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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७३
भारतीय इलाके में कहीं देखने को भी न मिलती थी। किन्तु टीपू
नातजरुबेकार था। विदेशियों से देश को कितना ख़तरा था, और
उस ख़तरे को दूर करने के लिए अपने भारतीय पड़ोसियों से मेल
बनाए रखने की कितनी ज़रूरत थी इन दोनों चीज़ों को वह अभी पूरी
तरह न समझ पाया था। कुछ सरहदी इलाक़ों के बारे में मराठों
और निज़ाम दोनों से उसके झगड़े चले आते थे, जिनमें ज़्यादती
चाहे किसी की भी रही हो, इसमें सन्देह नहीं टीपू अपने पड़ोसियों
के साथ उस तरह का प्रेम और मेल क़ायम न रख सका, जिस
तरह का हैदर ने रख रक्खा था। निज़ाम और मराठों के साथ टीपू
के इन आपसी झगड़ों से ही क[म्पनी] को टीपू के ख़िलाफ़ सबसे
ज़्यादा मदद मिली। कॉर्नवालिस ने सबसे पहले टीपू के विरुद्ध
निज़ाम के साथ एक नया समझौता किया। इस समझौते का
मतलब यह था कि कम्पनी की वह सबसीडीयरी सेना जो निज़ाम
के यहाँ निज़ाम के ख़र्च पर रक्खी गई थी, टीपू पर हमला करने के
लिए काम में लाई जा सकेगी, और निज़ाम टीपू पर हमला करने
में अंगरेज़ों को मदद देगा।*
इस दरमियान टीपू और मराठों में सुलह सफ़ाई की बातचीत
[हाशिया: मराठों और निज़ाम] हो रही थी, और यदि कॉर्नवालिस बीच में
[हाशिया: को टीपू के ख़िलाफ़] बाधा न डालता तो निस्सन्देह सुलह हो ही
[हाशिया: फोड़ना] गई थी। किन्तु कॉर्नवालिस खूब जानता था
कि टीपू को वश में करना अकेले अंगरेज़ों और
* Historical Sketches, by Colonel Wilks, vol. iii. p. 38.