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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

३६० भारत में अंग्रेज़ी राज
पहचान जाता था, रँगरूटों को केवल चेहरे से देखकर भरती कर
लेता था। घोड़ों और जवाहरात की भी उसे गज़ब की पहचान थी।
हैदरअली वीर था और वीरता की बड़ी क़द्र करता था। अपने
[हाशिया: वीरता और सादगी] सिपाहियों के साथ उसका व्यवहार अत्यन्त
प्रेम, उदारता और बराबरी का रहता था।
जिन्हें वह युद्ध में हरा देता था उनके साथ भी
उसका व्यवहार सदा दया और उदारता का होता था। इतना बड़ा
नरेश होने पर भी उसमें घमण्ड या अभिमान का निशान तक न
था। अपने राज को वह सदा 'खुदादाद' कहा करता था। अपने
दरबारों तक में वह मामूली सिपाहियों के साथ बराबरी का
व्यवहार करता था। स्वयं एक मामूली सिपाही का सा जीवन
व्यतीत करता था। भोजन जो सामने आता खा लेता था। सफ़र
में वह अक्सर भुने हुए चने, बादाम और ज्वार की सूखी रोटी या
इनमें से जो सामने आ जावे खाकर रह जाता था। अपने तख़्त पर
वह ज़्यादा से ज़्यादा साल में एक बार ईद के दिन चन्द घण्टे के
लिए बैठता था और वह भी दूसरों की प्रार्थना पर।
हैदरअली का क़द मँझोला था, उसका रंग साँवला था।
किन्तु उसके शरीर की बनावट सुन्दर थी।
[हाशिया: हैदरअली का शारीरिक बल] वह मज़बूत और निहायत फुर्तीला था। वह
घोड़े का बहुत अच्छा सवार था। पैदल लम्बे
सफ़र करने का भी उसे बेहद शौक़ था और आदत थी। सप्ताह
में दो बार वह अपने सर, दाढ़ी और मूंछों के बाल मुंडवा

देता था। दाढ़ी और मूंछें वह इतनी साफ़ रखता था कि नकचुटनी
से एक एक बाल निकलवा देता था। उसकी देखादेखी उसके
अधिकतर दरबारी भी दाढ़ी न रखते थे और मूंछें यदि रखते थे
तो इतनी कम कि जो दूर से दिखाई न देती थीं। हैदरअली को
लाल कपड़ों का शौक़ था और अपने सर पर वह एक सौ हाथ
लम्बी लाल पगड़ी बाँधता था।
शिकार का और ख़ास कर शेर के शिकार का उसको बड़ा
शौक़ था। उसके यहाँ अनेक शेर पले हुए थे जो
शेर पालना रोज़ सुबह खुले हुए उसके सामने लाए जाते
थे। हैदरअली अपने हाथ से इन शेरों को लड्डू खिलाया करता
था। उनके पञ्जों और जबड़ों में वह लड्डू दे देता था। लिखा है
कि उसका निशाना कभी चूकता न था। अपने सामने अखाड़े
में वह अक्सर शेर के साथ अपने किसी एक वीर सिपाही की
कुश्ती कराया करता था। यदि सिपाही शेर को पछाड़ पाता तो
उसे इनाम-ओ-इकराम दिए जाते थे और यदि शेर हावी होने
लगता, तो हैदर फ़ौरन दूर से बैठा हुआ शेर की कनपटी पर गोली
मार देता और इससे पहले कि शेर का पञ्जा सिपाही पर पड़
सके, शेर गोली खाकर गिर पड़ता था।
हैदरअली के शारीरिक परिश्रम और कष्ट सहन की कोई सीमा
न थी। वह कई कई रातें जंगल में बारिश और
हैदरअली का कष्ट सरदी के अन्दर घोड़े की पीठ पर गुज़ार देता
सहन था। घोड़ों, हाथियों, तोपों और रसायण का

