in their designs
against the said King and his ministers, under the treacherous pretext of
२६
४०२ भारत में अंगरेज़ी राज
ने दिल्ली के आसपास के इलाक़ों पर हमला किया और सम्राट
को कुछ समय के लिए एक तरह अपना क़ैदी बना लिया। अंगरेज़
उस समय तक सम्राट की प्रजा थे और बराबर अपने इलाक़ों के
लिए सम्राट को ख़िराज दिया करते थे। वारन हेस्टिंग्स ने बजाय
सम्राट की सहायता करने के माधोजी को हर तरह उकसाया और
बाद में अंगरेज़ों ने सम्राट की असहाय अवस्था से लाभ उठाकर
ख़िराज भेजना बन्द कर दिया।
माधोजी के बढ़ते हुए बल को देखकर महाराष्ट्र मण्डल के दूसरे
सदस्यों को ईर्षा होना स्वाभाविक था। अन्त
[हाशिया: माधोजी सींधिया] में यह ईर्षा ही मराठों की सत्ता के नाश की
[हाशिया: के नाश की] सबसे बड़ी वजह हुई। कलकत्ते की कौन्सिल
[हाशिया: तदबीरें] की काररवाई में दर्ज है कि एक बार कौन्सिल
के कुछ सदस्यों ने यह शक ज़ाहिर किया कि माधोजी के बल का
बढ़ते जाना कम्पनी के लिए ख़तरनाक है। इस पर वारन हेस्टिंग्स
ने उन्हें विश्वास दिलाया कि माधोजी की नई सेना ही अन्त में
उसके विनाश का सबब होगी। वारन हेस्टिंग्स को अपनी चाल पर
पूरा क़ाबू था, और उसके जीवन ही में उसकी यह पेशीनगोई
सच्ची साबित होगई।
माधोजी सींधिया का बल बढ़ता जा रहा था। अंगरेज़ों के
लिए उसे सीमा के अन्दर रखना ज़रूरी था। माधोजी सींधिया
supporting the authority of the former against the latter and did contrive
and effect the ruin of them all, ... ... ."-One of the charges against
Warren Hastings in his impeachment in England.
सर जॉन शोर. ४०३
और नाना फड़नवीस दोनों का बल महाराष्ट्र मण्डल में सबसे
अधिक बढ़ा हुआ था। उस मण्डल का नाश करने के लिए अंगरेज़ों
का इनके बल को तोड़ना आवश्यक था। पेशवा माधोराव नारायण
पूरी तरह नाना के कहने में था। पूना में माधोराव नारायण को
मसनद से उतार कर उसकी जगह राघोबा के बालक पुत्र बाजी
राव को पेशवा बनाने के लिए एक गुप्त षड्यन्त्र रचा गया।
माधोजी सींधिया को भी इस षड्यन्त्र में शामिल कर लिया गया।
किन्तु नाना फड़नवीस को इसका पता चल गया। उसने पेशवा
के हुकुम से बाजीराव को गिरफ़्तार करके पूना में क़ैद कर दिया।
माधोजी सींधिया उस समय दिल्ली सम्राट का ख़ास संरक्षक
बना हुआ था। वारन हेस्टिंग्स ने माधोजी से
[हाशिया: माधोजी के ख़िलाफ़ साज़िशें] वादा कर लिया था कि कम्पनी की ओर से
सम्राट का सालाना खिराज आइन्दा आप को
दिया जाया करेगा। मालूम होता है हेस्टिंग्स के समय में यह
मामला यूंही टलता रहा। हेस्टिंग्स के बाद माधोजी ने गवरनर
जनरल मैक्फ़रसन से सम्राट के नाम पर खिराज तलब किया।
मैक्फ़रसन ने टला दिया। अन्त में कॉर्नवालिस ने खिराज देने से
सदा के लिए साफ़ इनकार कर दिया। इस पर दिल्ली सम्राट ने
स्वयं माधोजी को पत्र लिखा कि तुम कलकत्ते पहुँच कर कम्पनी से
शाही खिराज वसूल करो। सम्राट ने एक दूसरा पत्र नाना फड़नवीस
