भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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होकर मोहम्मदअली अंगरेज़ों की मांगें भी पूरी करता रहा और
यूरोपियन व्यापारियों का दिन पर दिन क़र्ज़दार भी होता चला
गया। कम्पनी के नौकरों के इन अत्याचारों से बचने का उसे कोई
उपाय न सूझता था।
ऐसी हालत में नौजवान मैकफ़रसन गवरनर जनरल होने से
बहुत दिनों पहले अरकाट पहुँचा। उसने नवाब मोहम्मदअली से
मिलकर उसे यह पट्टी पढ़ाई कि यदि आप मुझे अपनी ओर से
वकील बनाकर इंगलिस्तान भेज दें तो वहाँ के मन्त्रियों से कह कर
मैं आपकी सब शिकायतें दूर करा दूँ और क़र्ज़े माफ़ करा दूँ। भोले
नवाब ने मंज़ूर कर लिया। मैकफ़रसन उसका वकील बनकर सन्
१७६८ में इंगलिस्तान पहुँचा। इस चाल से मैकफ़रसन ने मोहम्मद
अली को खूब जी भर के लूटा। यहाँ तक कि उसने कई लाख
रुपए इंगलिस्तान के प्रधान मन्त्री तक को रिश्वत देना चाहा।
और जब प्रधान मन्त्री ने यह रिश्वत स्वीकार न की, तो मैकफ़रसन
ने उसे ७० लाख रुपए से ऊपर क़र्ज़ (?) के तौर पर देना चाहा।
किन्तु लिखा है कि प्रधान मन्त्री ने इसे भी मंज़ूर न किया।
करनाटक के नवाब की शिकायतें तो इंगलिस्तान में कौन सुनता
था और कहाँ दूर हो सकती थीं, किन्तु इन तरीक़ों से मैकफ़रसन
ने कम्पनी के डायरेक्टरों और इंगलिस्तान के मन्त्रियों पर अपना
ख़ूब असर जमा लिया। वह फिर कम्पनी की नौकरी में भारत भेजा
गया और तरक़्क़ी करके पहले कलकत्ते की कौंसिल का मेम्बर
और फिर मौक़ा मिलने पर गवरनर जनरल बना दिया गया।