३६२ भारत में अंगरेज़ी राज
उसे ख़ास शौक़ था । उसके एक प्यारे हाथी का नाम 'पवनगज'
था जिसके मरने पर हैदरअली ने बड़ा दुख मनाया । घोड़े ख़रीदने
का उसे इतना अधिक शौक़ था कि दूर दूर के मुल्कों से घोड़े के
सौदागर उसके दरबार में पहुँचते थे और यदि किसी सौदागर
का घोड़ा उसके राज के अन्दर मर जाता और सौदागर अपने
घोड़े की अयाल और दुम काट कर स्थानीय कर्मचारी की सनद के
साथ हैदरअली के दरबार में पेश करता तो घोड़े की आधी क़ीमत
उसे ख़ज़ाने से दिलवा दी जाती थी ।
इन सब बातों के अलावा हैदरअली अंगरेज़ों का कट्टर शत्रु
[पार्श्व शीर्षक: हैदरअली और] था । अंगरेज़ों के लिए उसका नाम एक 'हव्वा'
[पार्श्व शीर्षक: अंगरेज़] था । गोकि हैदरअली की नीतिज्ञता नाना फड़-
नवीस के टक्कर की न थी, सब से बड़ी ग़लती
उसकी यह थी कि अपनी सेना के अनेक बड़े बड़े ओहदों पर
उसने फ़्रान्सीसीयों को नियुक्त कर रक्खा था, जिसका फल उसकी
मृत्यु के बाद उसके बेटे टीपू सुलतान को भोगना पड़ा, फिर भी
इसमें सन्देह नहीं कि अपने जीवन भर अंगरेज़ों को भारत से
निकालने का हैदर ने जी तोड़ प्रयत्न किया। वह जब तक जिया,
अजेय रहा और अन्त में इसी प्रयत्न में उसने अपनी जान दी।
हम ऊपर लिख चुके हैं कि जिस समय गायकवाड़, सींधिया और
भोंसले तीन तीन ज़बरदस्त मराठा नरेश महाराष्ट्र मण्डल और
अपने देश दोनों के साथ विश्वासघात कर चुके थे, और निज़ामुल
मुल्क भी अंगरेज़ों के साथ मिलकर अपने साथियों और मुल्क

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हैदरअली ३६३

दोनों को दग़ा दे चुका था, उस समय नाना फ़ड़नवीस और
भारत की स्वाधीनता दोनों की आशा का एकमात्र आधार वीर
हैदरअली था। इतना ही नहीं, बल्कि जिस समय नाना फ़ड़नवीस
भी अपनी सन्धि के अनुसार हैदरअली की मदद करने के नाक़ाबिल
हो गया और निज़ाम ने अपना वादा साफ़ तोड़ दिया, उस समय
अंगरेज़ों की पूरी शक्ति के मुक़ाबले का सारा बोझ अकेले हैदरअली
के कन्धों पर पड़ा। इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि हैदरअली ने
आश्चर्यजनक साहस और सफलता के साथ अकेले इस बोझ को
बरदाश्त किया, और यदि भवितव्यता बीच में न पड़ती, यदि
ठीक उस समय जब कि भारत में अंगरेज़ों के हाथ पाँव बिलकुल
फूल चुके थे, मौत भारतीय स्वाधीनता के उस अन्तिम आधार
को उठा कर न ले गई होती, तो उसके बाद का भारत और अंगरेज़
जाति दोनों का इतिहास बिलकुल दूसरे ही ढंग से लिखा गया
होता। हैदरअली के बाद फिर ७५ साल तक भारत के पुत्रों को
अपनी स्वाधीनता के लिए उस तरह का व्यापक प्रयत्न करने का
साहस न हो सका। निस्सन्देह भारत की आज़ादी के लिए प्रयत्न
करने वालों में हैदरअली का पद सर्वोपरि है और आज़ादी के
चाहने वालों में उसका नाम सदा के लिए ज़िन्दा रहेगा।

दसवाँ अध्याय
सर जॉन मैकफ़रसन
वारन हेस्टिंग्स के बाद कलकत्ते की कौन्सिल का प्रमुख सदस्य
नवाब मोहम्मदअली सर जॉन मैकफ़रसन अस्थायी तौर पर कम्पनी
को इंगलिस्तान के के भारतीय इलाक़ों का गवरनर जनरल नियुक्त
बादशाह की हुआ। मैकफ़रसन के समय में कोई ख़ास
भेंट लिखने योग्य घटना नहीं हुई; किन्तु उसका
चरित्र ख़ासा मनोरञ्जक था।
मैकफ़रसन सबसे पहले सन् १७६७ में किसी जहाज़ का
बख़्शी (पेमास्टर) नियुक्त होकर हिन्दोस्तान आया। वह ख़ासा
पढ़ा लिखा और चलता पुर्ज़ा था। इस पुस्तक के पहले अध्याय
में आ चुका है कि करनाटक की गद्दी के ऊपर अंगरेज़ों, फ़्रांसीसियों
और निज़ाम ने अलग अलग हक़दारों का पक्ष लेकर काफ़ी लड़ाइयाँ

