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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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सर जॉन मैकफ़रसन ३६५

लड़ीं। अन्त में अंगरेज़ों की सहायता से मोहम्मदअली करनाटक
का नवाब बना। इस सहायता के बदले में मोहम्मदअली ने
अंगरेज़ों को साढ़े चार लाख पैगोदा यानी क़रीब १६ लाख
रुपए सालाना का इलाक़ा अता किया। शुरू में अंगरेज़ नवाब
मोहम्मदअली का बड़ा आदर करते थे। यहाँ तक कि एक बार
मोहम्मदअली ने एक पत्र कुछ उपहारों और भेंट सहित इंगलिस्तान
के बादशाह तीसरे जॉर्ज के पास भेजा और उसके जवाब में
बादशाह जॉर्ज ने अपने हाथ से लिखकर एक अत्यन्त आदर और
प्रेम का पत्र और उसके साथ बतौर नज़ऱाने के दो बढ़िया पिस्तौल
और बतौर नमूने के कुछ इंग्लिस्त[ान का] बना कपड़ा मोहम्मदअली
के पास भेजा।
किन्तु थोड़े ही दिनों में ठीक वही सलूक मोहम्मदअली के साथ
(हाशिया: मोहम्मदअली के साथ कम्पनी की ज़्यादतियाँ) होने लगा जो उत्तर में अवध के नवाबों के साथ
हो रहा था। धन की नित्य नई माँगें उसके
सामने पेश की जाती थीं और जबरन् पूरी कराई
जाती थीं। मिसाल के लिए यह एक प्रथा पड़
गई थी कि मोहम्मदअली मद्रास के हर नए गवर्नर को अपने यहाँ
दावत करे और उसे तीस हज़ार पैगोदा नज़र करे। कम्पनी के
छोटे मोटे नौकरों की माँगें भी मोहम्मदअली के ऊपर नित्य बढ़ती
गईं, यहाँ तक कि जब अरकाट का ख़ज़ाना ख़ाली हो गया तो
कुछ अंगरेज़ व्यापारियों ने ही अपने दूसरे देशवासियों की माँगें
पूरी करने के लिए मोहम्मदअली को क़र्ज़ देने शुरू किए। लाचार