को लिखा और कम्पनी से शाही खिराज वसूल करने में पेशवा
दरबार की मदद चाही। माधोजी का उस समय फ़र्ज़ था कि
४०४ भारत में अंगरेज़ी राज
कलकत्ते पर चढ़ाई करके जिस तरह हो कम्पनी से शाही खिराज
वसूल करता। किन्तु माधोजी अपनी कमज़ोरियों को खूब जानता
था। अंगरेज़ माधोजी के बल को तोड़ने की पहले ही से कोशिशें
कर रहे थे। इतिहास लेखक ग्रॉण्ट डफ़ लिखता है :-
"मिस्टर मैक्फ़रसन ने यह सोचकर कि सींधिया की महत्वाकांक्षा बड़ी
ख़तरनाक हो चली है, दूसरे मराठा नरेशों में सींधिया के ख़िलाफ़ जो ईर्षा
और प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो गई थी, उसे और अधिक भड़काकर सींधिया की
तरक्क़ी को रोकने के लिए उसके मुक़ाबले में दूसरी ताक़तें खड़ी कर देने की
कोशिश की।"*
मॉस्टिन के बाद से अब तक कोई अंगरेज़ एलची पेशवा के
दरबार में न भेजा गया था। अब चार्ल्स मैलेट कम्पनी का एलची
नियुक्त होकर पूना पहुँचा। चार्ल्स मैलेट का ख़ास काम था
माधोजी सींधिया के ख़िलाफ़ दूसरे मराठा नरेशों को भड़काना और
नाना के विरुद्ध गुप्त साज़िशें करना। माधोजी के चित्त में भी
अंगरेज़ों की ओर से काफ़ी शङ्काएँ थीं। स्वयं कॉर्नवालिस का
व्यवहार उसकी ओर ख़ासा रूखा रहा। मूदाजी भोंसले के साथ
अंगरेज़ों ने अब इस तरह का सलूक शुरू किया, जिससे माधोजी
सींधिया को सन्देह होगया कि अंगरेज़ मेरे ख़िलाफ़ मूदाजी को
- "Mr. Macpherson conceived that the ambitious nature of Scindhia's
policy was very dangerous and endeavoured to raise some counterpoise to
his progress by exciting the jealousy and rivalry already entertained towards
him among the other Marhatta chiefs,"- Grant Duff's History of the Mar-
hattas, p. 463.
सर जॉन शोर ४०५
तैयार कर रहे हैं। माधोजी इस कठिन समस्या के विषय में नाना
फड़नवीस से सलाह करने के लिए पूना आया। इस दरमियान
चार्ल्स मैलेट ने पूना में रह कर माधोजी के विरुद्ध काफ़ी सामान
पैदा कर दिया था।
अहल्याबाई होलकर के आदर्श चरित्र और आदर्श शासन का
ज़िक्र एक पिछले अध्याय में आ चुका है। अहल्याबाई के तीस
वर्ष के शासन में उसकी प्रजा संसार में सब से सुखी और सब से
खुशहाल गिनी जाती थी। विदेशियों के साथ अधिक मेल जोल
रखने के अहल्याबाई सदा ख़िलाफ़ रही। अपने देशवासियों के
खिलाफ़ विदेशियों के साथ 'गुप्त सन्धियाँ' करना उसके लिए
नामुमकिन था। किन्तु अहल्याबाई की मृत्यु के बाद उसके उत्तरा-
धिकारी तुकाजी होलकर में न वह योग्यता रह गई थी और न
वह चरित्र। अंगरेज़ों ने तुकाजी को माधोजी सींधिया के ख़िलाफ़
भड़काना शुरू किया, और ठीक उस समय जब कि माधोजी नाना
फड़नवीस से सलाह करने के लिए पूना आया, तुकाजी होलकर ने
माधोजी के राज पर हमला कर दिया।
ग्राण्ट डफ़ के इतिहास से मालूम होता है कि होलकर और
सींधिया में उस समय कोई ख़ास झगड़ा न
[हाशिया: मराठा मंडल की] था, बल्कि माधोजी सींधिया तुकाजी होलकर