सर जॉन मैकफ़रसन ३६५

लड़ीं। अन्त में अंगरेज़ों की सहायता से मोहम्मदअली करनाटक
का नवाब बना। इस सहायता के बदले में मोहम्मदअली ने
अंगरेज़ों को साढ़े चार लाख पैगोदा यानी क़रीब १६ लाख
रुपए सालाना का इलाक़ा अता किया। शुरू में अंगरेज़ नवाब
मोहम्मदअली का बड़ा आदर करते थे। यहाँ तक कि एक बार
मोहम्मदअली ने एक पत्र कुछ उपहारों और भेंट सहित इंगलिस्तान
के बादशाह तीसरे जॉर्ज के पास भेजा और उसके जवाब में
बादशाह जॉर्ज ने अपने हाथ से लिखकर एक अत्यन्त आदर और
प्रेम का पत्र और उसके साथ बतौर नज़ऱाने के दो बढ़िया पिस्तौल
और बतौर नमूने के कुछ इंग्लिस्त[ान का] बना कपड़ा मोहम्मदअली
के पास भेजा।
किन्तु थोड़े ही दिनों में ठीक वही सलूक मोहम्मदअली के साथ
(हाशिया: मोहम्मदअली के साथ कम्पनी की ज़्यादतियाँ) होने लगा जो उत्तर में अवध के नवाबों के साथ
हो रहा था। धन की नित्य नई माँगें उसके
सामने पेश की जाती थीं और जबरन् पूरी कराई
जाती थीं। मिसाल के लिए यह एक प्रथा पड़
गई थी कि मोहम्मदअली मद्रास के हर नए गवर्नर को अपने यहाँ
दावत करे और उसे तीस हज़ार पैगोदा नज़र करे। कम्पनी के
छोटे मोटे नौकरों की माँगें भी मोहम्मदअली के ऊपर नित्य बढ़ती
गईं, यहाँ तक कि जब अरकाट का ख़ज़ाना ख़ाली हो गया तो
कुछ अंगरेज़ व्यापारियों ने ही अपने दूसरे देशवासियों की माँगें
पूरी करने के लिए मोहम्मदअली को क़र्ज़ देने शुरू किए। लाचार

३६६ भारत में अंगरेज़ी राज
होकर मोहम्मदअली अंगरेज़ों की मांगें भी पूरी करता रहा और
यूरोपियन व्यापारियों का दिन पर दिन क़र्ज़दार भी होता चला
गया। कम्पनी के नौकरों के इन अत्याचारों से बचने का उसे कोई
उपाय न सूझता था।
ऐसी हालत में नौजवान मैकफ़रसन गवरनर जनरल होने से
बहुत दिनों पहले अरकाट पहुँचा। उसने नवाब मोहम्मदअली से
मिलकर उसे यह पट्टी पढ़ाई कि यदि आप मुझे अपनी ओर से
वकील बनाकर इंगलिस्तान भेज दें तो वहाँ के मन्त्रियों से कह कर
मैं आपकी सब शिकायतें दूर करा दूँ और क़र्ज़े माफ़ करा दूँ। भोले
नवाब ने मंज़ूर कर लिया। मैकफ़रसन उसका वकील बनकर सन्
१७६८ में इंगलिस्तान पहुँचा। इस चाल से मैकफ़रसन ने मोहम्मद
अली को खूब जी भर के लूटा। यहाँ तक कि उसने कई लाख
रुपए इंगलिस्तान के प्रधान मन्त्री तक को रिश्वत देना चाहा।
और जब प्रधान मन्त्री ने यह रिश्वत स्वीकार न की, तो मैकफ़रसन
ने उसे ७० लाख रुपए से ऊपर क़र्ज़ (?) के तौर पर देना चाहा।
किन्तु लिखा है कि प्रधान मन्त्री ने इसे भी मंज़ूर न किया।
करनाटक के नवाब की शिकायतें तो इंगलिस्तान में कौन सुनता
था और कहाँ दूर हो सकती थीं, किन्तु इन तरीक़ों से मैकफ़रसन
ने कम्पनी के डायरेक्टरों और इंगलिस्तान के मन्त्रियों पर अपना
ख़ूब असर जमा लिया। वह फिर कम्पनी की नौकरी में भारत भेजा
गया और तरक़्क़ी करके पहले कलकत्ते की कौंसिल का मेम्बर
और फिर मौक़ा मिलने पर गवरनर जनरल बना दिया गया।

