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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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३७४ भारत में अंगरेज़ी राज
निज़ाम के बूते का काम नहीं है। यह ख़बर पाते ही कि टीपू और
मराठों में सुलह हो रही है, कॉर्नवालिस ने फ़ौरन २३ अक्तूबर सन्
१७८७ को अपने एक अफ़सर जॉर्ज फ़ॉर्सटर को लिखा कि आप
मूदाजी भोंसले के पास नागपुर पहुँच कर गुप्त रीति से वहाँ
के सैन्यबल इत्यादि का पता लगावें और मूदाजी और उसके
साथियों को टीपू के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों की ओर फोड़ने का यत्न
करें। इसी पत्र में कॉर्नवालिस ने लिखा कि—“यदि मराठों ने टीपू
के साथ सुलह कर ली है या सुलह करने का फ़ैसला कर लिया है
तो यह नामुमकिन है कि हमारे समझाने बुझाने से मराठे फ़ौरन
ही अपने उस फ़ैसले से टल जावें× × ×इसलिए आप इसमें कोई
कोशिश उठा न रखिए × × × कि टीपू को दोनों का दुश्मन दिखा
कर और मराठों को उकसाकर टीपू के ख़िलाफ़ मराठों के साथ
गहरा सम्बन्ध और मेल कर लिया जावे।”*
इसी मज़मून का एक पत्र कॉर्नवालिस ने १० मार्च सन् १७८८
को पूना के अंगरेज़ रेजिडेण्ट मैलेट को लिखा, जिसमें मैलेट से
पेशवा दरबार को टीपू के विरुद्ध फोड़ने के लिए कहा गया। पेशवा
दरबार और निज़ाम दोनों से कॉर्नवालिस ने यह वादा किया कि
यदि आप लोग टीपू के विरुद्ध अंगरेज़ों को युद्ध में मदद देंगे तो

  • In his letter to George Forster dated October 23, 1787, Lord Corn-
    wallis wrote :—“ If the Marhattas have engaged or resolved to keep peace
    with Tipoo, it is not probable that our solicitations would induce them to
    depart immediately from that plan.” Forster was therefore instructed to
    spare no pains to incite Marhattas “to form a close connexion and alliance
    against Tipoo as a common enemy.”