[हाशिया: अव्यवस्था] के साथ प्रेम से रहने के लिए उत्सुक था।
तुकाजी होलकर का माधोजी सींधिया के राज पर हमला करना
सारे मराठा इतिहास में एक मराठा नरेश के दूसरे मराठा नरेश
४०६ भारत में अंगरेज़ी राज
पर हमला करने की पहली मिसाल थी। महाराष्ट्र मण्डल का अब
क़रीब क़रीब ख़ात्मा हो चुका था। गायकवाड़ और भोंसले पहले
ही मण्डल से टूट चुके थे। सींधिया और होलकर की यह दशा
हो रही थी। इन चारों की इस शोचनीय हालत में अकेला पेशवा
दरबार मण्डल की उस इमारत को, जिसकी बुनियादें हिल चुकी
थीं, कब तक सँभाल सकता था।
सींधिया की सेना जिसका प्रधान सेनापति दी बोयन था,
अनेक लड़ाइयाँ देख चुकी थी। उसने होलकर की सेना को हरा
दिया। किन्तु होलकर ने पीछे लौटते हुए सींधिया के राज को खूब
रौंदा और सींधिया के मुख्य नगर उज्जैन को अच्छी तरह लूटा।
इस समय से ही सींधिया और होलकर के कुलों में परस्पर वैमनस्य
पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा। इसके बाद होलकर ने भी अंगरेज़ों
की सलाह से अपनी सेना में यूरोपियन अफ़सर नियुक्त करना
शुरू कर दिया। वह दोबारा सींधिया राज पर हमला करने का
इरादा कर रहा था।
एक ओर तुकाजी होलकर की शत्रुता और दूसरी ओर उसकी
अपनी सेना में दी बोयन और अनेक दूसरे यूरोपियनों का ऊँचे
पदों पर होना, इन दोनों बातों ने माधोजी सींधिया को इस समय
ख़ासा जकड़ रक्खा था। वह खूब समझ चुका था कि ये यूरोपियन
मुलाज़िम अंगरेज़ों के विरुद्ध मेरा साथ कभी न देंगे। इसके बहुत
दिन पहले नाना फड़नवीस ने एक बार माधोजी से कहा था—
“अंगरेज़ों को इस साम्राज्य में पैर रखने की जगह नहीं मिलनी
सर जॉन शोर ४०७
चाहिए, यदि उन्हें पैर रखने की जगह मिल गई तो सारा देश ख़तरे में पड़
जावेगा।"
माधोजी को अब नाना के ये शब्द बार बार याद आते थे।
वह अपने पिछले कृत्यों पर पछता रहा था और कम्पनी से शाही
खिराज वसूल करने के सम्बन्ध में सम्राट के पत्रों पर और इस
सारी स्थिति पर नाना से सलाह करने के लिए पूना आया हुआ
था। दिल्ली के सम्राट, माधोजी सिंधिया और पेशवा, तीनों में इस
प्रकार मेल हो जाना और माधोजी का तीनों की ओर से सेना
लेकर शाही खिराज वसूल करने के लिए कलकत्ते पर चढ़ाई करना
उस समय कम्पनी के लिए अत्यन्त आपत्तिजनक हो सकता था।
जब कि माधोजी सिंधिया पूना में पेशवा और नाना फड़नवीस
के साथ सलाहें कर ही रहा था, फ़रवरी सन्
[माधोजी सिंधिया] १७६४ को पूना के निकट वनौरी नामक स्थान
[की हत्या] पर अचानक माधोजी सिंधिया की मृत्यु होगई।
इतिहास लेखक ग्राण्ट डफ़ इस मृत्यु का सबब यह लिखता है
कि माधोजी को अचानक "ज़ोर का बुख़ार" आगया। किन्तु
माधोजी के जीवन चरित्र का अंगरेज़ रचयिता कीन कुछ और भेद
खोलता है। वह 'तारीखे मुज़फ़्फ़री' के आधार पर लिखता है—
"मृत्यु से पहली शाम को एक हथियारबन्द गिरोह ने माधोजी
को रास्ते में घेर कर मारा।"* कीन लिखता है—"नाना ने इस
- "Madhoji had been way laid the evening before by an armed gang
. . ."-Keene's Madhoji Scindhia.