सर जान मैकफ़रसन ३६७
इसके बाद मैकफ़रसन का नवाब करनाटक की मुसीबतों की ओर
कभी ध्यान भी न गया।
मैकफ़रसन केवल बीस महीने गवरनर जनरल रहा। इससे
पहले कम्पनी अपने भारतीय इलाक़ों के लिए
मैकफ़रसन के
कृत्य और चरित्र दिल्ली सम्राट शाहआलम को ख़िराज दिया करती
थी। इस ख़िराज के चार करोड़ रुपए अब
कम्पनी की ओर निकलते थे। माधोजी (महादजी) सींधिया ने
सम्राट की तरफ़ से यह रक़म तलब की, किन्तु मैकफ़रसन ने देने
से इनकार कर दिया। अवध के नवाब को मैकफ़रसन ने अपने से
पहले के गवरनर जनरल के समान खूब चूसा। मैकफ़रसन के बाद
उसके उत्तराधिकारी लॉर्ड कॉर्नवालिस ने ८ अगस्त सन् १७८६ को
कलकत्ते से इंगलिस्तान के भारत मन्त्री हेनरी डण्डाश के नाम एक
गुप्त पत्र लिखा, जिसमें कॉर्नवालिस ने मैकफ़रसन के "नाजायज़
तरीक़ों से कमाए हुए धन" उसकी "साफ़ चालबाज़ियों", उसके
"निर्लज्ज झूठों", उसकी "दुरंगी चालों और कमीनी साज़िशों"*
का जगह जगह ज़िक्र किया है।
भारत से लौटकर मैकफ़रसन पार्लिमेण्ट की मेम्बरी के लिए
खड़ा हुआ। चुनाव में वह जीत गया। बाद में साबित हुआ कि
वह रिश्वतें देकर जीता है और उसका चुनाव रद्द कर दिया गया।

  • ". . . ill earned money . . . His flimsy cunning and shameless
    falsehoods . . . his duplicity and low intrigues . . ."-Lord Cornwallis'
    letter dated 8th August 1789 to the Rt. Hon'ble Henry Dundas concerning
    Sir John Macpherson.

३६८ भारत में अंगरेज़ी राज
उसके क़रीब ६० मददगारों को रिश्वतें देने के जुर्म में सज़ाएँ
मिलीं । स्वयं मैकफ़रसन पर ८२ नालिशें दायर हुईं । जवाबदेही से
बचने के लिए वह इंगलिस्तान छोड़कर कहीं भाग गया । अन्त में
रिश्वत देने ही के जुर्म में उस पर तीन हज़ार पाउण्ड जुर्माना हुआ ।
भारत के अनेक गवर्नर जनरलों में से एक के चरित्र का यह
थोड़ा सा ख़ाका है ।

ग्यारहवाँ अध्याय
लॉर्ड कॉर्नवालिस
[ १७८६-१७९३ ]
सर जॉन मैकफ़रसन केवल अस्थायी गवरनर जनरल था।
उसके बाद कम्पनी के डाइरेक्टरों और
[गवरनर जनरल के नए अधिकार] इंगलिस्तान के मन्त्रियों ने मिल कर लॉर्ड
कॉर्नवालिस को अपने भारतीय इलाक़ों का
स्थायी गवरनर जनरल नियुक्त करके भेजा।
कम्पनी के सन् १७७३ के चार्टर ऐक्ट के अनुसार वारन
हेस्टिंग्स ब्रिटिश भारत का पहला गवरनर जनरल नियुक्त हुआ
था। उसी क़ानून के अनुसार कलकत्ते में गवरनर जनरल की मदद
के लिए चार और अंगरेज़ों की एक कौन्सिल होती थी, जिसका
प्रधान खुद गवरनर जनरल होता था। कौन्सिल में जो बात कसरत
२४

३७० भारत में अंगरेज़ी राज
राय से तय हो जाती थी, गवरनर जनरल के लिए उसका मानना
ज़रूरी था । यही हालत मद्रास और बम्बई के गवरनरों की भी थी ।
इस नियम की वजह से वारन हेस्टिंग्स की चालों में कई बार
बाधाएँ पड़ीं । जिस तरह की अंगरेज़ी नीति उस समय भारत में
जारी थी, उसके लिए गवरनर जनरल के हाथों में पूरे अधिकार
का होना ज़रूरी था । इसलिए कॉर्नवालिस के इंगलिस्तान से चलने
से पहले पार्लिमेण्ट ने एक नया क़ानून पास किया, जिसमें कलकत्ते
के गवरनर जनरल और मद्रास और बम्बई के गवरनरों को यह
अधिकार दे दिया कि वे जिस मामले में चाहें अपनी कौन्सिलों
की राय के ख़िलाफ़ या कौन्सिलों से बिना पूछे काम कर सकते हैं ।
इसके अलावा भारत में अंगरेज़ों का इलाक़ा बढ़ता जा रहा था ।
इसलिए इस इलाक़े के शासन को चलाने के लिए अब इंगलिस्तान
में एक नया सरकारी बोर्ड, जिसे 'बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल' कहते हैं,
बना दिया गया । इससे धीरे धीरे कम्पनी के यानी डाइरेक्टरों के
अधिकार कम होते गए और ब्रिटिश भारत की हुकूमत इंगलिस्तान
की पार्लिमेण्ट और वहाँ के मन्त्रि मण्डल के हाथों में आती गई ।
इस तरह नए अधिकार लेकर भारत का तीसरा अंगरेज़ गवरनर
जनरल सितम्बर सन् १७८६ में भारत पहुँचा ।
कॉर्नवालिस के समय की सबसे बड़ी घटना हैदरअली के बड़े
टीपू और अंगरेज़ बेटे और वारिस टीपू सुलतान के साथ अंगरेज़ों
का युद्ध था, जिसे दूसरा मैसूर युद्ध कहा
जाता है ।

