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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 695

४१६ भारत में अंगरेज़ी राज
अपनी सेना के विषय में जो जो शर्तें अंगरेज़ों ने पेश कीं, सब
मान लीं।
सर जॉन शोर ने अब रेमों को निज़ाम की सेना से निकलवा
दिया और दो अंगरेज़ अफ़सर उस सेना को तालीम देने के लिए
हैदराबाद भेजे। रेमों होशियार और वफ़ादार था, ये दोनों अंगरेज़
अयोग्य निकले, फिर भी निज़ाम को सर जॉन शोर की इच्छा पूरी
करनी पड़ी। इसके बाद ज़िन्दगी भर निज़ाम अंगरेज़ों का विनीत
और आज्ञाकारी सेवक बना रहा और कम्पनी को अपने राज के
क़ायम करने में निज़ाम के कुल से हमेशा खूब मदद मिलती रही।
दक्खिन की एक दूसरी मुसलिम रियासत, जिससे सर जॉन
शोर को वास्ता पड़ा, करनाटक की रियासत
[हाशिया: नवाब करनाटक] थी। करनाटक ही के नवाब को अरकाट का
[हाशिया: के नाम ज़बरदस्ती] नवाब भी कहते थे। एक पिछले अध्याय में आ
[हाशिया: के क़र्ज़] चुका है कि करनाटक के नवाब मोहम्मदअली से
अंगरेज़ों को कितना फ़ायदा पहुँचाता था, उससे किस प्रकार तरह
तरह से धन वसूल किया जाता था और किस प्रकार कम्पनी के
नौकरों की माँगों को पूरा करने के लिए वह कुछ अंगरेज़ व्यापारियों
ही के क़र्ज़ों में बेतरह दबा हुआ था।
अरकाट के नवाब के क़र्ज़ों का हाल इङ्गलिस्तान के मन्त्रियों
और वहाँ की पार्लिमेण्ट के कानों तक भी पहुँच चुका था। इन
क़र्ज़ों में कितने ही क़र्ज़े साफ़ ज़बरदस्ती और बेईमानी के थे और
सूद दर सूद, बट्टे इत्यादि के हिसाब से बराबर बढ़ते चले जाते