४०८ भारत में अंगरेज़ी राज
गिरोह को इस कार्य के लिए नियुक्त किया था।” और कीन की
राय है—“निस्सन्देह माधोजी की मौत चाहने के लिए नाना के
पास काफ़ी वजह थी।”
इसमें सन्देह नहीं माधोजी सींधिया को मरवा डाला गया।
किन्तु नाना पर उसका दोष मढ़ना साफ़ झूठ और अन्याय है।
न नाना के पास उस समय “माधोजी की मौत चाहने के लिए कोई
वजह थी” और न नाना का चरित्र इस ढङ्ग का था। इसके ख़िलाफ़
अंगरेज़ों के पास “माधोजी की मौत चाहने के लिए निस्सन्देह
काफ़ी वजह थी।” और मैलेह और मॉस्टिन दोनों की राशि भी
एक थी। ग्रांट डफ़ साफ़ लिखता है :—
“सींधिया की शक्ति और उसकी महत्त्वाकाँक्षा, उसका पूना जाना और
सबसे बढ़ कर देश वासियों में आम तौर पर उसकी इज़्ज़त, इन सब बातों
से अंगरेज़ माधोजी पर शक करने लगे थे; इसलिए अंगरेज़ों के काग़ज़ों में
हमें इस बात के बार बार सबूत मिलते हैं कि वे माधोजी की हरकतों को बड़े
ग़ौर और जलन के साथ देख रहे थे।”*
ग्रांट डफ़ से ही यह भी पता चलता है कि माधोजी के पूना
माधोजी की हत्या पहुँचने के बाद ही दिल्ली के एक हिन्दोस्तानी
से अंगरेज़ों को अख़बार में एक लेख निकला था कि दिल्ली के
लाभ सम्राट ने पेशवा और माधोजी दोनों के नाम
- " . . . . his power and ambition, his march to Poona, and above
all, the general opinion of the country, led the English to suspect him ; and
we accordingly find in their records various proofs of watchful jealousy ;
. . . . ."—Grant Duff.
सर जॉन शोर ४०६
अपने बङ्गाल के खिराज के सम्बन्ध में पत्र लिखे हैं और उनसे
मदद चाही है। माधोजी सींधिया की हत्या से कम्पनी के रास्ते
का एक ज़बरदस्त काँटा दूर हो गया।
उस समय के सरकारी पत्र व्यवहार में दोनों बातें बिलकुल
साफ़ हैं। एक यह कि अंगरेज़ों ने होलकर को सींधिया पर
हमला करने के लिए उकसाया और दूसरे यह कि अंगरेज़ माधोजी
सींधिया के विरुद्ध साज़िशें कर रहे थे। जिस समय माधोजी अपने
राज से पूना की ओर रवाना हुआ, उसी समय गवरनर जनरल
ने सींधिया दरबार के अंगरेज़ रेजिडेंट को वहाँ से वापस
बुला लिया।
माधोजी की मृत्यु के समय कॉर्नवालिस इंगलिस्तान में था
और सर जॉन शोर भारत में गवरनर जनरल था। कॉर्नवालिस को
जब माधोजी की मृत्यु का समाचार मिला, उसने ७ सितम्बर सन्
१७६४ को प्रसन्न होकर सर जॉन शोर को लिखा—"सींधिया की
मृत्यु से आपकी गवरमेंट की क़रीब क़रीब हर राजनैतिक कठिनाई
दूर हो जावेगी।”*
इससे अधिक सुबूत इस बात का और क्या हो सकता है कि
माधोजी की मृत्यु वास्तव में कौन चाहता था और उसकी हत्या
करने वालों को किसने नियुक्त किया था।
- "The death of Scindhia, . . . will nearly remove every political
difficulty of your Government," - Cornwallis' letter to Sir John Shore,
September 7, 1794.
४१० भारत में अंग्रेज़ी राज
कम्पनी के रास्ते का दूसरा ज़बरदस्त काँटा नाना फड़नवीस
पेशवा माधोराव अभी मौजूद था। माधोजी सींधिया की हत्या
नारायण की मृत्यु के बाद महाराष्ट्र के अन्दर नाना और उसकी
नीति की क़द्र और अधिक बढ़ गई। चार्ल्स
मैलेट ने पूना से एक पत्र में लिखा कि—"जब तक पूना दरबार में
नाना का ज़ोर है, तब तक मराठा राज के अन्दर मज़बूती से अपने
पैर जमा सकने की हमें (अंग्रेज़ों को) सपने में भी आशा नहीं
करनी चाहिए।"*
नाना फड़नवीस के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों ने कई बार साज़िशें कीं,
किन्तु सफलता न मिल सकी। पेशवा माधोराव नारायण पूरी तरह
नाना के कहने में था। बिना उसे मसनद से हटाए कम्पनी को
अपनी इच्छा पूरी करने के लिए अनुकूल अवसर न मिल सकता
था। २७ अक्तूबर सन् १७९५ को कम्पनी के सौभाग्य से पेशवा
माधोराव दूसरा (माधोराव नारायण) अपने महल के छज्जे से
गिर कर मर गया। इस पेशवा की मृत्यु के सम्बन्ध में ग्रांट डफ़
लिखता है कि—"२५ अक्तूबर को सवेरे पेशवा जान बूझकर अपने
महल के एक छज्जे से कूद पड़ा, उसके दो अंगों की हड्डियाँ टूट गईं
और एक फ़व्वारे की नली से, जिसके ऊपर वह आकर पड़ा, वह
बहुत ज़ख़्मी हो गया। इसके बाद वह केवल दो दिन जिया।"†
- "As long as Nana remained Supreme at the Poona Court they (the
British) should never dream of obtaining a firm footing in the Marhatta
Kingdom." - Charles Malet.
