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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७७
इस फ़ौज के साथ बहुत सी फ़ौज करनल मेक्सवेल के अधीन बंगाल
को थी । टीपू अपनी सेना सहित मुक़ाबले के
[मार्जिन: युद्ध का प्रारम्भ] लिए आगे बढ़ा । मीडोज़ ने टीपू के कई सामन्तों
[मार्जिन: और टीपू की] को लोभ देकर अपनी तरफ़ फोड़ लिया । अनेक
[मार्जिन: विजय] स्थानों पर दोनों ओर की सेनाओं में संग्राम हुए,
जिनके विस्तार में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। अन्त में टीपू की
वीरता और उसके बढ़े हुए युद्ध कौशल की वजह से बजाय इसके
कि अंगरेज़ी सेना मैसूर का कोई हिस्सा विजय कर सकती, टीपू
की सेना ने कम्पनी की सेना को पीछे भगाते भगाते मद्रास के
निकट तक पहुँचा दिया । टीपू ने फिर कर्नाटक के काफ़ी इलाक़े
पर क़ब्ज़ा कर लिया और जनरल मीडोज़ को जगह जगह ज़बरदस्त
हार खाकर, जान और माल का बेहद नुक़सान उठाकर, नाकाम
मद्रास लौट आना पड़ा ।
मीडोज़ की लज्जाजनक हार का हाल सुन कर कॉर्नवालिस ने
सेना की बाग ख़ुद अपने हाथों में ली । १२
[मार्जिन: तीन तीन शत्रुओं] दिसम्बर सन् १७६० को वह एक बहुत बड़ी
[मार्जिन: का एक साथ] फ़ौज लेकर कलकत्ते से मद्रास के लिए रवाना
[मार्जिन: मुक़ाबला] हुआ । मुमकिन है कि कॉर्नवालिस और उसकी
यह नई सेना भी टीपू को वश में करने के लिए काफ़ी न होती ।
किन्तु इस बीच निज़ाम और मराठों की सेनाएँ अंगरेज़ों की मदद
के लिए पहुँच चुकी थीं । मालूम नहीं नाना फड़नवीस उस समय
पूना में मौजूद था या नहीं और यदि था तो दरबार में उसका