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७१
टीपू का जन्म सन् १७४६ ईसवी में हुआ । लिखा है कि एक
मुसलमान फ़क़ीर टीपू मस्तान औलिया के आशीर्वाद से हैदरअली
के यहाँ इस पुत्र का जन्म हुआ । इसीलिए उसका नाम फ़तहअली
टीपू रक्खा गया । इतिहास में वह टीपू सुलतान के नाम से मशहूर
हुआ । पराक्रम और युद्ध कौशल में टीपू अपने बाप के मुक़ाबले का
था । उसकी शुमार भारत के बल्कि संसार के ऊँचे से ऊँचे वीरों
में की जाती है। टीपू के चरित्र का अधिक दिग्दर्शन एक अगले
अध्याय में किया जायगा, यहाँ पर केवल कॉर्नवालिस और टीपू के
युद्ध को बयान कर देना ज़रूरी है ।
सन् १७८४ में टीपू और कम्पनी के बीच सन्धि हो चुकी थी,
[हाशिया: टीपू से अंगरेज़ों] जिसमें कम्पनी ने टीपू सुलतान को मैसूर का
[हाशिया: को डर] न्याय्य अधिपति स्वीकार कर लिया था और
वादा किया था कि आइन्दा हम कभी मैसूर के
राज में दख़ल न देंगे और टीपू सुलतान के साथ सदा मित्रता
क़ायम रक्खेंगे । तब से अब तक टीपू ने अपनी ओर से सन्धि का
ठीक ठीक पालन किया था और अंगरेज़ों के साथ कभी किसी
तरह की छेड़छाड़ न की थी । किन्तु टीपू और उसके पिता हैदर
के हाथों जो हार पर हार और ज़िल्लत पर ज़िल्लत अंगरेज़ों को
उठानी पड़ी थी वह हर अंगरेज़ के दिल में काँटे की तरह खटक रही
थी । बाप के मरने के बाद क़रीब एक साल तक जिस शान और
सफलता के साथ टीपू ने अंगरेज़ों के साथ युद्ध जारी रक्खा,
उसकी वजह से उन दिनों टीपू का नाम सुनकर अंगरेज़ चौंक उठते

३७२ भारत में अंगरेज़ी राज
थे। पादरी डब्ल्यू० एच० हटन लिखता है कि अंगरेज़ माताएँ टीपू
का नाम ले लेकर अपने शरीर बच्चों को चुप कराती थीं ।*
इसके अलावा टीपू के साथ कम्पनी के युद्ध छेड़ने की एक और
ज़बरदस्त वजह थी। अमरीका की 'संयुक्त रियासतें' किसी समय
इंगलिस्तान के अधीन थीं। किन्तु वहाँ के बाशिन्दे अधिकतर
यूरोप ही के अलग अलग देशों से जाकर बसे थे। उन्होंने अपनी
आज़ादी के लिए युद्ध किया। भयङ्कर रक्तपात हुआ। अन्त में
इंगलिस्तान हारा और अमरीका की 'संयुक्त रियासतें' सदा के लिए
ब्रिटिश साम्राज्य से अलग और आज़ाद हो गईं। इंगलिस्तान की
कीर्ति को इस घटना से ख़ासा धक्का पहुँचा। तुरन्त इंगलिस्तान के
शासकों ने अपनी क़ौम के यश को फिर से क़ायम करने और इस
कमी को पूरा करने के लिए हिन्दोस्तान में अपना राज बढ़ाने का
फैसला किया। लॉर्ड कॉर्नवालिस को जो हिदायतें देकर भारत
भेजा गया, उनमें से एक यह थी कि जितनी जल्दी हो सके भारत
में अमरीका की कमी को पूरा करने का यत्न किया जाय। ये सब
बातें उस समय के सरकारी पत्र व्यवहार में बिलकुल स्पष्ट हैं।
कॉर्नवालिस ने भारत पहुँचते ही टीपू के साथ युद्ध की तैयारी
[पार्श्व टिप्पणी: · टीपू के साथ युद्ध की तैयारी] शुरू कर दी। टीपू एक वीर और सुयोग्य शासक
था। उसने अपनी प्रजा के साथ कभी बुरा
व्यवहार नहीं किया। उसके राज में चारों ओर
वह उन्नति और खुशहाली नज़र आती थी जो उस समय के ब्रिटिश


  • Marquess of Wellesley, p. 32.

