भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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ईमानदारी का न था। इसका पहला परिचय निज़ाम और मराठों
की लड़ाई के समय मिला। निज़ाम और मराठों
सर जॉन शोर और का 'चौथ' के बारे में कुछ झगड़ा था। दिल्ली
निज़ाम सम्राट की आज्ञानुसार निज़ाम मराठों को
सालाना 'चौथ' दिया करता था। मराठे कहते थे कि निज़ाम की
ओर हमारी रक़म निकलती है। निज़ाम उन दिनों अंगरेज़ों और
उनकी सबसीडीयरी सेना के बल फूला हुआ था। निज़ाम दरबार
यह कहता था कि उलटा पेशवा दरबार के पास हमारे दो करोड़
साठ लाख रुपए ज़्यादा चले गए हैं। पेशवा माधोराव नारायण
का एक दूत गोविन्दराव काले हिसाब साफ़ करने के लिए निज़ाम
के दरबार में पहुँचा। निज़ाम ने मराठा दूत के साथ बड़े निरादर
का बर्त्ताव किया। मराठों और निज़ाम में युद्ध अनिवार्य हो गया।
माधोजी सींधिया की गद्दी पर इस समय उसका पौत्र दौलतराव
सींधिया बैठा हुआ था। दौलतराव वीर और समझदार था। उसने
मराठा सेना सहित निज़ाम पर चढ़ाई की। टीपू भी उस समय
निज़ाम के ख़िलाफ़ था। निज़ाम के एक मात्र साथी सर जॉन शोर
ने ऐन मौक़े पर निज़ाम को मदद देने से इनकार कर दिया। यहाँ
तक कि कम्पनी की जो सबसीडीयरी सेना निज़ाम के इलाक़े में
निज़ाम के ख़र्च पर और निज़ाम की मदद के लिए कह कर रक्खी
गई थी उसने भी इस समय निज़ाम की मदद करने से इनकार कर
दिया। नतीजा यह हुआ कि १५ मार्च सन् १७९५ का निज़ाम ने
कुर्दला की लड़ाई में मराठों से हार खाई और मराठों की सब शर्तें