† Grant Duff's History of the Marhattas, p. 521.
पेशवा माधोराव नारायन
[ श्री वासुदेव राव सूबेदार, सागर, की कृपा द्वारा ]
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सर जॉन शोर ४११
कोई कोई अंगरेज़ यह भी लिखते हैं कि नाना फड़नवीस से
कुछ अनबन होने की वजह से पेशवा ने इस तरह आत्महत्या कर ली।
किन्तु उस समय की तमाम परिस्थिति को देखने से यह
मालूम होता है कि नाना और पेशवा के परस्पर वैमनस्य और
आत्महत्या की यह कहानी केवल नाना के ख़िलाफ़ लोगों के कान
भरने के लिए गढ़ी गई थी। मुमकिन है कि पेशवा का छज्जे से
गिर पड़ना अकस्मात् हुआ हो, किन्तु इससे कहीं ज़्यादा मुमकिन
यह है कि पेशवा के किसी दुशमन या नमकहराम सेवक ने उसे
मौक़ा पाकर ढकेल दिया। मॉस्टिन के समय में राघोबा को पेशवा
की मसनद पर बैठाने के लिए पेशवा नारायणराव की हत्या की जा
चुकी थी; कौन आश्चर्य है यदि मैलेट के समय में राघोबा के पुत्र
बाजीराव को मसनद पर बैठाने के लिए नारायणराव के पुत्र पेशवा
माधोराव दूसरे की हत्या कराई गई हो और मैलेट तथा बाजीराव
के किसी गुप्तचर ने मौक़ा पाकर उसे छज्जे से ढकेल दिया हो !
माधोराव की पैदाइश के समय से अंगरेज़ बराबर उसके ख़िलाफ़
थे और उसकी अकाल मृत्यु से उन्हें बेहद खुशी हुई।
पेशवा माधोराव नारायण की आयु मृत्यु के समय केवल २१
साल की थी। उसके कोई लड़का न था, किन्तु
[हाशिया: अन्तिम पेशवा] हिन्दू रिवाज के अनुसार उसकी विधवा को
[हाशिया: बाजीराव] गोद लेने का अधिकार था। अंगरेज़ों ने इस
समय राघोबा के पुत्र बाजीराव को पेशवा बनाने का यत्न किया।
तुकाजी होलकर अंगरेज़ों के कहने में था। पूना पहुँच कर उसने
४१२ भारत में अंगरेज़ी राज
बाजीराव का पक्ष लिया। ग्रान्ट डफ़ लिखता है कि इस अवसर पर
नाना ने तुकाजी को पूरी तरह समझाया कि—"बाजीराव की माँ
ने शुरू से उसके दिल में तमाम पुराने अनुभवी मराठा नीतिज्ञों के
खिलाफ़ द्वेष भर दिया है, बाजीराव के ख़ानदान का अंगरेज़ों के
साथ जो सम्बन्ध है वह मराठा साम्राज्य के लिए ख़तरनाक है।
इस समय मराठा साम्राज्य के अन्दर ख़ासा ऐक्य है, चारों ओर
प्रजा खुशहाल है, और यदि इसी नीति का सावधानी के साथ
पालन होता रहा तो भविष्य में बहुत अधिक लाभ की आशा की
जा सकती है, इत्यादि।" ग्रान्ट डफ़ लिखता है कि इस तरह
समझाने से तुकाजी होलकर और दूसरे सरदार भी नाना के साथ
सहमत हो गए। नाना की तजवीज़ थी कि पेशवा माधोराव नारायन
की विधवा यशोदाबाई एक पुत्र गोद ले, जिसे सब लोग मिलकर
तय करें और वह पुत्र ही पेशवा की मसनद पर बैठे। निस्सन्देह
यह तजवीज़ हिन्दोस्तान के रिवाज के अनुकूल और मराठा मण्डल
के लिए अत्यन्त हितकर थी। किन्तु दुर्भाग्यवश नाना को सफलता
न मिल सकी।
नवम्बर सन् १७६५ में रेजिडेण्ट मैलेट ने नाना से दरयाफ़्त किया
कि मसनद का उत्तराधिकारी कौन होगा। नाना ने उत्तर दिया कि
जब तक राष्ट्र के बड़े बड़े लोग मिलकर फ़ैसला न करें, तब तक
