भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलॉर्ड कॉर्नवालिस ३७१
टीपू का जन्म सन् १७४६ ईसवी में हुआ । लिखा है कि एक
मुसलमान फ़क़ीर टीपू मस्तान औलिया के आशीर्वाद से हैदरअली
के यहाँ इस पुत्र का जन्म हुआ । इसीलिए उसका नाम फ़तहअली
टीपू रक्खा गया । इतिहास में वह टीपू सुलतान के नाम से मशहूर
हुआ । पराक्रम और युद्ध कौशल में टीपू अपने बाप के मुक़ाबले का
था । उसकी शुमार भारत के बल्कि संसार के ऊँचे से ऊँचे वीरों
में की जाती है। टीपू के चरित्र का अधिक दिग्दर्शन एक अगले
अध्याय में किया जायगा, यहाँ पर केवल कॉर्नवालिस और टीपू के
युद्ध को बयान कर देना ज़रूरी है ।
सन् १७८४ में टीपू और कम्पनी के बीच सन्धि हो चुकी थी,
[हाशिया: टीपू से अंगरेज़ों] जिसमें कम्पनी ने टीपू सुलतान को मैसूर का
[हाशिया: को डर] न्याय्य अधिपति स्वीकार कर लिया था और
वादा किया था कि आइन्दा हम कभी मैसूर के
राज में दख़ल न देंगे और टीपू सुलतान के साथ सदा मित्रता
क़ायम रक्खेंगे । तब से अब तक टीपू ने अपनी ओर से सन्धि का
ठीक ठीक पालन किया था और अंगरेज़ों के साथ कभी किसी
तरह की छेड़छाड़ न की थी । किन्तु टीपू और उसके पिता हैदर
के हाथों जो हार पर हार और ज़िल्लत पर ज़िल्लत अंगरेज़ों को
उठानी पड़ी थी वह हर अंगरेज़ के दिल में काँटे की तरह खटक रही
थी । बाप के मरने के बाद क़रीब एक साल तक जिस शान और
सफलता के साथ टीपू ने अंगरेज़ों के साथ युद्ध जारी रक्खा,
उसकी वजह से उन दिनों टीपू का नाम सुनकर अंगरेज़ चौंक उठते