भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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बाजीराव का पक्ष लिया। ग्रान्ट डफ़ लिखता है कि इस अवसर पर
नाना ने तुकाजी को पूरी तरह समझाया कि—"बाजीराव की माँ
ने शुरू से उसके दिल में तमाम पुराने अनुभवी मराठा नीतिज्ञों के
खिलाफ़ द्वेष भर दिया है, बाजीराव के ख़ानदान का अंगरेज़ों के
साथ जो सम्बन्ध है वह मराठा साम्राज्य के लिए ख़तरनाक है।
इस समय मराठा साम्राज्य के अन्दर ख़ासा ऐक्य है, चारों ओर
प्रजा खुशहाल है, और यदि इसी नीति का सावधानी के साथ
पालन होता रहा तो भविष्य में बहुत अधिक लाभ की आशा की
जा सकती है, इत्यादि।" ग्रान्ट डफ़ लिखता है कि इस तरह
समझाने से तुकाजी होलकर और दूसरे सरदार भी नाना के साथ
सहमत हो गए। नाना की तजवीज़ थी कि पेशवा माधोराव नारायन
की विधवा यशोदाबाई एक पुत्र गोद ले, जिसे सब लोग मिलकर
तय करें और वह पुत्र ही पेशवा की मसनद पर बैठे। निस्सन्देह
यह तजवीज़ हिन्दोस्तान के रिवाज के अनुकूल और मराठा मण्डल
के लिए अत्यन्त हितकर थी। किन्तु दुर्भाग्यवश नाना को सफलता
न मिल सकी।
नवम्बर सन् १७६५ में रेजिडेण्ट मैलेट ने नाना से दरयाफ़्त किया
कि मसनद का उत्तराधिकारी कौन होगा। नाना ने उत्तर दिया कि
जब तक राष्ट्र के बड़े बड़े लोग मिलकर फ़ैसला न करें, तब तक
विधवा यशोदाबाई मसनद की मालिक समझी जावेगी और फ़ैसला
हो जाने पर आपको सूचना दी जावेगी। अपने वादे के अनुसार
जनवरी सन् १७६६ में नाना ने मैलेट को सूचना दी कि यह फ़ैसला