विधवा यशोदाबाई मसनद की मालिक समझी जावेगी और फ़ैसला
हो जाने पर आपको सूचना दी जावेगी। अपने वादे के अनुसार
जनवरी सन् १७६६ में नाना ने मैलेट को सूचना दी कि यह फ़ैसला
सर जॉन शोर ४१३
हो गया है कि यशोदाबाई एक लड़के को गोद ले, केवल लड़के का
पसन्द किया जाना बाक़ी है। मैलेट को इस पर एतराज़ करने का
कोई हक़ न था। परन्तु नाना का मैलेट को समय से पहले अपनी
तजवीज़ बता देना ही एक भयंकर भूल साबित हुई।
बाजीराव उस समय क़ैद में था। मैलेट को सूचना मिलते ही
बाजीराव को ख़बर हो गई। मैलेट, बाजीराव और उसके अन्य
साथियों की साज़िशों का नतीजा यह हुआ कि नाना की तजवीज़
पूरी होने से पहले ही बाजीराव क़ैद से निकल आया और नाना
की इच्छा के ख़िलाफ़ बाजीराव के पक्ष वालों ने उसके पेशवा होने
का एलान कर दिया। बाजीराव मसनद पर बैठ गया, और बैठते
ही उसने महाराष्ट्र मण्डल के सच्चे हितचिन्तक नाना फड़नवीस
के साथ वह शत्रुता निकाली, जिसके सबब से नाना को
पहले जान बचा कर भागना पड़ा और फिर कई साल क़ैद में
काटने पड़े।
बाजीराव कायर और निर्बल साबित हुआ। नाना फड़नवीस
की पेशीनगोई उसके विषय में बिल्कुल सच्ची निकली। बाजीराव
आख़िरी पेशवा था और उसके मसनद पर बैठने के साथ
ही साथ मराठा साम्राज्य के गौरव का अन्त हो गया।
बाजीराव की अयोग्यता से अंगरेज़ों ने जिस तरह लाभ उठाकर
भारत से पेशवा सत्ता का सदा के लिए अन्त कर दिया, उसका
बयान एक दूसरे अध्याय में दिया जायगा।
निज़ाम के साथ भी सर जॉन शोर का व्यवहार न्याय या
४१४ भारत में अंग्रेज़ी राज
ईमानदारी का न था। इसका पहला परिचय निज़ाम और मराठों
की लड़ाई के समय मिला। निज़ाम और मराठों
सर जॉन शोर और का 'चौथ' के बारे में कुछ झगड़ा था। दिल्ली
निज़ाम सम्राट की आज्ञानुसार निज़ाम मराठों को
सालाना 'चौथ' दिया करता था। मराठे कहते थे कि निज़ाम की
ओर हमारी रक़म निकलती है। निज़ाम उन दिनों अंगरेज़ों और
उनकी सबसीडीयरी सेना के बल फूला हुआ था। निज़ाम दरबार
यह कहता था कि उलटा पेशवा दरबार के पास हमारे दो करोड़
साठ लाख रुपए ज़्यादा चले गए हैं। पेशवा माधोराव नारायण
का एक दूत गोविन्दराव काले हिसाब साफ़ करने के लिए निज़ाम
के दरबार में पहुँचा। निज़ाम ने मराठा दूत के साथ बड़े निरादर
का बर्त्ताव किया। मराठों और निज़ाम में युद्ध अनिवार्य हो गया।
माधोजी सींधिया की गद्दी पर इस समय उसका पौत्र दौलतराव
सींधिया बैठा हुआ था। दौलतराव वीर और समझदार था। उसने
मराठा सेना सहित निज़ाम पर चढ़ाई की। टीपू भी उस समय
निज़ाम के ख़िलाफ़ था। निज़ाम के एक मात्र साथी सर जॉन शोर
ने ऐन मौक़े पर निज़ाम को मदद देने से इनकार कर दिया। यहाँ
तक कि कम्पनी की जो सबसीडीयरी सेना निज़ाम के इलाक़े में
निज़ाम के ख़र्च पर और निज़ाम की मदद के लिए कह कर रक्खी
गई थी उसने भी इस समय निज़ाम की मदद करने से इनकार कर
दिया। नतीजा यह हुआ कि १५ मार्च सन् १७९५ का निज़ाम ने