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७३
भारतीय इलाके में कहीं देखने को भी न मिलती थी। किन्तु टीपू
नातजरुबेकार था। विदेशियों से देश को कितना ख़तरा था, और
उस ख़तरे को दूर करने के लिए अपने भारतीय पड़ोसियों से मेल
बनाए रखने की कितनी ज़रूरत थी इन दोनों चीज़ों को वह अभी पूरी
तरह न समझ पाया था। कुछ सरहदी इलाक़ों के बारे में मराठों
और निज़ाम दोनों से उसके झगड़े चले आते थे, जिनमें ज़्यादती
चाहे किसी की भी रही हो, इसमें सन्देह नहीं टीपू अपने पड़ोसियों
के साथ उस तरह का प्रेम और मेल क़ायम न रख सका, जिस
तरह का हैदर ने रख रक्खा था। निज़ाम और मराठों के साथ टीपू
के इन आपसी झगड़ों से ही क[म्पनी] को टीपू के ख़िलाफ़ सबसे
ज़्यादा मदद मिली। कॉर्नवालिस ने सबसे पहले टीपू के विरुद्ध
निज़ाम के साथ एक नया समझौता किया। इस समझौते का
मतलब यह था कि कम्पनी की वह सबसीडीयरी सेना जो निज़ाम
के यहाँ निज़ाम के ख़र्च पर रक्खी गई थी, टीपू पर हमला करने के
लिए काम में लाई जा सकेगी, और निज़ाम टीपू पर हमला करने
में अंगरेज़ों को मदद देगा।*
इस दरमियान टीपू और मराठों में सुलह सफ़ाई की बातचीत
[हाशिया: मराठों और निज़ाम] हो रही थी, और यदि कॉर्नवालिस बीच में
[हाशिया: को टीपू के ख़िलाफ़] बाधा न डालता तो निस्सन्देह सुलह हो ही
[हाशिया: फोड़ना] गई थी। किन्तु कॉर्नवालिस खूब जानता था
कि टीपू को वश में करना अकेले अंगरेज़ों और
* Historical Sketches, by Colonel Wilks, vol. iii. p. 38.

३७४ भारत में अंगरेज़ी राज
निज़ाम के बूते का काम नहीं है। यह ख़बर पाते ही कि टीपू और
मराठों में सुलह हो रही है, कॉर्नवालिस ने फ़ौरन २३ अक्तूबर सन्
१७८७ को अपने एक अफ़सर जॉर्ज फ़ॉर्सटर को लिखा कि आप
मूदाजी भोंसले के पास नागपुर पहुँच कर गुप्त रीति से वहाँ
के सैन्यबल इत्यादि का पता लगावें और मूदाजी और उसके
साथियों को टीपू के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों की ओर फोड़ने का यत्न
करें। इसी पत्र में कॉर्नवालिस ने लिखा कि—“यदि मराठों ने टीपू
के साथ सुलह कर ली है या सुलह करने का फ़ैसला कर लिया है
तो यह नामुमकिन है कि हमारे समझाने बुझाने से मराठे फ़ौरन
ही अपने उस फ़ैसले से टल जावें× × ×इसलिए आप इसमें कोई
कोशिश उठा न रखिए × × × कि टीपू को दोनों का दुश्मन दिखा
कर और मराठों को उकसाकर टीपू के ख़िलाफ़ मराठों के साथ
गहरा सम्बन्ध और मेल कर लिया जावे।”*
इसी मज़मून का एक पत्र कॉर्नवालिस ने १० मार्च सन् १७८८
को पूना के अंगरेज़ रेजिडेण्ट मैलेट को लिखा, जिसमें मैलेट से
पेशवा दरबार को टीपू के विरुद्ध फोड़ने के लिए कहा गया। पेशवा
दरबार और निज़ाम दोनों से कॉर्नवालिस ने यह वादा किया कि
यदि आप लोग टीपू के विरुद्ध अंगरेज़ों को युद्ध में मदद देंगे तो

  • In his letter to George Forster dated October 23, 1787, Lord Corn-
    wallis wrote :—“ If the Marhattas have engaged or resolved to keep peace
    with Tipoo, it is not probable that our solicitations would induce them to
    depart immediately from that plan.” Forster was therefore instructed to
    spare no pains to incite Marhattas “to form a close connexion and alliance
    against Tipoo as a common enemy.”

