भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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पहचान जाता था, रँगरूटों को केवल चेहरे से देखकर भरती कर
लेता था। घोड़ों और जवाहरात की भी उसे गज़ब की पहचान थी।
हैदरअली वीर था और वीरता की बड़ी क़द्र करता था। अपने
[हाशिया: वीरता और सादगी] सिपाहियों के साथ उसका व्यवहार अत्यन्त
प्रेम, उदारता और बराबरी का रहता था।
जिन्हें वह युद्ध में हरा देता था उनके साथ भी
उसका व्यवहार सदा दया और उदारता का होता था। इतना बड़ा
नरेश होने पर भी उसमें घमण्ड या अभिमान का निशान तक न
था। अपने राज को वह सदा 'खुदादाद' कहा करता था। अपने
दरबारों तक में वह मामूली सिपाहियों के साथ बराबरी का
व्यवहार करता था। स्वयं एक मामूली सिपाही का सा जीवन
व्यतीत करता था। भोजन जो सामने आता खा लेता था। सफ़र
में वह अक्सर भुने हुए चने, बादाम और ज्वार की सूखी रोटी या
इनमें से जो सामने आ जावे खाकर रह जाता था। अपने तख़्त पर
वह ज़्यादा से ज़्यादा साल में एक बार ईद के दिन चन्द घण्टे के
लिए बैठता था और वह भी दूसरों की प्रार्थना पर।
हैदरअली का क़द मँझोला था, उसका रंग साँवला था।
किन्तु उसके शरीर की बनावट सुन्दर थी।
[हाशिया: हैदरअली का शारीरिक बल] वह मज़बूत और निहायत फुर्तीला था। वह
घोड़े का बहुत अच्छा सवार था। पैदल लम्बे
सफ़र करने का भी उसे बेहद शौक़ था और आदत थी। सप्ताह
में दो बार वह अपने सर, दाढ़ी और मूंछों के बाल मुंडवा