भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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कहाँ तक प्रभाव था। जो हो, पेशवा दरबार का उस समय
अंगरेज़ों के हाथों में खेल कर उन्हें उस घोर अन्याय में मदद देना
न केवल टीपू, बल्कि तमाम भारतीय राजशक्तियों के भविष्य के
लिए अत्यन्त अशुभ सूचक था। इस सब के अलावा हैदर की
अदूरदर्शिता का नतीजा भी इस समय टीपू को भोगना पड़ा। टीपू
के तमाम यूरोपियन नौकर यानी उसकी सेना के यूरोपियन अफ़सर
और सिपाही ऐन मौक़े पर शत्रु से जा मिले। कॉर्नवालिस ने गुप्त
पत्र व्यवहार द्वारा इन तमाम लोगों को, जिन्हें हैदर ने नौकर रक्खा
था, धन का लोभ देकर अपनी ओर कर लिया। पाँच लाख पाउंड
नक़द कॉर्नवालिस को इस तरह के कामों के लिए विलायत से क़र्ज़
मिल चुके थे। इतिहास लेखक थॉर्नटन लिखता है:—
"टीपू सुलतान के यूरोपियन नौकर जिस तरह पहले अपनी विद्या और
अपने कौशल को टीपू की रक्षा करने के लिए काम में लाते थे उसी तरह
अब वे अपनी उन्हीं ताक़तों को टीपू के नाश के लिए काम में लाने को हर
तरह तैयार हो गए।"*
मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी लिखता है कि टीपू के कुछ
[हाशिया: टीपू की सेना में विश्वासघातक] अमीरों और सरदारों को भी अंगरेज़ों ने अपनी
ओर फोड़ लिया था। टीपू जो इस युद्ध के
लिए पहले से तैयार न था, एक ओर अंगरेज़ों,
- "Tipu's European servants were now quite as ready to exercise their
skill and knowledge for his destruction as they had previously been assiduous
in using them for his defence."—History of British India, by Thornton.