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७५
जितना इलाक़ा टीपू से विजय किया जावेगा वह सब कम्पनी,
निज़ाम और मराठों में बराबर बराबर बाँट दिया जावेगा। कॉर्न-
वालिस का दिया हुआ लोभ अपना काम कर गया। निज़ाम का
चरित्र कभी भी अधिक विश्वास के योग्य न रहा था। किन्तु इस
समय पेशवा दरबार का हैदर के बेटे के ख़िलाफ़ बिदेशियों के
हाथों में खेल जाना निस्सन्देह अत्यन्त अफ़सोसनाक था। टीपू के
विरुद्ध अंगरेज़ों, मराठों और निज़ाम में सन्धि हो गई। इस सन्धि
के बारे में उस समय के प्रसिद्ध अंगरेज़ नीतिज्ञ फ़ॉक्स ने कहा था
कि वह वास्तव में—"एक न्याय्य नरेश को मिटा देने के उद्देश से
डकैतों की साज़िश थी ।’*
इंगलिस्तान के मन्त्रियों ने समाचार पाते ही फ़ौरन कुछ गोरी
फ़ौज और पाँच लाख पाउण्ड नक़द बतौर क़र्ज़ कॉर्नवालिस की
मदद के लिए इंगलिस्तान से रवाना किए।
तमाम तैयारी पूरी हो गई, कॉर्नवालिस के लिए अब केवल
कोई बहाना ढूंढ़ना बाक़ी था। कहते हैं कि
[टीपू के साथ युद्ध] त्रिवानकुर के राजा और टीपू में कुछ झगड़ा
[का बहाना] चला आता था। त्रिवानकुर के राजा को यह
कह कर भड़काया गया कि टीपू तुम पर हमला करने का इरादा
कर रहा है। उस समय के तमाम पत्रों और उल्लेखों से साबित है
कि टीपू का त्रिवानकुर पर हमला करने का क़तई कोई इरादा न

  • "A plundering confederacy for the purpose of extirpating a lawful
    prince. "-Fox.

[३७६] भारत में अंगरेज़ी राज

था। मद्रास के गवरनर हॉलैण्ड के एक पत्र में यह भी लिखा है
कि—"कम्पनी से लड़ने का टीपू का बिलकुल इरादा न था और
यदि कोई बातें शिकायत की थीं भी तो वह उन्हें आपस में पत्र
व्यवहार द्वारा तय करने को राज़ी था।" टीपू ने खुद अंगरेज़ों
को यक़ीन दिलाया कि मेरा इरादा न हरगिज़ शान्ति भंग करने
का है और न त्रिषानकुर की प्राचीन रियासत पर हमला करने का।
कर्नल विल्क्स लिखता है कि टीपू "लड़ाई के लिए तैयार न था"
किन्तु कॉर्नवालिस को अपने मालिकों की आज्ञा मिल चुकी थी।
वह सन् १७८४ की सन्धि को पैरों तले रौंद कर, जिस तरह हो,
टीपू को मिटाने और भारतीय ब्रिटिश राज की सीमाओं को बढ़ाने
का सङ्कल्प कर चुका था। उसने मद्रास के गवरनर को उत्तर में
लिखा कि—"टीपू का तैयार न होना ही कम्पनी के लिए सब से
अच्छा मौक़ा है।" टीपू को बदनाम करने और अपने अन्याय को
लोगों की नज़रों में जायज़ क़रार देने के लिए टीपू के अन्यायों और
अत्याचारों के अनेक झूठे क़िस्से गढ़कर चारों ओर फैलाए गए,
जिनमें से अनेक अभी तक भारतीय स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में
पाए जाते हैं।
त्रिबानकुर की सहायता के नाम पर युद्ध छेड़ा गया, किन्तु
इसके बाद की तमाम काररवाइयों में त्रिबानकुर के राजा का कहीं
नाम भी नहीं आता।
सब से पहले जून सन् १७६० में मद्रास से एक फ़ौज जनरल
मीडोज़ के अधीन मैसूर पर हमला करने के लिए रवाना हुई।

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७७
इस फ़ौज के साथ बहुत सी फ़ौज करनल मेक्सवेल के अधीन बंगाल
को थी । टीपू अपनी सेना सहित मुक़ाबले के
[मार्जिन: युद्ध का प्रारम्भ] लिए आगे बढ़ा । मीडोज़ ने टीपू के कई सामन्तों
[मार्जिन: और टीपू की] को लोभ देकर अपनी तरफ़ फोड़ लिया । अनेक
[मार्जिन: विजय] स्थानों पर दोनों ओर की सेनाओं में संग्राम हुए,
जिनके विस्तार में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। अन्त में टीपू की
वीरता और उसके बढ़े हुए युद्ध कौशल की वजह से बजाय इसके
कि अंगरेज़ी सेना मैसूर का कोई हिस्सा विजय कर सकती, टीपू
की सेना ने कम्पनी की सेना को पीछे भगाते भगाते मद्रास के
निकट तक पहुँचा दिया । टीपू ने फिर कर्नाटक के काफ़ी इलाक़े
पर क़ब्ज़ा कर लिया और जनरल मीडोज़ को जगह जगह ज़बरदस्त
हार खाकर, जान और माल का बेहद नुक़सान उठाकर, नाकाम
मद्रास लौट आना पड़ा ।
मीडोज़ की लज्जाजनक हार का हाल सुन कर कॉर्नवालिस ने
सेना की बाग ख़ुद अपने हाथों में ली । १२
[मार्जिन: तीन तीन शत्रुओं] दिसम्बर सन् १७६० को वह एक बहुत बड़ी
[मार्जिन: का एक साथ] फ़ौज लेकर कलकत्ते से मद्रास के लिए रवाना
[मार्जिन: मुक़ाबला] हुआ । मुमकिन है कि कॉर्नवालिस और उसकी
यह नई सेना भी टीपू को वश में करने के लिए काफ़ी न होती ।
किन्तु इस बीच निज़ाम और मराठों की सेनाएँ अंगरेज़ों की मदद
के लिए पहुँच चुकी थीं । मालूम नहीं नाना फड़नवीस उस समय
पूना में मौजूद था या नहीं और यदि था तो दरबार में उसका