कुर्दला की लड़ाई में मराठों से हार खाई और मराठों की सब शर्तें
सर जॉन शोर ४१५
स्वीकार कर लीं। इसके सात महीने बाद पेशवा माधोराव नारायण
की मृत्यु हुई ।
मजबूर होकर निज़ाम ने कुर्दला की लड़ाई के बाद सर जॉन
शोर को लिखा कि कम्पनी की सेना मेरे यहाँ से हटा ली जाय ।
साथ ही उसने एक फ्रान्सीसी अफ़सर मो० रेमों ( Raymond )
को अपने यहाँ दूसरी सेना तैयार करने के लिए नौकर रक्खा और
अपनी हिफ़ाज़त के लिए रेमों के अधीन कुछ सेना अपने सरहदी
इलाक़ों में नियुक्त कर दी ।
सर जॉन शोर ने तुरन्त निज़ाम की इन कार्रवाइयों पर
एतराज़ किया और हैदराबाद के रेजिडेण्ट की मारफ़त निज़ाम को
धमकी दी कि यदि आपने अपने सरहदी इलाक़ों से नई फ़ौज न
हटा ली तो कम्पनी उसके मुक़ाबले के लिए अपनी सेना रवाना
करेगी। किन्तु निज़ाम ने इन धमकियों की कुछ परवा न की ।
अंगरेज़ों को डर हो गया कि कहीं निज़ाम मराठों या टीपू के साथ
मिलकर अंगरेज़ों के विरुद्ध खड़ा न हो जावे ।
हैदराबाद के अंगरेज़ रेज़िडेण्ट ने तुरन्त निज़ाम के एक पुत्र
आलीजाह को भड़काया। आलीजाह ने अपने पिता के ख़िलाफ़
बग़ावत खड़ी कर दी। बेटे को वश में करने के लिए निज़ाम को
सरहदी इलाक़े से अपनी फ़ौज वापस बुलानी पड़ी। आलीजाह
क़ैद कर लिया गया और बग़ावत शान्त हो गई। किन्तु निज़ाम
इस छोटी सी घटना से इतना डर गया कि उसने कम्पनी की
फ़ौज को फिर अपने यहाँ रखना स्वीकार कर लिया और उसकी
४१६ भारत में अंगरेज़ी राज
अपनी सेना के विषय में जो जो शर्तें अंगरेज़ों ने पेश कीं, सब
मान लीं।
सर जॉन शोर ने अब रेमों को निज़ाम की सेना से निकलवा
दिया और दो अंगरेज़ अफ़सर उस सेना को तालीम देने के लिए
हैदराबाद भेजे। रेमों होशियार और वफ़ादार था, ये दोनों अंगरेज़
अयोग्य निकले, फिर भी निज़ाम को सर जॉन शोर की इच्छा पूरी
करनी पड़ी। इसके बाद ज़िन्दगी भर निज़ाम अंगरेज़ों का विनीत
और आज्ञाकारी सेवक बना रहा और कम्पनी को अपने राज के
क़ायम करने में निज़ाम के कुल से हमेशा खूब मदद मिलती रही।
दक्खिन की एक दूसरी मुसलिम रियासत, जिससे सर जॉन
शोर को वास्ता पड़ा, करनाटक की रियासत
[हाशिया: नवाब करनाटक] थी। करनाटक ही के नवाब को अरकाट का
[हाशिया: के नाम ज़बरदस्ती] नवाब भी कहते थे। एक पिछले अध्याय में आ
[हाशिया: के क़र्ज़] चुका है कि करनाटक के नवाब मोहम्मदअली से
अंगरेज़ों को कितना फ़ायदा पहुँचाता था, उससे किस प्रकार तरह
तरह से धन वसूल किया जाता था और किस प्रकार कम्पनी के
नौकरों की माँगों को पूरा करने के लिए वह कुछ अंगरेज़ व्यापारियों
ही के क़र्ज़ों में बेतरह दबा हुआ था।
अरकाट के नवाब के क़र्ज़ों का हाल इङ्गलिस्तान के मन्त्रियों
और वहाँ की पार्लिमेण्ट के कानों तक भी पहुँच चुका था। इन
क़र्ज़ों में कितने ही क़र्ज़े साफ़ ज़बरदस्ती और बेईमानी के थे और
सूद दर सूद, बट्टे इत्यादि के हिसाब से बराबर बढ़ते चले जाते
सर जॉन शोर ४१७
थे । अनेक बार पार्लिमेण्ट में इन क़र्ज़ों के विषय में पूछ ताछ की