३७८ भारत में अंगरेज़ी राज
कहाँ तक प्रभाव था। जो हो, पेशवा दरबार का उस समय
अंगरेज़ों के हाथों में खेल कर उन्हें उस घोर अन्याय में मदद देना
न केवल टीपू, बल्कि तमाम भारतीय राजशक्तियों के भविष्य के
लिए अत्यन्त अशुभ सूचक था। इस सब के अलावा हैदर की
अदूरदर्शिता का नतीजा भी इस समय टीपू को भोगना पड़ा। टीपू
के तमाम यूरोपियन नौकर यानी उसकी सेना के यूरोपियन अफ़सर
और सिपाही ऐन मौक़े पर शत्रु से जा मिले। कॉर्नवालिस ने गुप्त
पत्र व्यवहार द्वारा इन तमाम लोगों को, जिन्हें हैदर ने नौकर रक्खा
था, धन का लोभ देकर अपनी ओर कर लिया। पाँच लाख पाउंड
नक़द कॉर्नवालिस को इस तरह के कामों के लिए विलायत से क़र्ज़
मिल चुके थे। इतिहास लेखक थॉर्नटन लिखता है:—
"टीपू सुलतान के यूरोपियन नौकर जिस तरह पहले अपनी विद्या और
अपने कौशल को टीपू की रक्षा करने के लिए काम में लाते थे उसी तरह
अब वे अपनी उन्हीं ताक़तों को टीपू के नाश के लिए काम में लाने को हर
तरह तैयार हो गए।"*
मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी लिखता है कि टीपू के कुछ
[हाशिया: टीपू की सेना में विश्वासघातक] अमीरों और सरदारों को भी अंगरेज़ों ने अपनी
ओर फोड़ लिया था। टीपू जो इस युद्ध के
लिए पहले से तैयार न था, एक ओर अंगरेज़ों,


  • "Tipu's European servants were now quite as ready to exercise their
    skill and knowledge for his destruction as they had previously been assiduous
    in using them for his defence."—History of British India, by Thornton.

[लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७६]

मराठों और निज़ाम तीन तीन ताक़तों की सेनाओं द्वारा कई तरफ़
से घिर गया और दूसरी ओर उसकी अपनी सेना में विश्वासघातक
पैदा होगए ।
इस पर भी कॉर्नवालिस का काम इतना आसान न था । टीपू
[पार्श्व-शीर्षक: “शोकजनक] ने वीरता के साथ अपने तीनों शत्रुओं का
संहार”] मुक़ाबला किया । कई महीने युद्ध जारी रहा ।
उस युद्ध की अनेक लड़ाइयों को विस्तार के
साथ बयान करने की आवश्यकता नहीं है । किन्तु अकेला टीपू
इस तरह के तीन शत्रुओं का मुक़ाबला और इन हालतों में कब तक
कर सकता था ? अन्त में टीपू को पीछे हटना पड़ा, यहाँ तक कि
बंगलोर का नगर अंगरेज़ों के हाथों में आ गया । बंगलोर विजय के
बाद कॉर्नवालिस की आज्ञा से उसकी सेना ने बंगलोर निवासियों
के साथ जो व्यवहार किया उसे इतिहास लेखक मिल “शोकजनक
संहार” * कह कर बयान करता है । बंगलोर के नगर को जी भर
के लूटा गया ।
बंगलोर लेने के बाद कॉर्नवालिस ने मैसूर की राजधानी
श्रीरंगपट्टन पर चढ़ाई की । जिस समय अंगरेज़ी
[पार्श्व-शीर्षक: श्रीरंगपट्टन पर] सेना राजधानी के निकट पहुँची, टीपू ने अपने
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़ों की चढ़ाई] एक दूत के हाथ अनेक ऊँट फलों से लदवा कर
सुलह की इच्छा के चिह्न रूप कॉर्नवालिस की सेवा में भेजे, किन्तु


  • "Deplorable carnage."—Mill.