गई । किन्तु इंगलिस्तान के मन्त्री बराबर टालमटोल और तरह तरह
की चालाकियों से काम लेते रहे। मिसाल के लिए नवाब को
क़र्ज़ देने वालों में एक अंगरेज़ पाल बेन्फ़ील्ड भी था। किन्तु
क़र्ज़ख़ाहों की जो सूचियाँ समय समय पर पार्लिमेण्ट के सामने
पेश की जाती थीं उनमें बेन्फ़ील्ड का नाम कभी उड़ा दिया जाता
था और कभी फिर जोड़ दिया जाता था। बात यह थी कि
बेन्फ़ील्ड और उसके अनेक साथियों ने पार्लिमेण्ट के चुनाव के
समय मन्त्रिमण्डल का पक्ष लेने वाले सदस्यों को चुनवा कर भेजने
में खूब धन ख़र्च किया था और मन्त्रियों के मुंह बन्द कर दिए
थे ।* पार्लिमेण्ट के अन्दर भी क़ुदरती तौर पर उस समय के
मन्त्रियों ही का प्रभाव था।
इसी सम्बन्ध में इतिहास लेखक विलियम हाविट लिखता है—
“जिस ढङ्ग से यातनाएँ दे देकर भारतीय नरेशों की रियासतें उनसे
ज़बरदस्ती छीनी गई हैं वह यह है कि चालबाज़ लोगों ने पहले तो बड़ी
होशियारी के साथ उन नरेशों को अपना क़र्ज़दार बनाया और फिर उन्हें अपनी
अत्यन्त बेजा माँगों के सामने तुरन्त सर झुकाने के लिए विवश कर दिया।”†
१३ अक्तूबर सन् १७६५ को ७६ साल की आयु में नवाब
- Thornton in his History of British India, 2nd Edition 1859, pp. 181,
† “What then is this system of torture by which the possessions of the
Indian Princes have been wrung from them? It is this—the skilful applica-
tion of the process by which cunning men creat debtors, and then force
२७
४१८ भारत में अंगरेज़ी राज
मोहम्मदअली की मृत्यु हुई । उसका बेटा नवाब उमदतुल उमरा
करनाटक की मसनद पर बैठा और बाप के झूठे और अनसुने कर्ज़े
उसे उत्तराधिकार में मिले।
लॉर्ड कॉर्नवालिस के समय में कम्पनी और मोहम्मदअली के
दरमियान एक सन्धि हो चुकी थी, जिससे करनाटक की सेना का
सारा प्रबन्ध अंगरेज़ों के हाथों में आ गया था और करनाटक के
कुछ ज़िले इन कर्ज़ों के बदले में नवाब से रहन रखा लिए गए थे।
उमदतुल उमरा के मसनद पर बैठते ही मद्रास के गवर्नर ने उस
पर ज़ोर दिया कि आप रहन रक्खे हुए ज़िले और कुछ और क़िले
सदा के लिए कम्पनी को दे दें । २८ अक्तूबर सन् १७९५ को सर
जॉन शोर ने मद्रास के गवर्नर को लिखा—"आप नए नवाब को
इस बात पर राज़ी कीजिये कि वह अपनी तमाम रियासत कम्पनी
के सुपुर्द कर दे।" नवाब उमदतुल उमरा ने मद्रास के गवर्नर की
कोई बात मंजूर न की और कम से कम उस समय इस चाल से
करनाटक का कोई हिस्सा कम्पनी की अमलदारी में न आ सका।
किन्तु करनाटक की ओर अंगरेज़ों की नीयत बिल्कुल ज़ाहिर
हो गई।
सन् १७९४ में रुहेलखण्ड के नवाब फ़ैजुल्ला ख़ाँ की मृत्यु हुई ।
रुहेलखण्ड उसका छोटा बेटा गुलाम मोहम्मद अपने बड़े भाई
आली ख़ाँ को मार कर बाप की गद्दी पर बैठा ।
them at once to submit to their most exorbitant demands."-William How
as quoted in the introduction to Thornton's History of British India.